१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहमें यह ज्ञात नहीं। पर वे शूर हैं, अतः उनकी हमें चिंता नहीं है। आपको छोड़कर जाना अवश्य हमारे लिए कठिन हो रहा है, पर उपाय नहीं। हिंदू धर्म के लिए और हिंदू राज्य के लिए फिर से एक बार प्रयास करने होंगे। इस हेतु यह संकट जो ईश्वर ने हमारे कारण आप पर लादा है, उसके लिए कृपा कर हमें क्षमा करें।''120 गंगा पार जाने के बाद पहला मुकाम फतेहगढ़ में था। अंग्रेजी सेना ने ब्रह्मवर्त का राजमहल धूल में मिलाया और वह अवध की ओर चल दी। नाना के आगे की हलचल की कोई सूचना न मिलने से हैवलॉक लखनऊ की ओर बढ़ा। जून माह के अंत में सारा अवध प्रदेश विद्रोह का एक जीवित छत्ता बन गया था, इसलिए उस प्रदेश से रास्ता निकालते हुए लखनऊ पहुंचना और वहां का घेरा उठाकर सर हेनरी लॉरेंस को मुक्त करना और यह कार्य बहुत दुष्कर होते हुए भी विजय के पहले आवेश में कानपुर से गंगा नदी उतरकर लखनऊ जीतना-हैवलॉक और उसकी सेना को बहुत सुलभ लग रहा था। दिल्ली गए-माने दिल्ली जीती, यह धारणा जैसे पंजाब से दिल्ली पहुंची अंग्रेजी सेना के सेनानियों को भ्रमित किए थी वैसी ही गंगा उतरना-माने लखनऊ जीतना, यह धारणा इलाहाबाद से आ रहे हैवलॉक को उत्साहित करने लगी। कानपुर से लखनऊ शहर कोई बहुत दूर नहीं था, यह बात सच थी; परंतु यह भी सच था कि इलाहाबाद से कानपुर आते समय हैवलॉक ने जो लगन और उत्साह प्रदर्शित किया वह यों तो दुष्कर कार्य कर डालने की स्फूर्ति देनेवाला था, परंतु अवध में जहां विद्रोह की ज्वाला न सुलगी हुई हो, ऐसा एक कदम भर स्थान इस समय शेष नहीं था। हिंदुस्थान में जहां पुरबिया सिपाहियों ने विद्रोह प्रारंभ किया, उन पुरबियों का अवध पालना होने से वहां के गावं-गावं में, झोंपड़े-झोंपड़े में उन पुरबियों के मां-बाप, बच्चे-बच्चों, नाते-संबंधी, दोस्त-यार सारे राज्य क्रांति की अनिवार्य चेतना से सुलगे हुए थे। फिर भी विजय से अभिभूत आंग्ल सेनानी को यह स्थिति डरा नहीं सकी। उलटे उसका उत्साह इतना बढ़ गया कि मैं देखते ही लखनऊ जीत लूंगा और फिर दिल्ली जाऊंगा और दिल्ली भी जीतकर फिर आगरा मुक्त करूंगा-ऐसी हिम्मत से हैवलॉक लगभग दो हजार अंग्रेजी सैनिक एवं दस तोपों सहित 25 जुलाई को गंगा पार हो गया। कानपुर में जनरल नील है और हैवलॉक लखनऊ जा रहा है-इस तरह की स्थिति जुलाई के अंतिम दिनों अंग्रेजी सेना की थी। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 258 120 'माझा प्रवास', विष्णुभट गोडसे, पृष्ठ 37 ।