भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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पृष्ठ 36

उसमें हमारे पवित्र धर्म का नाष करने की कुबुद्धि और समा गई है। अब आप अभी भी शांति से बैठे रहेंगे क्या? आप शांति से बैठे, यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है। क्योंकि सारे हिंदुओं और मुसलमान के हृदय में उसी की इच्छा उत्पन्न हुई हैं-परमेश्वर की इच्छा-और आपके पराक्रम से जल्दी ही उनका ऐसा सर्वनाश हो जाएगा कि अपने हिंदुस्तान में उनका छिलका, टुकड़ा भी नहीं रहेगा। छोटे-बड़े के सारे भेदभाव भुलाकर इस सेना में सब ओर समता का राज हो। क्योंकि पवित्र धर्मयुद्ध में जो वीर स्वधर्म के लिए अपनी तलवार म्यान के बारह निकालते हैं वे सब समान योग्यता के होते हैं। वे भाई-भाई हैं। उनमें किसी तरह का भेद नहीं है। इसलिए फिर से एक बार मैं सारे हिंदू बंधुओं का आह्वान करता हूं-उठो और इस परम ईश्वरीय और दिव्य कर्तव्य के लिए रण-मैदान में कूद पड़ो।'"⁴ ये तत्त्वरत्न देखकर जिसे इस क्रांतियुद्ध की ओजस्विता भासित नहीं होगी उसे या तो मंदबुद्धि या दुर्बुदि होना चाहिए। ईश्वर-प्रदत्त अधिकारों के लिए लड़ना मनुष्यमात्र का कर्तव्य है और स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए लड़ने को ही उस मय के भारतीय शूरों ने अपने शस्त्र निकाले थे, यह सिद्ध करने के लिए इससे सबल साक्ष्य और क्या दिया जा सकता है! भिन्न-भिन्न स्थानों और भिन्न-भिन्न कालों में निकाले गए ये घोषणापत्र इस क्रांतियुद्ध की मीमांसा करने के लिए एक अक्षर भी और अधिक लिखने की आवश्यकता शेष नहीं रहने देते। ये घोषणापत्र ऐरे-गैरे द्वारा निकाले हुए नहीं हैं। इस युद्ध में जो भी शमशीर निकालते हैं वे सब समान योग्यता के हैं। धर्मयुद्ध में उठी यह गर्जना 'स्वधर्म एवं स्वराज्य' दोनों तत्त्वों का उच्चारण एवं जयघोष करती है। पर क्या ये दोनों ही तत्त्व (स्वराज्य-स्वधर्म) परस्पर विरुद्ध या भिन्न समझे जाते थे? स्वधर्म एवं स्वराज्य का एक-दूसरे से किसी भी अर्थ में संबंध नहीं है, ऐसी कम-से-कम प्राचीन लोगों की धारणा कभी नहीं थी। मैजिनी के कथानुसार, स्वर्ग और पृथ्वी को किसी एक बांस के बीच में बांधकर अलग नहीं किया गया है। ये दोनों तो एक ही वस्तु के दो छोर हैं। ऐसी ही प्राचीन जनों की पूर्वा पर यथार्थ एवं परिपक्व धारणा है। हमारी स्वधर्म के कल्पना स्वराज्य से भिन्न नहीं है। ये दोनों साध्य नाते से संलग्न हैं। स्वधर्म के बिना स्वराज्य तुच्छ है और स्वराज्य के बिना स्वधर्म बलहीन है। स्वराज्य 1857 का स्वातंत्र्य समर – 40 ⁴ लेकी कृत-'फिक्शन एक्सपोस्ड' में वर्णित यह घोषणापत्र उस क्रांतियुद्ध के समय लोक-वृत्ति किस तरह चेत गई थी-यह दर्शाने को बहुत उपयोगी है। इसका काफी कुछ अंश आगे भी दिया जाएगा।

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