१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण-9 अवध का रण अवध का राज डलहौजी द्वारा अधिगृहीत किए जाने के बाद से उस प्रदेश की प्रजा की दुर्दशा बढ़ती ही जा रही थी। अवध की स्वतंत्रता नष्ट हो जाने के बाद नवाब के राज्य में अंग्रेज अधिकारियों की नियुक्ति होने के कारण बड़े-बड़े पद-सम्मान से सारे स्वदेशी लोगों को पदच्युत होना पड़ा था। नवाब की सेना समाप्त कर दी गई। उसके सरदार दरिद्रता में धकेल दिए गए। उसके सरदार और मंत्री वैभव-विहीन होकर उपजीविका की कनिष्ठ सीढ़ी पर पहुंच गए। जिस गुलामी के कारण यह दुर्दशा उत्पन्न हुई थी उससे सबके मन में उसके प्रति भारी द्वेष बढ़ने लगा। राजधानी और राजदरबार में ही केवल दासता के ये पाश कसने लगे थे, ऐसा नहीं था। उस सारे प्रदेश में बड़े-बड़े जमींदारों और राजाओं के पीढ़ी-दर-पीढ़ी जो अधिकार, जागीरें, इनाम आदि चले आ रहे थे वे सब अंग्रेजों ने छीन लिये-इस कारण उन सब बड़े-बड़े राजाओं और जागीरदारों को अत्यंत कनिष्ठ स्वराज्य और अति श्रेष्ठ गुलामी में पहला कितना श्रेयस्कर, सम्मानपूर्ण और अभिनंदनीय होता है, यह पहचान हो गई थी। लगान बढ़ जाने से किसान नाराज हो गए। अंग्रेजी लश्कर के हिंदुस्थानी सिपाही, जो अधिकांश अवध के ही थे, उनके मन में भी मातृभूमि की इस दुर्दशा और दासता से व्यापक असंतोष बढ़ने लगा। युवा वाजिद अली शाह से अंग्रेजों ने कैसा घोर विश्वासघात किया था, इसे स्मरण करते हुए हर कोई अपनी तलवार पर हाथ धरे अपने होंठ चबाने लगा था। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 204