भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 38

धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें; मारते-मारते जीतें, राज्य अपना। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध का यही तात्त्विक कारण है। इस क्रांतियुद्ध का यही मनःशास्त्र है। जिस दूरबीन से उस युद्ध का स्पष्ट एवं सत्य स्वरूप दिखेगा, ऐसी खरी दूरबीन अर्थात् ˙ ˙ ˙ 'धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें, मारते-मारते जीतें राज्य अपना। इस दूरबीन से उस क्रांति की ओर देखें तो कितना अलग दृश्य दिखने लगता है! स्वधर्म एवं स्वराज्य-इन दो पवित्र कारणों से जो क्रांतियुद्ध लड़ा गया उसकी पवित्रता पराजय से भंग नहीं होती। गुरू गोविंद सिंह के प्रयास तादृश रीति से विफल रहे, इस कारण उसका दिव्यत्व कम नहीं होता। या सन् 1857 में इटली में राज्य क्रांति की जो विशाल लहर उठी उसमें उस क्रांति के नेताओं की संपूर्ण पराजय हुई, इस कारण उनके हेतु का पुण्य क्षीण नहीं होता। जस्टिन मैकार्थी ने कहा है-‘‘वस्तुस्थिति यह है कि भारतीय प्रायद्वीप के संपूर्ण उत्तरी एवं उत्तर-पश्चिम प्रदेशों में ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध देशी जातियों ने विद्रोह कर दिया था। केवल सिपाहियों ने ही विद्रोह नहीं किया, इसे कोरी सैनिक क्रांति का ही नाम नही ˙दिया जा सकता। यह तो भारत पर आंग्ल सत्ता के विरूद्ध सैनिक कठिनाइयों, राष्ट्रीय घृणा और धार्मिक कट्टरता का संयुक्त उभार था। इसमें देशी राजाओं और सैनिकों ने भी भाग लिया मुसलमान और हिंदुओं ने अपने शताब्दियों के धार्मिक विरोध आंदोलन को प्रोत्साहित किया था। चरबीवाले कारतूसों के विवाद ने तो केवल चिंगारी दहकाई और उस चिंगारी ने सभी ज्वलनशील पदार्थों में आग भड़का दी। यदि इस चिंगारी से अग्नि प्रज्वलित न होती तो किसी अन्य माध्यम से भी यही कार्य संपन्न हो जाता। ˙ ˙ ˙ मेरठ के सिपाहियों ने क्षण भर में ही एक नेता पा लिया, उन्हें एक ध्वज भी मिल गया और उद्देश्य भी और यह विद्रोह एक क्रांतियुद्ध में परिणत हो गया। जब वे प्रातःकालीन सूर्य की रश्मियों से जगमगाती यमुना के तट पर पहुंचे तो उन्होंने अनजाने में ही इतिहास की एक निर्णायक घड़ी को प्राप्त कर लिया तथा सैनिक विद्रोह को एक राष्ट्रीय धर्मयुद्ध में परिणत कर दिया।’’⁵ चार्ल्स बाल लिखते हैं-‘‘आगे चलकर धारा किनारों को तोड़कर बह निकली और उसने भारत की सैनिक वसुंधरा को आप्लावित कर दिया। उस समय तो यही आशा की जाती थी कि ये धाराएं संपूर्ण यूरोपीय तत्त्वों को विनष्ट कर निगल जाएंगी। जिस समय विद्रोह की यह धारा पुनः मर्यादित होगी और अपने आपको सीमाओं में आबद्ध 1857 का स्वातंत्र्य समर – 42


⁵ 'हिस्ट्री ऑफ अवर ओन टाइम', खंड 3 ।