१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजानती थीं। अतः उनके अस्तित्व का विष भरा पात्र भंग न किया तो वह कानपुर को जीवन को हानि किए बिना चुकेगा नहीं, ऐसा इस सभा में सबका विचार बना। उस कैदखाने को बीबीगढ़ कहा जाता था, पर उसमें नाना के आदेश से बचे हुए कुछ पुरुष भी थे। उन सबको उनके विश्वासघाती पत्र ले जानेवाले जासूसों सहित मार डाला जाए, ऐसा सर्वसम्मत निश्चय कर उसे घोर रात क यह घोरतम सभा विसर्जित हुई। दूसरे दिन उन जासूसों और कैद में पड़े गोरे पुरुषों को बाहर खींचा गया। एक कतार में वे खड़े रहे और स्वयं नाना साहब के सामने पहले उन जासूसों के सिर सटासट उड़ाए गए और बाद में कैद के गोरे पुरुषों को आगे लाकर गोली से मार डाला गया। नाना साहब के वहां से उठते ही उन गोरे लोगों के शवों के पास आकर लोग मजाक करने लगे, "देखो, यह मद्रास का गवर्नर, यह बंबई का, यह बंगाल का ˙' ऐसा मजाक इधर चल रहा था और उधर बीबीगढ़ के पहरेदार सिपाहियों को अंदर घुसकर कत्ल करने का आदेश हुआ। पहरेदार ऐसा कत्लेआम करने का साहस न जुटा सके। तब ऐसे सिपाहियों से अधिक योग्यता का आदमी चाहिए, यह देखकर उस बीबीगढ़ की मुख्य अधिकारी बेगम साहब ने कानपुर शहर की खटीक बस्ती में वह आदेश भिजवाया। थोड़ी देर में हाथों में नंगी तलवारें और तेज छुरियां लेकर खटीक लोग उस बीबीगढ़ में शाम के समय अंदर घुसे और काफी रात गए बाहर आए। उनके उस घुसने और निकलने के बीच गोरे रक्त का लाल-लाल समुद्र फैल गया। बीबीगढ़ में घुसते ही उन्होंने हाथ की तलवार और छुरियों से कोई डेढ़ सौ गोरी महिलाएं और गोरे बच्चे काट डाले। उस जह पर रक्त की तलैया भर गई और उस रक्त में नरमांस के टुकड़े तैरने लगे। अंदर जाते समय वे खटीक जमीन पर से चलते गए और बाहर निलते समय उन्हें रक्त जल का प्रवास करना पड़ा। रात को बीबीगढ़ में अधमरों की चिल्लाहट, मरणोन्मुखी के आर्तनाद सुनाई दे रहे थे। भोर होते ही एक-दो बच्चे ऊपर आ गए और कुएं के किनारे भागने लगे। लेकिन धक्का लगकर वे भी मरे हुओं पर गिर गए। उन मरों पर मरे हुए और उनपर फिर मरे हुए। आज तक आदमी कुएं का पानी पीता था, परंतु आज कुएं ने आदमी का रक्त पीना चालू किया। फतेहगढ़ में जलते हुओं का आर्तनाद अंग्रेज आकाश में फेंक रहे थे, तभी बीबीगढ़ में रक्त से सनी गोरी चीखें पांडे पाताल में फेंक रहे थे। मनुष्य प्राणी की इन दो भिन्न जातियों में सौ वर्ष से जमा रकम का हिसाब इस तरह चुकता होने लगा।116 कानपुर का कुआं, इसे भरने का जो-जो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 253 116 "क्रूरता की पराकाष्ठा, अवर्णनीय लज्जा आदि विशेषणों से इस पाश्व हत्याकांड का वर्णन किया गया है, किंतु ये सब तो विभ्रांत कल्पना शक्ति की मनगढ़ंत बातें ही हैं, जिनपर बिना किसी