१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतोपखाने के बहुत लोग गारद हो गए और सिपाहियों को अचूक गोली लगने से नॉक्स मारा गया। उसी समय क्रांतिकारियों की दूसरी टोली ने अंग्रेजों की पिछाड़ी पर भी हमला किया। पर वहां उन्हें बड़े प्रतिकार का सामना करना पड़ा। बाड़ा हिंदूराव और अंग्रेजी सो की दाईं बगल पर भी सिपाहियों ने बड़े जोर का हमला किया। जिनकी राजनिष्ठा पर अंग्रेजों को पूर्ण विश्वास था, ऐसी एक नेटिव पैदल टुकड़ी शत्रु पर हमला करने गई। परंतु उन्होंने विश्वासघात किया, यह स्पष्ट होते ही हमने उनपर गोलीबारी चालू की, पर वे बहुत तीव्रता से गोलीबारी से सुरक्षित निकल गए ˙ ˙ ।111 उस स्थान पर नियुक्त मेजर रीड कहता है-‘’मानो वे सिपाही शत्रु पर हमला करने जा रहे लें, ऐ लगता था; पर शत्रु से भिड़ते ही वे उनके साथ ही चलने लगे-यह देखते ही मैं डर गया। मैंने उपपर तोपें दागने का आदेश दिया; पर उतनी देर में वे विश्वासघाती इतने दूर चले गए कि उनमें से कोइ पांच-छह सिपाही ही मारे गए होंगे, ऐसा मुझे लगता है।‘‘ इस आक्रमण के बाद विद्रोही शत्रु पर हमला करने के लिए शहर के बाहर जा रहे हैं, ऐसा हर दिन दीखने लगा और हमला निपटाकर वे शहर में लौट रहे हैं, यह हर शाम दिखता था। सिपाहियों का जो-जो दल विद्रोहियों से मिलने दिल्ली में प्रवेश करता वह दल तुरंत दूसरे दिन शत्रु पर हमला करने बाहर जाता। 13 जून को बाड़ा हिंदूराव पर फिर से हमला किया गया। 12 जून को ब्रिद्रोहियों से जो सेना आकर मिली थी उसी ने यह हमला किया था। मेजर रीड लिखता है-‘’गैंड ट्रंक मार्ग से वे सिपाही सीधे टुकड़ियों का संचालन करते आ रहे थे। उस पलटन का नेता सरदार बहादुर था। अपनी बाईं बगल की ओर मुड़ने का उनका हेतु होने से अपने लोगों को पीछे रहने को कहकर वह स्वयं आगे हो गया। उस दिन वे सिपाही जान की परवाह न करते हुए लड़ रहे थे। परंतु सरदार बहादुर उसके अर्दली लाल सिंह के हाथों मारा गया। उसके सीने पर की हिंदुस्थानी सेना क निशानी की पट्टी निकालकर उसने मेरी पत्नी के पास भेज दी। 17 जून को भारतीय सेना ने ईदगाह भवन पर तोपों का मोरचा जमाना चालू किया; क्योंकि वहां से अंग्रेजों की रिज पर -सामने पर-जोरदार गोलागरी हो सकती थी। यह सब देखते ही मेजर रीड और हेनरी टॉब्स ने विद्रोहियों पर दो तरफ से हमला बोल दिया। और प्रतिकार हो ही नहीं सकता। ऐसी शक्ति से उन्हें घेरने का प्रयास किया। पर ईदगाह भवन में बंद वे मुट्ठी भर विद्रोही शरणागत नहीं हुए। जब उनके पास का गोला-बारूद समाप्त हो गया तब उन्होंने बंदूकें फेंककर अपनी तलवारें निकालीं और अपने अंग्रेज शत्रु पर प्राणपण से टूट पड़े। अपना अंतिम सैनिक अपने-अपने स्थान पर लड़ाई लड़ते मरने तक उन्होंने ईदगाह भवन में शत्रु को प्रवेश नहीं करने दिया।‘‘ 18 जून को नसीराबाद के विद्रोही सिपाही दिल्ली पहुंच गए और अपने साथ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 241 111 के कृत-इंडियन म्यूटिनी', पृष्ठ 411 ।