भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रकरण-2 कारण परंपरा स्वधर्म एवं स्वराज्य-इन दो देवताओं का अधिष्ठान रखकर सन् 1857 में प्रारंभ हुए इस रण-यज्ञ का संकल्प कब लिया गया? अंग्रेज इतिहासकारों के अनुसार, इस रण-यज्ञ का संकल्प डलहौजी साहब के कार्यकाल में लिया गया था। उनकी यह धारणा भ्रमपूर्ण है। जिस क्षण हिंदुस्थान के तट पर परतंत्रता ने पहला कदम रखा तभी। बेचारा डलहौजी! उसने अधिक बुरा किया ही क्या? हिंदुस्थान की जन्मजात स्वतंत्रता का हरण कर इसके बदले गुलामी और स्वधर्म के स्थान पर ईसाइयत लादने का पातकी विचार जब पहले-पहल अंग्रेज व्यापारियों के मन में आया, तभी से हिंद भूमि के हृदय में क्रांति चेतना का संचार हुआ है। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध का कारण अंग्रेजों के 'अच्छे शासन' या 'बुरे शासन' में न होकर केवल 'शासन' में है। अच्छा या बुरा का प्रश्न गौण है, मुख्य प्रश्न 'शासन' है। जिस देश को हिमालय ने उत्तर और समुद्र देवता ने 'दक्षिण' की ओर से सुरक्षित किया हुआ है उस निसर्गतः बलिष्ठ एवं निसर्गप्रिय हिंदुस्थान पर अंग्रेजों की सत्ता चलने देना है या नहीं, यह मुख्य प्रश्न सन् 1857 के समर-पट पर हल किया जा रहा था, यह यदि सत्य है तो फिर इस समर की मूल उत्पत्ति तभी ही हुई होगी जब यह प्रश्न पहले-पहल सामने आया होगा। मैजिनी कहता है-"स्वतंत्रता प्रत्येक का प्रकृतिदत्त अधिकार है और इसलिए इस पवित्र अधिकार का अपहरण करने की इच्छा के अत्याचार को मिटाना भी प्रत्येक का प्रकृतिदत्त कर्तव्य है। व्यक्ति की, राष्ट्र की एवं मनुष्य जाति की प्रगति के लिए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 44