१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरे दिन प्रातः बिल्वर फोर्स और ग्रेट हेड ने अगले हमले की योजना बनाकर सेनापति बर्नार्ड के विचार के लिए उसके पास भेजी। सेनापति बर्नार्ड की पहचान क्रिमियन युद्ध के एक नामवर योद्धा के रूप में थी। पर इस अवसर पर वह बहुत धीमा और दब्बू-सा लग रहा था। 14 जून को उसने युद्ध परिषद् (वार काउंसिल) की बैठक बुलाकर अपने अधिकारियों से आक्रमण के विषय पर चर्चा की। आक्रमण की योजना का जोरदार भाषा में ग्रेट हेड से समर्थन किया, तब भी अन्य अधिकारियों को विजय का विश्वास नहीं होता था, इसलिए उन्होंने यह प्रतिपादन किया कि इसमें प्रत्यक्ष पराभव जितनी ही शक्ति की और प्रतिष्ठा की हानि होने वाली है। दूसरा यह कि सीधे हमला कर दिल्ली जीत भी ली तो भी उसकी रक्षा कैसे करें? रास्ते-रास्ते और घर-घर विद्रोहियों की ओर से चलती गोलीबारी में से कितने सोल्जर बचे रहेंगे? इस संबंध में अपना पक्का विचार बर्नार्ड भी कह नहीं पर रहा था। इस सारी चर्चा के बाद हमले के संबंध में भिन्न मत होने में ही इस युद्ध परिषद का एकमत हुआ। और इस तरह 12 जून को रात में आए स्वप्न की तरह 15 जून को भी आक्रमण की योजना त्यागकर तात्त्विक मत पक्का पकड़कर उसके विदास्पप्न भी वहा हो गए। 16 जून को युद्ध परिषद् की बैठक हुई। मर मत-भिन्नता और मन का धीरज कम होने में ही उसका अंत हुआ। अंग्रेज अधिकारी जिस समय एक ओर जोरदार और सीधे हमले की योजना बना रहे थे उसी समय दूसरी ओर दिल्ली में नए तरूण रक्त, नए खजाने, संपत्ति और नए उत्साह की बाढ़ आ रही थी और क्रांतिकारियों ने आज तक की बचाव की रणनीति छोड़कर अवसर के अनुरूप आक्रमण की नीति स्वीकार कर बीच-बीच में अंग्रेजी सेना पर छापे डाले और कभी-कभी उसमें सफल भी रहे। सारे हिंदुस्तान में जिन सिपाहियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया था उन सिपाहियों द्वारा अपने साथ लाए हुए खजाने, शस्त्रास्त्र, गोला-बारूद की दिल्ली में निरंतर आवक हो रही थी। इस कारण क्रांतिकारियों को युद्ध सामग्री या सिपाहियों की कमी नहीं थी। ऐसी स्थिति में उन्होंने आक्रमण की नीति अपनाई और अंग्रेजी सेना को एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने दिया। बीच में ही एकाध साहसी आक्रमण शत्रु पर करना, शत्रु को सताने की नीति होने से अंग्रेजी सेना पर उन्होंने अपनी दहशत बैठा दी और उन्हें आक्रामक नीति छोड़ने को बाध्य किया। 12 जून को कुछ क्रांतिकारी शहर से बाहर निकले, झाड़ियों, झुरमुटों और गड्ढे आदि के सहारे-सहारे अंग्रेजों की अगाड़ी को पर कर पचास गज से भी अधिक अंदर चले गए और अंग्रेजों को आहट होने के पहले ही उन्होंने उनपर हल्ला किया। अंग्रेजी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 240