भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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लाया हुआ खजाना उन्होंने शाही प्रतिनिधि को दे दिया। उनके प्रतिनिधियों का बादशाह ने अपने राजमहल में स्वागत किया और उनका यथायोग्य आदर एवं मान-मर्तबा रखा। भरे दरबार में उस पलटन के सिपाहियों के प्रतिनिधि ने 20 जून को अंग्रेजी सेना पर हमला करने की शपथ ली। 20 जून को प्रातः शत्रु पर हमला करने जाने के लिए विद्रोही सेना शहर के दरवाजे से बाहर निकली, यह देखा गया। अंग्रेजों की छावनी के पिछाड़ी के बाजू पर हल्ला करने के हेतु से सिपाही सब्जी मंडी से छिपते-छिपते चले और अंग्रेज कुद सोचें, इसके पहले ही उनपर अचानक गोलियों की बौछार शुरू की और अंग्रेजों पर जोरदार हमला किया। स्कॉर्ट, मनी, टॉम्ब्स और अन्य अंग्रेज अधिकारियों ने तोपों की जोरदार मार करके यह हमला रोकने का प्रयास किया । पर भारतीय सेना इतनी लगन से हमला कर रही थी कि उसक प्रतिकार करना कठिन हो गया। नसीराबाद की पलटन का किया हुआ हमला इतना प्रभावी और भयानक था कि बहादुर टॉब्स भी रूआंसा होकर चिल्लाया-“दौड़ों, डॉली दौड़ो-अन्यथा मेरी तोपों पर शत्रुओं का कब्जा हो गया समझो।” पंजाबी नेटिव सिपाहियों के साथ डॉली दौड़कर भी आया। परंतु विद्रोहियों की ओर से छोड़ी गई एक गोली से उसके कंधे को चोट लगने से उसे पीछे घूमना पड़ा। शाम हो गई और सैनिकों की जीत स्पष्ट दिख रही थी। उन्होंने फिर हमला किया और अंग्रेजी सेना की तोपें हथिया लीं। 9वीं भाला सेना टुकड़ी (लांसर) और पंजाबी टुकड़ी बार-बार आगे घुसने का प्रयास करती और पराभूत होकर पीछे हट जाती। रात हो गई तब भी लड़ाई का रंग भीषण ही बना रहा। अंग्रेजों ने भी बहुत पराक्रम किया, पर वे अपनी तोपें बचाने से अधिक कुछ नहीं कर पाए। लॉर्ड रॉबर्ट्स लिखता है-“विद्रोहियों के कारण हममें भगदड़ मची (The mutineers routed us)। होप ग्रांट का घोड़ा मर गया। वह स्वयं भी बहुत घायल हो गया। उसके बाजू में ही एक राजनिष्ठ मुसलमान घुड़सवार खड़ा न होता तो वह उसी समय मर जाता। मध्य रात तक ऐसे झपट्टे चालू रहे। सिपाहियों के हमलों को रोकना असंभव हो जाने से अंत में अंग्रेज युद्धक्षेत्र से पीछे हट गए और अंग्रेजी छावनी की पिछाडी का एक प्रमुख स्थान विद्रोहियों के हाथ लग गया।” उस रात अंग्रेज कमांडर को चिंता के कारण नींद आना संभव नहीं था। क्रांतिकारियों द्वार जोर लगाकर जीता हुआ स्थान यदि उनके कब्जे में बना रहता तो अँजों की पंजाब की ओर से आवाजाही टूट जाती। यह संकट टालने के लिए उस विजयी स्वदेशी सेना का प्रतिकार करने को अंग्रेजों ने बड़ी भोर से ही तैयारी की। गोला-बारूद और सेना की अधिक सहायता प्राप्त करने वे सिपाही शहर लौट रहे थे, इसलिए अंग्रेज हाथ से `नकंला अपना स्थान फिर प्राप्त कर सके। इस लड़ाई की विजय और सिपाहियों की टक्कर के समाचार से दिल्लीवासियों का उत्साह बढ़ गया और उस उत्साह में उन्होंने किले पर लंबी मार की तोपें भी चढ़ाकर उससे अंग्रेजी सेना पर गोलों की भरमार कर दी। दिल्ली 1857 का स्वातंत्र्य समर - 242