भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रवाह में सभी को छिन्न-भिन्न करता, जलाता और भस्म करता चला गया था। एक माह के भीतर रेजीमेंट-पर-रेजीमेंट, रजवाड़ों-पर-रजवाड़े, नगर-पर-नगरए सिपाही, पुलिस, जमींदार, पंडित, मौलवी और बहुमुखी क्रांति ने घंटानाद कर दिया था और मंदिरों तथा मस्जिदों में एक ही घोष गूंज रहा था-मारो फिरंगी को!' मेरठ जागा, दिल्ली जागी; बनारस, आगरा, पटना, लखनऊ, इलाहाबाद, जगदलपुर, झांसी, बांदा, इंदौर-सभी नगर जाग उठे-पेशावर से कलकत्ता और नर्मदा से हिमालय तक यह ज्वालामुखी के एक धधकते लावा के रूप में फूट पड़ा। तत्पश्चात्, ओ हुतात्माओ! हमें उन छोटी-बड़ी त्रुटियों के बारे में बताओ जो आपको इस महान् परीक्षण के दौरान हमारे सेनानियों में मिली। परंतु सर्वोपरि, उस सर्वाधिक घातक-नहींए, उस एकमात्र कमी की ओर भी इंगित करो, जो हमारे राष्ट्र के हित में संग्राम में शामिल होने के मार्ग पर चलने से इन्कार कर दिया। करो कि हिंदुस्तान की पराजय का एकमात्र कारण हिंदुस्तान था, कि शताब्दियों कि निद्रा से जागकर माता शत्रु पर प्रहार करने को उठी; पर जब उसका दाहिना हाथ फिरंगियों को मौत के घाट उतार रहा था, उसका वाम हस्त शत्रु पर नहीं बल्कि उसी के मस्तक पर प्रहार कर रहा थां इसीलिए माता डगमगाई और पचास वर्षों की अवश्यंभावी मूर्च्छा में धराशायी हो गई। पचास वर्ष व्यतीत हो गए, परंतु हे अशांत शूरवीरों ! विश्वास करो कि तुम्हारी हीरक जयंती तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति किए बिना नहीं संपन्न होगी। हमने तुम्हारी गर्जना को सुना है और हम उससे साहस प्राप्त करते हैं। अपने सीमित साधनों के बल पर आपने न केवल निरंकुश शासन के, बल्कि निरंकुश शासन और विश्वासघात दोनों के विरूद्ध लंबा युद्ध लड़ा। दोआब और अयोध्या ने संगठित होकर न केवल ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध संग्राम छेड़ा, बल्कि शेष भारत के विरूद्ध भी संग्राम छेड़ा। आपने तीन वर्षों तक युद्ध लड़ा और हिंदुस्तान का ताज फिरंगियों से लगभग छीन लिया था तथा विदेशी शासन के खोखले अस्तित्व को चकनाचूर कर दिया था। कितना कड़ा पराक्रम है यह! दोआब और अयोध्या जो काम एक माह में कर सकते थे, वही कार्य समूचे हिंदुस्तान का एक संगठित, आकस्मिक और संकल्पित जागरण एक दिन में ही कर सकता है। यही प्रत्याशा हमारे अंतर को प्रकाशित करती है और हमें सफलता का आश्वासन देती है तथा इसलिए हम सशपथ यह घोषणा करते हैं कि तुम्हारा हीरक जयंती वर्ष पुनरोदयी भारत को विजयी भाव के साथ विश्व में पर्दापण करते हुए देखे बिना नहीं व्यतीत होगा। बहादुरशाह की अस्थियां अपनी कब्र से प्रतिशोध का आह्वान कर रही हैं। मंगल पांडे की आत्मा अभी भी सलीब पर से पवित्र मिशन की पूर्ति के लिए पुकार रही है। 26