१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर लेगी तो राष्ट्रभक्त भारत अपने विदेशी शासकों से अपने आपको स्वतंत्र कर लेगा तथा वह देशी राजाओं के स्वतंत्र राज्यदंड के सम्मुख नतमस्तक होगा। अब यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण रूप ग्रहण कर चुका था। यह विद्रोह उस संपूर्ण जनता के विद्रोह का रूप धारण कर चुका था जो काल्पनिक गलतियों से क्षुब्ध होकर भड़क उठी थी और घृणा व कट्टरता के भ्रम में आबद्ध हो चुकी थी।'"⁶ 'कंपलीट हिस्ट्री ऑफ द ग्रेट सेपॉय वार' शीर्षक अपनी पुस्तक में हाइट लिखते हैं- "यदि मैं अवधवासियों के द्वारा प्रदर्शित साहस की प्रशंसा नहीं करूंगा तो एक इतिहासकार का पावन दायित्व न निभा पाऊंगा । नैतिक दृष्टि से अवध के तालूकेदारों की एक महान् भूल यह थी कि उन्होंने हत्यारे विद्रोहियों से हाथ मिलाया। किंतु इसके लिए भी उन्हें सदुद्देश्य से प्रेरित निष्ठावान देशभक्तों के रूप में मान्यता दी जा सकती है, क्योंकि वे अपनी मातृभूमि और सम्राट् के लिए संग्राम कर रहे थे, स्वराज्य और स्वधर्म के लिए संघर्षरत हुए थे।" 1857 का स्वातंत्र्य समर – 43 ⁶ सर जॉन के, 'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 644 ।