१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
प्रवाह में सभी को छिन्न-भिन्न करता, जलाता और भस्म करता चला गया था। एक माह के भीतर रेजीमेंट-पर-रेजीमेंट, रजवाड़ों-पर-रजवाड़े, नगर-पर-नगरए सिपाही, पुलिस, जमींदार, पंडित, मौलवी और बहुमुखी क्रांति ने घंटानाद कर दिया था और मंदिरों तथा मस्जिदों में एक ही घोष गूंज रहा था-मारो फिरंगी को!' मेरठ जागा, दिल्ली जागी; बनारस, आगरा, पटना, लखनऊ, इलाहाबाद, जगदलपुर, झांसी, बांदा, इंदौर-सभी नगर जाग उठे-पेशावर से कलकत्ता और नर्मदा से हिमालय तक यह ज्वालामुखी के एक धधकते लावा के रूप में फूट पड़ा। तत्पश्चात्, ओ हुतात्माओ! हमें उन छोटी-बड़ी त्रुटियों के बारे में बताओ जो आपको इस महान् परीक्षण के दौरान हमारे सेनानियों में मिली। परंतु सर्वोपरि, उस सर्वाधिक घातक-नहींए, उस एकमात्र कमी की ओर भी इंगित करो, जो हमारे राष्ट्र के हित में संग्राम में शामिल होने के मार्ग पर चलने से इन्कार कर दिया। करो कि हिंदुस्तान की पराजय का एकमात्र कारण हिंदुस्तान था, कि शताब्दियों कि निद्रा से जागकर माता शत्रु पर प्रहार करने को उठी; पर जब उसका दाहिना हाथ फिरंगियों को मौत के घाट उतार रहा था, उसका वाम हस्त शत्रु पर नहीं बल्कि उसी के मस्तक पर प्रहार कर रहा थां इसीलिए माता डगमगाई और पचास वर्षों की अवश्यंभावी मूर्च्छा में धराशायी हो गई। पचास वर्ष व्यतीत हो गए, परंतु हे अशांत शूरवीरों ! विश्वास करो कि तुम्हारी हीरक जयंती तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति किए बिना नहीं संपन्न होगी। हमने तुम्हारी गर्जना को सुना है और हम उससे साहस प्राप्त करते हैं। अपने सीमित साधनों के बल पर आपने न केवल निरंकुश शासन के, बल्कि निरंकुश शासन और विश्वासघात दोनों के विरूद्ध लंबा युद्ध लड़ा। दोआब और अयोध्या ने संगठित होकर न केवल ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध संग्राम छेड़ा, बल्कि शेष भारत के विरूद्ध भी संग्राम छेड़ा। आपने तीन वर्षों तक युद्ध लड़ा और हिंदुस्तान का ताज फिरंगियों से लगभग छीन लिया था तथा विदेशी शासन के खोखले अस्तित्व को चकनाचूर कर दिया था। कितना कड़ा पराक्रम है यह! दोआब और अयोध्या जो काम एक माह में कर सकते थे, वही कार्य समूचे हिंदुस्तान का एक संगठित, आकस्मिक और संकल्पित जागरण एक दिन में ही कर सकता है। यही प्रत्याशा हमारे अंतर को प्रकाशित करती है और हमें सफलता का आश्वासन देती है तथा इसलिए हम सशपथ यह घोषणा करते हैं कि तुम्हारा हीरक जयंती वर्ष पुनरोदयी भारत को विजयी भाव के साथ विश्व में पर्दापण करते हुए देखे बिना नहीं व्यतीत होगा। बहादुरशाह की अस्थियां अपनी कब्र से प्रतिशोध का आह्वान कर रही हैं। मंगल पांडे की आत्मा अभी भी सलीब पर से पवित्र मिशन की पूर्ति के लिए पुकार रही है। 26
निडर लक्ष्मीबाई का रक्त क्रोध से उबल रहा है। कुंवर सिंह की ब्रिटिश शासन को छिन्न-भिन्न करने की एकमात्र प्रतिज्ञा आज भी हिंदुस्तान की हवा में गूंज रही है। अजीमुल्ला खान और वीर अली शाह के तन से निकली रक्त-धाराओं ने इतिहास के पृष्ठों पर अमिट छाप छोड़ी है। क्योंकि जब अपना अपराध स्वीकार करने और युद्धनीति के रहस्यों को प्रकट करने से इंकार करने पर वीर तात्या टोपे को फांसी के फंदे पर ले जाया जा रहा था तो फिरंगियों के मुंह पर ही उन्होंने ये पैगंबरी शब्द बोले थे- “आज आप मुझे फांसी पर लटका सकते हैं-आप हर दिन मेरे जैसे अन्य लोगों को भी फांसी पर लटका सकते हैं; परंतु मेरे जैसे अन्य लोगों को भी फांसी पर लटका सकते हैं; परंतु मेरे स्थान पर हजारों क्रांतिकारी उत्पन्न होंगे और आपका उद्देश्य कभी भी पूरा नहीं होगा।‘’ हे भारतीय जन! इन शब्दों को पूरा किया जाना चाहिए। ओ हुतात्माओ! हमारे रक्त का प्रतिशोध अवश्य लिया जाएगा।
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अनुक्रम भाग- 1 : ज्वालामुखी 31
- स्वधर्म और स्वराज्य 33
- कारण परंपरा डलहौजी 44
- नाना साहब और लक्ष्मीबाई 46
- अवध 53
- धकेलो उसमें ़ ़ 62
- अग्नि में घी 72
- गुप्त संगठन 78 भाग-2 : विस्फोट 93
- शहीद मंगल पांडे 95
- मेरठ 100
- दिल्ली 107
- मध्यांतर और पंजाब 115
- अलीगढ़ और नसीराबाद 140
- रूहेलखंड 148
- बनारस और इलाहाबाद 154
- कानपुर और झांसी 176
- अवध का रण 204
- संकलन 218 भाग-3 : अग्नि-कल्लोल 233
- दिल्ली लड़ती है 235
- हैवलॉक 250
हिन्दू धर्म और हिंदू राज्य के लिए फिर एक बार जूझना होगा 257 3. बिहार 259 4. दिल्ली हारी 272 5. लखनऊ 284 6. तात्या टोपे 307 7. लखनऊ का पतन 316 8. कुंवर सिंह और अमर सिंह 333 9. मौलवी अहमद शाह 348 10. रानी लक्ष्मीबाई 357 भाग-4 : अस्थायी शांति 391
- विहंगावलोकन 393
- पूर्णाहुति 404 यत्र-तत्र तात्या टोपे 404
- समारोप 419
भाग-9 ज्वालामुखी प्रकरण -9
स्वधर्म और स्वराज्य धर्मासाठी मरावे, मरोनि अवघ्यांसी मारावें। मारिता मारित घ्यावें, राज्य आपुलें।। —स्वामी रामदास अर्थात्– धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें; मारते–मारते जीतें, राज्य अपना। कोई छोटा सा घर बनाना तो भी इतनी मजबूत नींव तो बनाई ही जाती है कि वह उसका भार सह सके। नींव मजबूत और घर का भार संभालने योग्य न हो तो उस नींव पर निर्मित मकान ताश के तंबू से अधिक भव्य या विशाल कभी भी नहीं माना जा सकता, यह बात अशिक्षित–गंवार भी जानता है। परंतु किसी सामान्य मनुष्य को भी ज्ञात यह व्यवहारज्ञान भुलाकर जब कोई लेखक प्रचंड क्रांति मंदिर किसी घास के तिनके पर निर्मित था–तो या तो वह पागल होता है या फिर क्षुद्र प्राणी। वह इन दोनों विशेषणों में से किसी एक का भी पात्र हो तो इतिहास–लेखन के पवित्र कार्य के लिए पूरी तरह अयोग्य है। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 33
बड़ी-बड़ी धर्म क्रांतियों या राज्य क्रांतियों के सतही स्वरूप में विहिप असंबद्धता या असमानता की निरंतरता उन क्रांतियों के मूल तत्त्व को समझे बिना कभी भी समझ में नहीं आ सकती। अनेक चक्र और अनेक लौह मार्गोंवाला कोई विशाल संयंत्र प्रचंड शक्ति से काम करता हो तो वह शक्ति किस यंत्र-शास्त्रीय नियम से उत्पन्न की गई है, यह पूर्ण रीति से समझे बिना देखनेवालों को आश्चर्य-मिश्रित विस्मय होगा। उसे ज्ञान से प्राप्त समझ या बूझ कभी नहीं कहा जा सकता। फ्रांस की राज्य क्रांति या हॉलैंड की धर्म क्रांति जैसी अद्भुत घटनाएं जब पाठकों एवं लेखकों को अपनी भव्यता से चकित करती हैं तब उनकी उस भव्यता में हक्का-बक्का होकर पाठक की दृष्टि और लेखक की लेखनी भी उसके मूल शक्ति-स्रोत को देखने-दर्शाने की हिम्मत नहीं कर पाती। परंतु उस मूल शक्ति को जाने बिना उस क्रांति का वास्तविक रहस्य कभी भी समझ में नहीं आता, अतः इतिहास शास्त्र में वर्णन से अधि कमूल स्रोत को दर्शाने ही अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। यह मूल स्रोत दर्शाने हुए बहुत बार इतिहास-लेखक और एक चूक करते हैं। प्रत्येक कार्य में कुछ प्रत्यक्ष, कुछ अप्रत्यक्ष, कुछ विशिष्ट और कुछ सामान्य, कुछ आकस्मिक और कुछ प्रधान कारण निहित होते हैं और उनका वर्गीकरण करने में ही इतिहास-लेखक का वास्तविक कौशल होता है। परंतु कुछ इतिहासकार यहां भ्रमित होकर इस वर्गीकरण में आकस्मिक कारणों को प्रधान कारण का स्वरूप दे देते हैं। किसी घर को आग लगने पर उस आग को लगानेवाले व्यक्ति को छोड़ उसके हाथ की माचिस की तीली पर सारा आरोप लादनेवाले मूर्ख न्यायाधीश की तरह वह इतिहासकार भी हास्यास्पद हो जाता है। आकस्मिक कारण को ही प्रधान कारण मानकर किसी ऐतिहासिक घटना का इतिहास लिखने से उस घटना न कुछ कारणों से घटित हुई देखकर उस घटक और उसमें सम्मिलित व्यक्तियों के लिए तुच्छ भावना उत्पन्न होने लगती है। इसलिए ऐतिहासिक घटनाओं का--और विशेषकर क्रांतिकारी घटनाओं का-इतिहास लिखते समय उसका केवल वर्णन लिखने से उकसी समुचित कल्पना प्रस्तुत करना संभव नहीं होता या उसका उद्गम उसके निमित्त कारण तक ही खोजकर लौट आने से भी उसका यथार्थ स्वरूप ज्ञात नहीं होता। अतः जिसे सत्य, पक्षपात-रहित और मर्मस्पर्शी इतिहास लिखना हो, उसे उस घटना और उस क्रांति की ज्वाला की नींव के कारणों का, उसके मूल में क्या तत्त्व थे, उसके प्रधान कारण क्या थे-इन सबका पर्यालोचन अवश्य करना चाहिए। 'हर क्रांति की नींच में कोई-न-कोई तत्त्व होना ही चाहिए' -इटली के प्रख्यात दार्शनिक और देशभक्त मैजिनी ने कार्लाइल लिखित फ्रांसीसी राज्य क्रांति की एक पुस्तक पर टीकात्मक लेख में ऐसा कहा है। क्रांति अथवा इतिहास में मनुष्य जाति के जीवन की उठा-पटक होती है। जिसके लिए लाखों जूझते हैं, राजसिंहासन जिस कारण डगमगाते हैं, 1857 का स्वातंत्र्य समर - 34
स्थापित मुकुट लुढ़कते हैं, अजन्मे मुकुट सिर चढ़ते हैं, स्थापित मूर्ति भंग होकर नई मूर्ति की स्थापना भी जिसके कारण होती है और प्रचंड समूह को लगने लगता है कि इसके आगे रक्त बहाना तो कुछ भी नहीं, ऐसे किसी विक्षोभक तत्त्व के सिवाय किसी अन्य क्षुद्र व क्षणिक नींव पर क्रांति के भव्य भवन का निर्माण असंभव है। पर क्रांति की नींव का यह तत्त्व जिस प्रमाण में पवित्र या अपवित्र होता है उसी प्रमाण में उस क्रांति के कार्यकर्त्ता-व्यक्ति के स्वरूप और कृत्य भी पवित्र या अपवित्र होते हैं। हेतु से जैसे कृत्य की परीक्षा सामान्य व्यवहार में की जाती है उसी तरह इतिहास में भी व्यक्ति या राष्ट्र के हेतु की परीक्षा सामान्य व्यवहार में की जाती है उसी तरह इतिहास में भी व्यक्ति या राष्ट्र के हेतु से उसके कृत्य का स्वरूप निश्चित होता है। यह कसौटी यदि छोड़ दे तो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को मारना या किसी एक सेना द्वारा दूसरी सेना को मारने में कोई भेद नहीं रहेगा। साम्राज्य के लिए सिकंदर की चढ़ाई और इटली की स्वतंत्रता के लिए गैरीबाल्डी द्वारा की गई चढ़ाइयां दोनों समान हेतु समझ लेना आवश्यक है उसी तरह हर क्रांति का यथोचित परीक्षण विवेचन करने के लिए उसका हेतु क्या था, अंतर्निहित इच्छा क्या थी, किस तत्त्व दर्शन से उसका उद्भव हुआ था, यह सब जानना आवश्यक है। सारांश यह कि ऐतिहासिक क्रांति के इतिहासकार को उस क्रांति में असंबद्ध दिखाई देनेवाले प्रसंगों को या उनकी अद्भुतता को देखकर विस्मित होकर वहीं बैठ नहीं जाना चाहिए, अपितु उसके उद्गम की खोज करते जाना चाहिए। इतना ही नहीं अपितु उस खोज में असंगत एवं आकस्मिक रूप से निकल आई शाखा को छोड़कर मूल के विस्तीर्ण प्रदेश का निरिक्षण करना चाहिए। इस तरह प्रारंभ किए जाने पर अनेक असंबद्ध घटनाओं में पूर्ण संबद्धता दिखने लगती है, वक्र लगने लगती है। अंधकार में प्रकाश दिखने लगता है और प्रकाश में अंधेरा दिखाई देता है। नीचता में उच्चता और उच्चता में नीचता दृष्टिगोचर होती है, विद्रूपता में सुरूपता और सुरूपता में विद्रूपता मिलती है और अपेक्षित या अनपेक्षित रीति से परंतु स्पष्ट स्वरूप में वह क्रांति इतिहास के सामने आती है। सन् 1857 जैसी प्रचंड क्रांति बिना हेतु के घटित होना संभव है क्या? पेशावर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 35
से कलकत्ता तक जो आंधी चली उसका हेतु इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि से अपनी सामर्थ्य भर कुछ खास चीजों को नष्ट कर देना है। दिल्ली पर डाले गए घेरे, कानपुर में हुए कत्ल, साम्राज्य के ऊंचे उठे ध्वज और उस ध्वज की छाया में लड़ते-लड़ते रणतीर्थ में शूरों द्वारा लगाई गई छलांगे जैसी उदात्त एवं स्फूर्तिजनक घटनाएं किसी एक अति उदात्त एवं स्फूर्तिजनक हेतु के बिना संभव थी क्या? कोई हर हफ्ते लगनेवाला बाजार भी अकारण नहीं लगता। फिर जिस बाजार का आयोजन करने की तैयारी वर्षों से चल रही थी, जिसकी दुकानें पेशावर से कलकत्ता तक के हर सिंहासन पर सजनेवाली थीं, जिसमें राज्य और साम्राज्य का लेन-देन चल रहा था और जहां रक्त और मांस के सिक्कों के सिवाय और किसी सिक्के की पूछ नहीं थी-वह बाजार क्या यों ही लगा और यों ही उठ गया? ऐसा नहीं हो सकता। ज्ञात होना बहुत कठिन है, इसलिए नहीं अपितु वह ज्ञात हुआ, यह मानना अपने हित में न होने के कारण इस मुद्दे की ओर अंग्रेज़ इतिहासकारों ने दुर्लक्ष्य किया है। परंतु इस दुर्लक्ष्य से भी अधिक उलझानेवाली और सन् 1857 के क्रांतियुद्ध के स्वरूप को सर्वाधिक भ्रष्ट करनेवाली दूसरी युक्ति या चूक विजातीय एवं उनकी धूल ओढ़नेवाले स्वजातीय इतिहासकारों ने जो की है, वह यह है कि इस सन् 1857 के प्रलय का कारण दूसरा कुछ नहीं, मुट्ठी भर लालची लोगों द्वारा उठाई गई कारतूसों की अफवाह है। अंग्रेज़ इतिहासकार और अंग्रेज़ों की कृपा पर पले-बढ़े एक देसी ग्रंथकार कहते हैं-कारतूसों में गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है, केवल इतना सुनकर ही मूर्ख लोग भड़क गए। सुनी हुई बात सच है या झूठ, इसकी खोज किसी ने नहीं की। एक ने कहा, इसलिए दूसरे ने कहा और दूसरा बिगड़ गया इसलिए तीसरा बिगड़ गया। ऐसी अंधपरंपरा चली जिससे अविवेकी मूर्खों का समाज जमा हुआ और विद्रोह हो गया। कारतूसों की बात पर लोगों ने अंधपरंपरा से विश्वास किया या क्या हुआ, इसका निर्णय आगे यथास्थान किया जाएगा, परंतु ये सच्चे या झूठे विश्वास विद्रोह की जड़ें थीं, यह विचार उत्पन्न करने का कैसा सुदीर्घ प्रयास चल रहा था, यह इससे स्पष्ट होता है। सन् 1857 जैसी प्रचंड क्रांति ऐसे कारणों से उत्पन्न होगी, यह कहनेवाले मंद या कुटिल बुद्धि के लोगों को क्रांति एक अविवेकी मूर्खों का समाज लगता है; लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यदि सन् 1857 की क्रांति मुख्यतः कारतूसों के कारण ही प्रदीप्त हुई तो उसमें नाना साहब, दिल्ली का बादशाह, झांसी की रानी या रोहिलखंड का खान बहादूर कैसे सम्मिलित हुए? इनको अंग्रेजी सेना में नौकरी करनी नहीं थी या घर बैठे भी वह फौजी कारतूस तो तोड़ने ही होंगे, ऐसा आदेश भी किसी ने उन्हें नहीं दिया था। यदि यह विद्रोह केवल या मुख्य रूप से कारतूसों की चरबी से ही हुआ था तो हिंदुस्तान के अंग्रेज गवर्नर द्वारा उसे उपयोग में न लाने का आदेश देते ही उसे तुरंत ठंडा हो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 36
जाना चाहिए था। पर सिपाही अपने हाथ से अपने कारतूस बना लें, ऐसी अनुमति मिलने पर भी उसका उपयोग न कर या सेना की नौकरी छोड़ सारी किटकिट से परे न हटकर सेना के सिपाहियों ने ही नहीं बल्कि सेना से जिनका दूर का भी संबंध नहीं था-ऐसे लाखों लोगों ने, राजा-महाराजाओं ने अपने प्राण रणभूमि पर क्यों अर्पित किए? फौजी और सामान्य जन, राजा और रंक, हिंदू और मुसलमान-इन सबको एक साथ आवेशित करनेवाली बातें क्षुद्र नहीं होती, उसके मूल में होते हैं तात्त्विक कारण। कारतूसों का डर ही विद्रोह का प्रमुख कारण है-इस कथन में जितनी अर्थयार्थता है उतनी ही इस तर्क में भी कि उस विद्रोह का उद्गम केवल अवध का राज छीनने में था। अवध के राज्य के हित-अहित से जिनका कुछ भी संबंध नहीं था, ऐसे कितने ही लोग इस भयंकर क्रांति में सिर हाथ पर लिये लड़ रहे थें फिर उस लड़ाई से उनका क्या हेतु था? स्वयं अवध का नवाब तो कलकत्ता के किले में बंद था और उसकी प्रजा अंग्रेज इतिहासकारों के कथनानुसार नवाब के शासन से बेहद नाखुश थी। फिर पंजाब से बंगाल तक केवल राजा या लश्कर के लोग ही नहीं अपितु हर असल हिंदू व्यक्ति अपनी शमशीर ताने क्यों खड़ा था? सन् 1857 की क्रांति पर लिखा एक लेख किसी हिंदू ने उसी समय इंग्लैंड में प्रकाशिात कराया था। उसमें वह हिंदू कहता है-"जिन्होंने अवध के नवाब को जन्म से भी कभी नहीं देखा था और न आगे देखने की संभावना थी, ऐसे कितने ही सरल और दयालु लोग अपनी-अपनी झोंपड़ियों में नवाब पर आ पड़े दुःखों को कहते जार-जार रोते थे, इसकी कल्पना आपको नहीं हैं। और ऐसे आंसू बह जाने के बाद, जैसे स्वयं पर ही क्रूर प्रहार हो रहे हों, ऐसा मानकर वाजिद अली शाह के अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा कितने सिपाही प्रतिदिन कर रहे थे, यह भी आपको ज्ञात नहीं˙ ˙ ˙ ˙।”² इन सिपाहियों को उससे सहानुभूति क्यों होने लगी और जिन्होंने नवाब को जन्म से नहीं देखा था उनकी आंखें और कंठ क्यों भर आए? अतः अवध का राज्य हड़पने से विद्रोह नहीं उपजा अपितु इन राज्यों को हड़पने में जिस तत्त्व का हनन हो रहा था 1857 का स्वातंत्र्य समर – 37 ² यह लेख इंडिया ऑफिस के ग्रंथालय में है। यह लेख अनेक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस लेख में से निम्न उद्धरण दिए बगैर रहा नहीं जाता- “Your (Englishmen’s) conduct has all along been mean and pettifogging. Your accuse our ancient moghul rulers of despotism. They were despotic to some extent; but on the whole, they knew how to goern an empire&you know to keep a shop. They has a large mind; you have an ingenious and a crafty one. They could conceive of grand projects. Despite their faults, they were loved by a grand people like us. They settled in the country and tried to improve it. Your servants come here only to make money and go home as soon as they have satisfied themselves on the score. Indeed, in as much as we have come to know you, we have learnt to dispise you. With increasing knowledge we have known that the Anglo-Saxon race is selfish and gypocritical in the extreme and always unprincipled in matters of gain!” यह लेख करीब 25 पृष्ठों का है और दि. 13.10.1857 को प्रकाशित हुआ है।
उसके कारण विद्रोह उपजा। कारतूसों का डर या अवध का राज्य हड़पना गौण औ आकस्मिक कारण थे। इन्हीं को प्रधान कारण मानने से सन् 1857 की क्रांति का वास्तविक स्वरूप कभी भी ज्ञात नहीं हो पाएगा। इन निमित्त कारणों को ही मूल कारण मान लें तो उसका अर्थ यह होगा कि यदि ये विशिष्ट कारण घटित या अवध का अधिग्रहण न किया गया होता तो सन् 1857 की क्रांति घटित न होती। परंतु इस प्रकार के विचार से अधिक भ्रामक और मूर्खतापूर्ण अन्य कोई मान्यता मिलना असंभव है। कारण, उस डर के मूल में छिपा तत्त्व यदि किसी और घटना द्वारा प्रकट हो जाता तो भी यह क्रांतियुद्ध होता ही, भले ही अवध का राज्य हड़पा न गया होता। फ्रांस देश की राज्य क्रांति का प्रधान कारण जैसे अनाज के बढ़े हुए मूल्य या बास्तील या राजा का पेरिस छोड़कर जाना या दावतों का रंग नहीं था वैसे ही उपर्युक्त आकस्मिक एवं विशिष्ट घटनाएं इस प्रचंड क्रांति के प्रधान कारण न होकर केवल निमित्तभूत कारण हैं। जैसे सीता-हरण रामायण का केवल निमित्त है और मुख्य या प्रधान कारण उसके मूल में छिपे तत्त्व ही हैं। वे तत्त्व कौन से थे? हजारों शूरों की तलवारों को उनकी म्यानों से खींचकर रणांगण में चमचमानेवाले वे तत्त्व कौन से हैं? निस्तेज हुए मुकुटों को सतेज करनेवाले और टूटे पड़े ध्वजों को फिर से खड़ा करनेवाले वे तत्त्व कौन से थे जिनपर हजारों व्यक्तियों ने अपने उष्ण रक्त का अभिषेक करना वर्षानुवर्ष अखंड प्रेम से चालू रखा है, ऐसे तत्त्व कौन से थे? मौलवी जिनका उपदेश करते थे, ब्राह्मण जिन्हें 'विजयी भवः' कहकर आशीर्वाद देते थे, दिल्ली की मस्जिद से और काशी के मंदिरों से जिनकी यशःप्राप्ति के लिए परमेश्वर की ओर दिव्य प्रार्थनाएं भेजी जाती थी, जिनकी सहायता के लिए श्रीमंत हनुमानजी ने स्वयं कानपुर के रण-मैदान पर हुंकार भी और जिनके लिए झांसी की महालक्ष्मी ने शुंभ-निशुंभ के रक्त से भीगी अपनी पुराण-प्रसिद्ध तलवार फिर से चलाई, ऐसे वे तत्त्व कौन से थे? सन् 1857 की क्रांति के प्रधान कारण जो दिव्य तत्त्व थे-स्वधर्म व स्वराज्य। अपने प्राणप्रिय धर्म पर भयंकर, विघातक एवं कपटपूर्ण हमला हुआ है, यह यथार्थ दिखते ही स्वधर्म-रक्षणार्थ जो 'दीन-दीन' की गर्जना शुरू हुई उस गर्जना में और अपनी प्रकृति दत्त स्वतंत्रता के कपटपूर्ण छीने जाने पर और अपने पैरों में पड़ी राजनीतिक गुलामी की जंजीरें देखते ही स्वराज्य प्राप्त करने की पवित्र इच्छा उत्पन्न होने के कारण इस दास्य श्रृंखला पर जो प्रचंड आघात किए गए उन्हीं में इस क्रांतियुद्ध की जड़ें हैं। स्वधर्म-प्रीति एवं स्वराज्य-प्रीति के तत्त्व हिंदुस्थान के इतिहास में जितनी स्पष्टता से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 38
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य (transcription) दिया जा रहा है:
एवं उदात्तता से दिखते हैं उससे अधिक वे किस इतिहास में मिलनेवाले हैं? विदेशी और स्वार्थी इतिहासकारों ने इस दिव्य हिंद का चित्र कितने ही गंदे रंगों से भरा हो, फिर भी जब हमारे इतिहास के पृष्ठों पर से चित्तौड़ का नाम पोंछा हुआ नहीं है, सिंहगढ़ का नाम मिटा नहीं है, प्रताप आदि का नाम मिटा नहीं हैं या गुरू गोविन्द सिंह का नाम पोंछा नहीं गया है, तब तक ये स्वधर्म और स्वराज्य के तत्त्व हिंदुस्थान के रक्त-मांस में जमे रहेंगे। उनपर क्षण भर गुलामी के भ्रम के बादल चाहे आएं-सूर्य पर भी बादल आते हैं-परंतु वह क्षण समाप्त होते-न-होते उस तत्व सूर्य की उष्णता से वे पिघल जाएंगे, इसमें शंका नहीं। स्वराज्य के लिए हिंदुस्थान ने कौन सा प्रयास नहीं किया और स्वधर्म के लिए हिंदुस्थान ने कौन सी दिव्यता अंगीकार नहीं की। ˙˙˙"सूरा सो पचालिए जो लढ़े दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरे तबहु न छोड़े खेत।''(गुरू गोविंद सिंह) इस रीति से स्वधर्म के लिए रण-मैदान में टुकड़े-टुकड़े हो जाने पर भी जो हटते नहीं-वीरों की ऐसी घटनाओं से भारतभूमि का संपूर्ण इतिहास भरा हुआ है। इस परंपरागत एवं तत्त्व का संचार होने के लिए सन् 1857 के वर्ष में जितने कारण घटित हुए उतने पहले कुछेक बार ही घटित हुए थे। इन विशिष्ट घटनाओं से हिंद भूमि के शरीर में किंचित् प्रस्फुरण हुआ, इन मनोवृत्तियों को विलक्षण चेतना मिली और स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए लोक-शक्तियां सज्जित होने लगी। दिल्ली के बादशाह द्वारा स्वराज्य-स्थापना के लिए जारी घोषणापत्र में वे कहते हैं और अपने प्राणप्रिय धर्म एवं प्राणप्रिय देश को पूरी तरह भयमुक्त कर सकते हैं।''³ इस वाक्य में उल्लेखित दिव्य तत्त्वों के लिए जो क्रांति होती है, अपने प्राणप्रिय धर्म को एवं अपने प्राणप्रिय देश को बंधनमुक्त करने के लिए जो क्रांतियुद्ध से अधिक पवित्र विश्व में दूसरा क्या मिलनेवाला है? स्वदेश-रक्षा, स्वराज्य-संस्थापन एवं स्वधर्म-परित्राण के लिए दिल्ली के सिंहासन से प्रार्थित इस स्पष्ट दिव्य एवं स्फूर्तिजनक मंत्र में ही सन् 1857 की क्रांति का बीज है। बरेली में मुद्रित कर प्रकाशित किए हुए, अवध के नवाब द्वारा निकाले गए दूसरे एक आज्ञापत्र में वे कहते हैं-"हिंदुस्थान के सारे हिंदुओं और मुसलमानो, उठो! स्वदेश बंधुओं, परमेश्वर की दी हुई सौगात में सबसे श्रेष्ठ सौगात स्वराज्य (Sovereign) ही है। यह ईश्वरीय सौगात जिसने हमसे छल से छीन ली है उस अत्याचारी राक्षस को वह बहुत दिन प्रचेगी क्या? यह ईश्वरीय इच्छा के विरूद्ध किया गया कृत्य क्या जय प्राप्त करेगा? नहीं, नहीं। अंग्रेजों ने इतने जुल्म ढाए हैं कि उनके पाप के घड़े पहले ही लबालब भरे हुए हैं। और 1857 का स्वातंत्र्य समर – 39 ³ लेकी द्वारा लिखित-'फिक्शन एक्सपोज्ड'।
उसमें हमारे पवित्र धर्म का नाष करने की कुबुद्धि और समा गई है। अब आप अभी भी शांति से बैठे रहेंगे क्या? आप शांति से बैठे, यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है। क्योंकि सारे हिंदुओं और मुसलमान के हृदय में उसी की इच्छा उत्पन्न हुई हैं-परमेश्वर की इच्छा-और आपके पराक्रम से जल्दी ही उनका ऐसा सर्वनाश हो जाएगा कि अपने हिंदुस्तान में उनका छिलका, टुकड़ा भी नहीं रहेगा। छोटे-बड़े के सारे भेदभाव भुलाकर इस सेना में सब ओर समता का राज हो। क्योंकि पवित्र धर्मयुद्ध में जो वीर स्वधर्म के लिए अपनी तलवार म्यान के बारह निकालते हैं वे सब समान योग्यता के होते हैं। वे भाई-भाई हैं। उनमें किसी तरह का भेद नहीं है। इसलिए फिर से एक बार मैं सारे हिंदू बंधुओं का आह्वान करता हूं-उठो और इस परम ईश्वरीय और दिव्य कर्तव्य के लिए रण-मैदान में कूद पड़ो।'"⁴ ये तत्त्वरत्न देखकर जिसे इस क्रांतियुद्ध की ओजस्विता भासित नहीं होगी उसे या तो मंदबुद्धि या दुर्बुदि होना चाहिए। ईश्वर-प्रदत्त अधिकारों के लिए लड़ना मनुष्यमात्र का कर्तव्य है और स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए लड़ने को ही उस मय के भारतीय शूरों ने अपने शस्त्र निकाले थे, यह सिद्ध करने के लिए इससे सबल साक्ष्य और क्या दिया जा सकता है! भिन्न-भिन्न स्थानों और भिन्न-भिन्न कालों में निकाले गए ये घोषणापत्र इस क्रांतियुद्ध की मीमांसा करने के लिए एक अक्षर भी और अधिक लिखने की आवश्यकता शेष नहीं रहने देते। ये घोषणापत्र ऐरे-गैरे द्वारा निकाले हुए नहीं हैं। इस युद्ध में जो भी शमशीर निकालते हैं वे सब समान योग्यता के हैं। धर्मयुद्ध में उठी यह गर्जना 'स्वधर्म एवं स्वराज्य' दोनों तत्त्वों का उच्चारण एवं जयघोष करती है। पर क्या ये दोनों ही तत्त्व (स्वराज्य-स्वधर्म) परस्पर विरुद्ध या भिन्न समझे जाते थे? स्वधर्म एवं स्वराज्य का एक-दूसरे से किसी भी अर्थ में संबंध नहीं है, ऐसी कम-से-कम प्राचीन लोगों की धारणा कभी नहीं थी। मैजिनी के कथानुसार, स्वर्ग और पृथ्वी को किसी एक बांस के बीच में बांधकर अलग नहीं किया गया है। ये दोनों तो एक ही वस्तु के दो छोर हैं। ऐसी ही प्राचीन जनों की पूर्वा पर यथार्थ एवं परिपक्व धारणा है। हमारी स्वधर्म के कल्पना स्वराज्य से भिन्न नहीं है। ये दोनों साध्य नाते से संलग्न हैं। स्वधर्म के बिना स्वराज्य तुच्छ है और स्वराज्य के बिना स्वधर्म बलहीन है। स्वराज्य 1857 का स्वातंत्र्य समर – 40 ⁴ लेकी कृत-'फिक्शन एक्सपोस्ड' में वर्णित यह घोषणापत्र उस क्रांतियुद्ध के समय लोक-वृत्ति किस तरह चेत गई थी-यह दर्शाने को बहुत उपयोगी है। इसका काफी कुछ अंश आगे भी दिया जाएगा।
नामक ऐहिक सामर्थ्य की तलवार स्वधर्म नामक पारलौकिक साध्य के लिए हमेशा बाहर निकली रहनी चाहिए। यह प्राचीन जनों के मन का रुझान इतिहास में पग-पग पर दिखेगा। प्राचीन काल में हुई क्रांतियों को धार्मिक स्वरूप क्यों मिलता है, या यह कहें कि धार्मिक पवित्रता के या धर्म-संलग्नता के सिवाय प्रचंड क्रांति का होना-यह बात प्राचीन इतिहास में बिल्कुल भी क्यों ज्ञात नहीं है, इसका बीज भी धर्म के इस विश्व व्यापक स्वरूप में ही है। हिंदुस्थान के इतिहास में आज तक अखंड रूप से व्यक्त होते आए स्वराज्य एवं स्वधर्म के साधन और साध्य तत्त्व इस सन् 1857 के क्रांतियुद्ध में भी व्यक्त हुए, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है। दिल्ली के बादशाह द्वारा पहले-पहल निकाले गए घोषणापत्र का उल्लेख पहले किया गया है। उसके बाद जब दिल्ली को अंग्रेजी सेनाओं ने घेर लिया और युद्ध घमासान हो गया तब बादशाह ने हिंदुओं के लिए दूसरा घोषणापत्र जारी किया। उसमें वे कहते हैं- "जीम राजगान वो रोसाए हिंद पर वाझे होके तुम बेहामा उजूः नेकी और फय्याजी में मुश्तईर उद्दईर हों ़ ़ ़ खुदावंत ने तुमको ये मर्तबए आली और मुल्क और दौलत और हुकूमत इसी वास्ते बख्शी है कि तुम उन लोगों को, जो तुम्हारे मजहब में दखलंदाजी करें, गारद करों ़ ़ ़ ।" (हमें ईश्वर ने संपत्ति, देश, अधिकार किस लिए दिए हैं? ये सभी केवल व्यक्ति से संबंधित सुख-भोग के लिए न होकर स्वधर्म-संरक्षण के पवित्र हेतु के लिए हैं।) परंतु इस पवित्र एवं अंतिम हेतु के ये साधन कहां है? पहले दिए हुए घोषणापत्र के अनुसार परमेश्वर की सब सौगातों में अत्यंत श्रेष्ठ स्वराज की सौगात कहां है? दौलत कहां है? मुल्क कहां है? हुकूमत कहां है? गुलामी के प्लेग में यह सारी दैविक स्वतंत्रता मृतप्राय हो गई है। गुलामी का प्लेग किस तरह संहार कर रहा है, यह दिखाने के लिए उपर्युक्त घोषणापत्र में नागपुर का, अवध, झांसी का स्वराज्य-सब कैसे धूल में मिला दिए गए, इसका मार्मिक वर्णन करने के बाद ऐसी चेतावनी दी गई है कि इस तरह धर्म-रक्षण के साधन गंवाने पर तुम परमेश्वर के दरबार में अपराधी और धर्मद्रोही माने जाओगे। ़ ़ ़ ़ स्वधर्म के लिए उठो और स्वराज्य प्राप्त करो'-इस तत्त्व ने हिंदुस्थान के इतिहास में कितने दैवी चमत्कार किए हैं? श्री समर्थ रामदास न महाराष्ट्र को ढाई सौ वर्ष पहले यही दीक्षा दी थी- "धर्मासाठी मरावें, मरोनि अवघ्यांसि मारावें। मारिता मारिता घ्यावे, राज्य आपुलें।" 1857 का स्वातंत्र्य समर - 41
धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें; मारते-मारते जीतें, राज्य अपना। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध का यही तात्त्विक कारण है। इस क्रांतियुद्ध का यही मनःशास्त्र है। जिस दूरबीन से उस युद्ध का स्पष्ट एवं सत्य स्वरूप दिखेगा, ऐसी खरी दूरबीन अर्थात् ˙ ˙ ˙ 'धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें, मारते-मारते जीतें राज्य अपना। इस दूरबीन से उस क्रांति की ओर देखें तो कितना अलग दृश्य दिखने लगता है! स्वधर्म एवं स्वराज्य-इन दो पवित्र कारणों से जो क्रांतियुद्ध लड़ा गया उसकी पवित्रता पराजय से भंग नहीं होती। गुरू गोविंद सिंह के प्रयास तादृश रीति से विफल रहे, इस कारण उसका दिव्यत्व कम नहीं होता। या सन् 1857 में इटली में राज्य क्रांति की जो विशाल लहर उठी उसमें उस क्रांति के नेताओं की संपूर्ण पराजय हुई, इस कारण उनके हेतु का पुण्य क्षीण नहीं होता। जस्टिन मैकार्थी ने कहा है-‘‘वस्तुस्थिति यह है कि भारतीय प्रायद्वीप के संपूर्ण उत्तरी एवं उत्तर-पश्चिम प्रदेशों में ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध देशी जातियों ने विद्रोह कर दिया था। केवल सिपाहियों ने ही विद्रोह नहीं किया, इसे कोरी सैनिक क्रांति का ही नाम नही ˙दिया जा सकता। यह तो भारत पर आंग्ल सत्ता के विरूद्ध सैनिक कठिनाइयों, राष्ट्रीय घृणा और धार्मिक कट्टरता का संयुक्त उभार था। इसमें देशी राजाओं और सैनिकों ने भी भाग लिया मुसलमान और हिंदुओं ने अपने शताब्दियों के धार्मिक विरोध आंदोलन को प्रोत्साहित किया था। चरबीवाले कारतूसों के विवाद ने तो केवल चिंगारी दहकाई और उस चिंगारी ने सभी ज्वलनशील पदार्थों में आग भड़का दी। यदि इस चिंगारी से अग्नि प्रज्वलित न होती तो किसी अन्य माध्यम से भी यही कार्य संपन्न हो जाता। ˙ ˙ ˙ मेरठ के सिपाहियों ने क्षण भर में ही एक नेता पा लिया, उन्हें एक ध्वज भी मिल गया और उद्देश्य भी और यह विद्रोह एक क्रांतियुद्ध में परिणत हो गया। जब वे प्रातःकालीन सूर्य की रश्मियों से जगमगाती यमुना के तट पर पहुंचे तो उन्होंने अनजाने में ही इतिहास की एक निर्णायक घड़ी को प्राप्त कर लिया तथा सैनिक विद्रोह को एक राष्ट्रीय धर्मयुद्ध में परिणत कर दिया।’’⁵ चार्ल्स बाल लिखते हैं-‘‘आगे चलकर धारा किनारों को तोड़कर बह निकली और उसने भारत की सैनिक वसुंधरा को आप्लावित कर दिया। उस समय तो यही आशा की जाती थी कि ये धाराएं संपूर्ण यूरोपीय तत्त्वों को विनष्ट कर निगल जाएंगी। जिस समय विद्रोह की यह धारा पुनः मर्यादित होगी और अपने आपको सीमाओं में आबद्ध 1857 का स्वातंत्र्य समर – 42
⁵ 'हिस्ट्री ऑफ अवर ओन टाइम', खंड 3 ।
कर लेगी तो राष्ट्रभक्त भारत अपने विदेशी शासकों से अपने आपको स्वतंत्र कर लेगा तथा वह देशी राजाओं के स्वतंत्र राज्यदंड के सम्मुख नतमस्तक होगा। अब यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण रूप ग्रहण कर चुका था। यह विद्रोह उस संपूर्ण जनता के विद्रोह का रूप धारण कर चुका था जो काल्पनिक गलतियों से क्षुब्ध होकर भड़क उठी थी और घृणा व कट्टरता के भ्रम में आबद्ध हो चुकी थी।'"⁶ 'कंपलीट हिस्ट्री ऑफ द ग्रेट सेपॉय वार' शीर्षक अपनी पुस्तक में हाइट लिखते हैं- "यदि मैं अवधवासियों के द्वारा प्रदर्शित साहस की प्रशंसा नहीं करूंगा तो एक इतिहासकार का पावन दायित्व न निभा पाऊंगा । नैतिक दृष्टि से अवध के तालूकेदारों की एक महान् भूल यह थी कि उन्होंने हत्यारे विद्रोहियों से हाथ मिलाया। किंतु इसके लिए भी उन्हें सदुद्देश्य से प्रेरित निष्ठावान देशभक्तों के रूप में मान्यता दी जा सकती है, क्योंकि वे अपनी मातृभूमि और सम्राट् के लिए संग्राम कर रहे थे, स्वराज्य और स्वधर्म के लिए संघर्षरत हुए थे।" 1857 का स्वातंत्र्य समर – 43 ⁶ सर जॉन के, 'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 644 ।
प्रकरण-2 कारण परंपरा स्वधर्म एवं स्वराज्य-इन दो देवताओं का अधिष्ठान रखकर सन् 1857 में प्रारंभ हुए इस रण-यज्ञ का संकल्प कब लिया गया? अंग्रेज इतिहासकारों के अनुसार, इस रण-यज्ञ का संकल्प डलहौजी साहब के कार्यकाल में लिया गया था। उनकी यह धारणा भ्रमपूर्ण है। जिस क्षण हिंदुस्थान के तट पर परतंत्रता ने पहला कदम रखा तभी। बेचारा डलहौजी! उसने अधिक बुरा किया ही क्या? हिंदुस्थान की जन्मजात स्वतंत्रता का हरण कर इसके बदले गुलामी और स्वधर्म के स्थान पर ईसाइयत लादने का पातकी विचार जब पहले-पहल अंग्रेज व्यापारियों के मन में आया, तभी से हिंद भूमि के हृदय में क्रांति चेतना का संचार हुआ है। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध का कारण अंग्रेजों के 'अच्छे शासन' या 'बुरे शासन' में न होकर केवल 'शासन' में है। अच्छा या बुरा का प्रश्न गौण है, मुख्य प्रश्न 'शासन' है। जिस देश को हिमालय ने उत्तर और समुद्र देवता ने 'दक्षिण' की ओर से सुरक्षित किया हुआ है उस निसर्गतः बलिष्ठ एवं निसर्गप्रिय हिंदुस्थान पर अंग्रेजों की सत्ता चलने देना है या नहीं, यह मुख्य प्रश्न सन् 1857 के समर-पट पर हल किया जा रहा था, यह यदि सत्य है तो फिर इस समर की मूल उत्पत्ति तभी ही हुई होगी जब यह प्रश्न पहले-पहल सामने आया होगा। मैजिनी कहता है-"स्वतंत्रता प्रत्येक का प्रकृतिदत्त अधिकार है और इसलिए इस पवित्र अधिकार का अपहरण करने की इच्छा के अत्याचार को मिटाना भी प्रत्येक का प्रकृतिदत्त कर्तव्य है। व्यक्ति की, राष्ट्र की एवं मनुष्य जाति की प्रगति के लिए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 44
प्रथम भाग: ज्वालामुखी (स्वधर्म, स्वराज्य व क्रांति योजना)
उसमें चैतन्य चाहिए। परंतु जहां स्वतंत्रता नहीं होती वहां चैतन्य रहना संभव नहीं। जो लोगों की स्वतंत्रता छीन लेता है वह लोगों की प्रगति का विरोध कर पर-पीड़न का अक्षम्य पाप करता है। इतना ही नहीं अपितु अनजाने सारी मानव जाति का अर्थात् अपनी ही गरदन पर कुल्हाड़ी मारकर आत्महत्या के भयंकर पाप का भी भागीदार हो जाता है। यह पाप कर के आज तक किसका उद्धार हुआ है? ये गुलामी की बेड़ियां परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपने मानवी बंधुओं के पैरों में जकड़कर आज तक किस पक्ष की विजय हुई है? स्वतंत्रता और गुलामी के झगड़े में अंतिम जय स्वतंत्रता की ही होती है।"7 सीले कहता है-"अंग्रेजों का हिंदुस्थान से संबंध प्रकृति से मजाक है। इन दो देशों में किसी तरह का प्राकृतिक बंधन नहीं है। उनका रक्त भिन्न है।"8 पर यह सब भूलकर जिस वर्ष क्लाइव ने स्वार्थ और अन्याय का साम्राज्य स्थापित करने के लिए प्लासी के मैदान पर रक्त-मांस की नींव रखी उस सन् 1687 के ही वर्ष इस क्रांतियुद्ध के बीज कहां-कहां नहीं बोए? हेस्टिंग ने काशी, रोहिलखंड और बंगाल में वे बीज बोए तो वेलेजली ने मैसूर, आसई, पुणे, सतारा एवं उत्तरी हिंदुस्थान की उपजाऊ भूमि में उसकी बुआई की। इस बुआई में उन्हें कुछ भी कष्ट नहीं हुए, ऐसा नहीं है। तलवार और तोपों से हिंदुस्थान की भूमि जोतनी पड़ी। क्योंकि अन्य किन्हीं ऐरे-गैरे हलों को श्री वर्धन के परकोटे, शनिवार के बाड़े, सह्याद्रि के टीले, आगरा के बुर्ज और दिल्ली के भरी सिंहासन दाद न देते। इस पथरीली भूमि पर हल चलाकर उन्हें इकसार करने के बाद बीच में बचे-खुचे छोटे-बड़े ढेलों को भी फोड़ा गया। वचन भंग, अविश्वास, घात, जुल्म आदि छोटे-बड़े हथौड़ों से छोटे-छोटे रियासतदार समाप्त किए गए। सेना में नेटिव सिपाहियों का अपमान होने लगा। उनपर उन्मत्त फिरंगी अधिकारियों के हाथों कोड़ों की मार पड़ने लगी। उनके पराक्रम से नए प्रदेश मिलने पर मराठे या निजाम की ओर से उन्हें जागीरें मिलती थी। परंतु कंपनी की ओर से मिलती केवल मीठी-मीठी गप्पें ।9 जिनकी तलवारों ने अंग्रेजों 1857 का स्वातंत्र्य समर – 45 7 'मानव के कर्तव्य' । 8 'इंग्लैंड का विस्तार', पृष्ठ 214 । 9 "यदि उसे (देशी सैनिक को) अपना संपूर्ण जीवन अपनी पूर्ण क्षमता का प्रदर्शन करते हुए सेना में लगाना पड़ता था तो जो सर्वाधिक सम्मान उसे प्राप्त हो पाता था-वह थी सूबेदारी। एक अंग्रेज सार्जेंट भी अपने से उच्च पद पर नियुक्त देशी अधिकारियों पर हुकुम चलाता था। परेड में भी अंग्रेज अधिकारी भूल करते थे तथा आदेश देते समय गलत शब्दों का प्रयोग करते थे; किंतु इसका संपूर्ण दोष सिपाहियों पर डालकर वे उनकी निंदा और भर्त्सना किया करते। इतना ही नहीं, जो देशी अधिकारी सेना में सेवा करते-करते वृद्ध हो गए थे उन्हें भी यूरोपियन खुलेआम अपशब्द कहते थे।' 'देशी शासकों की सेनाओं के समान उन्हें यात्रा को पूर्ण करने के लिए हाथी और पालकियां
के लिए सारा हिंदुस्थान जीता था, उन सिपाहियों से इतना क्रूर व्यवहार किया जाता कि जनरल ऑर्थर वेलेजली घायल हुए सिपाहियों का उपचार करने के स्थान पर उन्हें तोप से उड़ा देता। इस तरह हिंदुस्थान के कोने-कोने में भयंकर क्रांतियुद्ध के बीज अंग्रेज लगातार बोते आ रहे थे और उनके इन प्रयासों को सफलता जल्दी ही प्राप्त होगी, ऐसे चिह्न प्रादुर्भूत होने में अधिक देर नहीं लगती।10 डलहौजी जिस दिन स्पेन ने नीदरलैंड की भूमि पर परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपनी गुलामी लादी, उसी दिन यह निश्चित हो गया था कि नीदरलैंड और स्पेन के मध्य हजारों लड़ाइयों से भरा हुआ क्रांतियुद्ध होगा। वह कब, कहां और कैसे होगा-केवल इन गौण बातों का निर्णय आल्वा नामक स्पेन के गर्वनर ने किया। जिस क्षण ऑस्ट्रिया ने इटली के पैरों में गुलामी की बेड़ियां डाली। उसी दिन अनेक पराजयों परंतु अंतिम जय से घटित होनेवाला प्रचंड क्रांतियुद्ध निश्चित हो गया था। केवल शेष रहा तिथि निर्णय, वह मैटरनिख के जुल्मों से हो गया। उसी तरह जिस समय आंग्ल भूमि हिंद भूमि पर दासता लादने के लिए किसी राक्षस की तरह दौड़कर आई उसी दिन अंग्रेजों और हिंदुओं का जो भयंकर, क्रूर और घमासान युद्ध होना है, यह तय हो गया; केवल उसका आरंभ कब हो, यह डलहौजी ने तय कर दिया। डलहौजी के शासनकाल में हुए अमानुषी अन्याय कुछ सीमा तक नरम भी हुए होते तो भी उसके कारण अंतिम संग्राम टल नहीं सकता था, क्योंकि प्रत्येक देश स्वतंत्र रहे, यही प्राकृतिक दर्शनशास्त्र का अबाधित रहने वाला अंतिम सिद्धांत है। इस प्रकृति-हेतु के विरूद्ध कोई राष्ट्र के पैरों में बलपूर्वक गुलामी की बेड़ियां, फिर भले ही वे सोने से मढ़ी क्यों न हों, डाल दे तो काल के घन प्रहार के नीचे उनके टुकड़े होना निश्चित है। तथापि जहां-जहां गुलामी होती है वहां-वहां अत्याचार होना स्वाभाविक है और जहां-जहां फिरंगी शासन है वहां-वहां डलहौजी आने ही चाहिए, क्योंकि बिना अत्याचार के जिस तरह गुलामी असंभव है उसी तरह बिना डलहौजी फिरंगी राज्य असंभव बात है। विदेशियों पर अपना अन्यायमूलक शासन चलाना जहां सर्वसम्मत हो, वहां अपने शासन में जो सर्वाधिक क्रूर होगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा-अर्थात् जो जितना ही 1857 का स्वातंत्र्य समर – 46 10 प्राप्त नहीं होती थीं, फिर चाहे उन्हें कितनी भी लंबी यात्रा क्यों न करनी पड़े। वे कहते थे-निजाम और मराठी सरदारों के सिपाही भी हमारे सूबेदारों और जमादारों से अच्छा जीवन व्यतीत करते थे। अंग्रेज अधिकारी देश की सुंदरतम महिलाओं के जनानेखानों में भी प्रविष्ट हो सकते थे।' 'और इस सबकी पराकाष्ठा तो तब हो गई थी जबकि जनरल ऑर्थर वेलेजली ने अपने घायल सैनिकों को निर्ममता सहित गोलियों से उड़ा देने का आदेश दे दिया था।” –सर जॉन के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 160-61