१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रयास हुआ वह विफल हुआ। बंगाल की खाड़ी भी कालप्रवाह में भर जाएगी, पर यह कानपुर का कुआं कभी नहीं भरेगा। इसी समय पांडु नदी पर पहुंची नाना की सेना का पराभाव करते हैवलॉक आगे घुसता गया। नाना की सेना के सेनापति बाला साहब पेशवा के कंधे में गोली लगने से उनके वापस कानपुर आते ही नाना ने तुरंत एक युद्ध सभा बुलाई। लड़ाई न करके कानपुर छोड़ें या कानपुर छोड़ने के पूर्व मैदान में एक जोरदार टक्कर देकर देखें-इन दो मुद्दों पर युद्ध सभा में बहुत चर्चा होकर अंत में दूसरे रास्ते का अनुसरण करना तय हुआ। 16 जुलाई को अंग्रेजी सेना कानपुर के पास आने लगी। कानपुर के कुएं की कथा उन्हें अभी तक ज्ञात न होने से यद्यपि व्हीलर ला का किला हाथ से निकल गया, तब भी बीबीगढ़ को विद्रोहियों के कब्जे से छुड़ा लेने की जिद उन्हें धूप, श्रम और लड़ाई में भी एक क्षण विश्राम नहीं लेने रे रही थी। कानपुर शहर के शिखर दिखते ही हैवलॉक को इष्ट समय आने का उत्साह चढ़ने लगा। उसने पांडे की सेना क बारीक जांच शुरू की। कानपुर के रण पर इतनी उत्तम रीति से व्यूह रचकर खड़ी सेना को देखकर रण क्षेत्र में पूरा जीवन गुजार देनेवाले उस योद्धा को ऐसा उगने लगा कि विद्रोहियों में अपेक्षा से अधिक लश्करी चतुराई भरी हुई है। उसने अपने अधिकारी इकट्ठा किए और उन्हें हाथ की तलवार के छोर से धूल पर लश्करी आक्रमण का अपना नक्शा खींचकर बताया। विद्रोहियों पर सामने से आक्रमण करने के स्थान पर बाईं ओर पहले हमला करना चाहिए, यह हैवलॉक अपनी सेना को समझा रहा था, तभी विद्रोहियों की व्यूहबद्ध सेना में एक सफेद घोड़े पर सवार होकर श्रीमंत नाना साहब आ मिले। सिपाहियों को उत्साहित करते इस छोर से उस छोर तक नाना साहब घोड़ा दौड़ते अंग्रेजों की छावनी से स्पष्ट दिख रहे थे। दोपहर के समय अंग्रेजों का नाना के बाएं बाजू पर हमला हुआ। इस अकस्मात् और अनपेक्षित स्थान पर हुए अंग्रेजों के जोरदार हमले को रोकने के लिए विद्रोहियों की तोपें गरजने लगीं। अंग्रेजी तोपखाना आने में विलंब हो जाने के कारण विद्रोहियों का जोर बढ़ गया। परंतु विद्रोहियों की बढ़त देखकर क्रोधित हैवलॉक जब फिर से एक बार चढ़ाने करने लगा-अंग्रेजी हायलैंडर्स मुंह घुमाकर सीधे तोपों पर दौड़ गए और जब एक कदम भी पीछे न रहते मृत्यु या विजय, ऐसा पक्का निश्चय कर अंग्रेजी सेना बिजली-सी टूट पड़ी तब उस एकीकृत, अनुशासित और अनपेक्षित मार को सहन करने 117 1857 का स्वातंत्र्य समर - 254 117 - प्रकार का ध्यान दिए ही विश्वास कर लिया गया। (परिणामों की तनिक भी चिंता न की गई) बिना विचारे ही उनका प्रसार और प्रचार किया गया। किसी का अंगच्छेद न हुआ, किसी का अपमान नहीं हुआ। यह साक्षी दी है, क्योंकि उन्होंने जून और जुलाई मास में हुई हत्याओं से संबद्ध प्रत्येक बात का खोजपूर्ण अवलोकन किया था।‘' -के एवं मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 2, पृष्ठ 281