भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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नामक ऐहिक सामर्थ्य की तलवार स्वधर्म नामक पारलौकिक साध्य के लिए हमेशा बाहर निकली रहनी चाहिए। यह प्राचीन जनों के मन का रुझान इतिहास में पग-पग पर दिखेगा। प्राचीन काल में हुई क्रांतियों को धार्मिक स्वरूप क्यों मिलता है, या यह कहें कि धार्मिक पवित्रता के या धर्म-संलग्नता के सिवाय प्रचंड क्रांति का होना-यह बात प्राचीन इतिहास में बिल्कुल भी क्यों ज्ञात नहीं है, इसका बीज भी धर्म के इस विश्व व्यापक स्वरूप में ही है। हिंदुस्थान के इतिहास में आज तक अखंड रूप से व्यक्त होते आए स्वराज्य एवं स्वधर्म के साधन और साध्य तत्त्व इस सन् 1857 के क्रांतियुद्ध में भी व्यक्त हुए, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है। दिल्ली के बादशाह द्वारा पहले-पहल निकाले गए घोषणापत्र का उल्लेख पहले किया गया है। उसके बाद जब दिल्ली को अंग्रेजी सेनाओं ने घेर लिया और युद्ध घमासान हो गया तब बादशाह ने हिंदुओं के लिए दूसरा घोषणापत्र जारी किया। उसमें वे कहते हैं- "जीम राजगान वो रोसाए हिंद पर वाझे होके तुम बेहामा उजूः नेकी और फय्याजी में मुश्तईर उद्दईर हों ़ ़ ़ खुदावंत ने तुमको ये मर्तबए आली और मुल्क और दौलत और हुकूमत इसी वास्ते बख्शी है कि तुम उन लोगों को, जो तुम्हारे मजहब में दखलंदाजी करें, गारद करों ़ ़ ़ ।" (हमें ईश्वर ने संपत्ति, देश, अधिकार किस लिए दिए हैं? ये सभी केवल व्यक्ति से संबंधित सुख-भोग के लिए न होकर स्वधर्म-संरक्षण के पवित्र हेतु के लिए हैं।) परंतु इस पवित्र एवं अंतिम हेतु के ये साधन कहां है? पहले दिए हुए घोषणापत्र के अनुसार परमेश्वर की सब सौगातों में अत्यंत श्रेष्ठ स्वराज की सौगात कहां है? दौलत कहां है? मुल्क कहां है? हुकूमत कहां है? गुलामी के प्लेग में यह सारी दैविक स्वतंत्रता मृतप्राय हो गई है। गुलामी का प्लेग किस तरह संहार कर रहा है, यह दिखाने के लिए उपर्युक्त घोषणापत्र में नागपुर का, अवध, झांसी का स्वराज्य-सब कैसे धूल में मिला दिए गए, इसका मार्मिक वर्णन करने के बाद ऐसी चेतावनी दी गई है कि इस तरह धर्म-रक्षण के साधन गंवाने पर तुम परमेश्वर के दरबार में अपराधी और धर्मद्रोही माने जाओगे। ़ ़ ़ ़ स्वधर्म के लिए उठो और स्वराज्य प्राप्त करो'-इस तत्त्व ने हिंदुस्थान के इतिहास में कितने दैवी चमत्कार किए हैं? श्री समर्थ रामदास न महाराष्ट्र को ढाई सौ वर्ष पहले यही दीक्षा दी थी- "धर्मासाठी मरावें, मरोनि अवघ्यांसि मारावें। मारिता मारिता घ्यावे, राज्य आपुलें।" 1857 का स्वातंत्र्य समर - 41