१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंको न मारते हुए छोड़ दिया गया। उस शहर कापूर्व मजिस्ट्रेट शेररे उस विजयी सेना के साथ आया था और बहुत दिन से रुकी हुई अपनी मजिस्ट्रेटरी चलाने को वह अब उत्सुक था। इसलिए पहले लश्कर को शहर लूटने का आदेश दिया गया और जब उस शहर में लूटने के लिए कुछ भी शेष न रहा तब उस शहर को आग लगा देने का दूसरा आदेश हुआ। परंतु इस आदेश के पालन का सम्मान कवेल सिख सिपाहियों को ही दिए जाने के कारण गोरी सेना के फतेहपुर से निकलते ही सिखों ने उन्हें सौंपी गई खास कार्यवाही सपंन्न करते हुए उस शहर को आग लगा दी और फिर वे मुख्य सेना से जाकर मिल गए। फतेहपुर शहर को जब अंग्रेजी सेना जीवित जला रही थी तब उसकी ज्वालाओं की पलटें फैलते-फैलते जल्दी ही कानपुर को गरमी देने लगीं। मेजर रीड की टुकड़ी को मारने के लिए अपनी सेना टूटी तभी मेजर हैवलॉक की सेना ने अकस्मात् हमला कर उन्हें भगा दिया। फतेहपुर शहर में अंग्रेजी सेना ने प्रवेश किया और वहां की संपत्ति लूटकर आदमियों को आग में भस्म कर डाला-ये समाचार नाना के दरबार खौलने लगा। कानपुर पर आक्रमण करने आ रहे अंग्रेजों को पांडु नदी पर ही रोक लेने के लिए नाना साहब के अधीन एक सेना भेजने को नाना का दरबार उठा तो अंग्रेजों की ओर गए हुए कुछ दगाबाज जासूस पकड़े जाने का समाचार आया। इन दगाबाज जासूसों की जांच में यह सिद्ध हो गया कि उनमें से कुछ को नाना की कैद में रह रह गोरी महिलाओं ने इलाहाबाद के अंग्रेजों को विश्वासघाती पत्र लिखे हैं।114 सिपाहियों के कत्लेआम से जिनका अबला कहकर नाना ने बचाव किया उनकी इन गुप्त कार्यवाहियों का डंका पिट जाने पर इन कुटिल गोरी स्त्रियों का क्या किया जाए, यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित हुआ। फतेहगढ़ अंग्रेजों ने जलाया वैसे ही यह बीबीगढ़ भी हम क्यों न जलाएं? उस दिन की खास बैठक में टीका सिंह ने कहा-“ये महिलाएं कानपुर के बीबीगढ़ में ऐसे ही रहीं तो अपनी पराजय होने पर कानपुर शहर को अंग्रेज राख तो करेंगे ही, पर उनके कथन के आधार पर हजारों लोग अंग्रेजों के द्वेष की बलि चढ़ेंगे, इसलिए मेरे विचार से कानपुर से अंग्रेज भिड़ें, इसके पूर्व ही यहां की आंतरिक जानकारी देने को एक भी गोरी चमड़ी शेष न रहे।115 बीबीगढ़ में जो महिलाएं थीं उनमें से कितनी ही कानपुर में दस-दस वर्ष से रह रही थी। अंग्रेजों के विरुद्ध जो लड़े उनमें से बहुतेरे नागरिकों को वे नाम-पते सहित 1857 का स्वातंत्र्य समर - 252 114 1 ''फतेहपुर में क्रांतिकारी सेना की पराजय के उपरांत कतिपय प्रसिद्ध गुप्तचरों को नाना साहब के समक्ष उपस्थित किया गया। बंदीगृह में पड़ी कुछ असहाय महिलाओं द्वारा सुदूर स्थानों को लिखें पत्रों के कतिपय इन गुप्तचरों के पास होने का आरोप लगाया था। उन पत्रों में कतिपय महाराजाओं तथा नगर के 'बाबू' लोगों का हाथ होने की आशंका व्यक्त की गई थी। तभी यह निश्चय किया गया कि उन गुप्तचरों तथा उन अंग्रेज पुरूषों तथा महिलाओं का भी वध कर दिया जाए, जिन्हें प्राणदान दे दिया गया था।'' 115 2 Forrest's Introduction में फॉरेस्ट कहता है-''आगे साक्ष्य न मिले, इसलिए कत्लेआम का आग्रह-पहला प्रस्ताव टीका सिंह ने किया। ''