१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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एवं उदात्तता से दिखते हैं उससे अधिक वे किस इतिहास में मिलनेवाले हैं? विदेशी और स्वार्थी इतिहासकारों ने इस दिव्य हिंद का चित्र कितने ही गंदे रंगों से भरा हो, फिर भी जब हमारे इतिहास के पृष्ठों पर से चित्तौड़ का नाम पोंछा हुआ नहीं है, सिंहगढ़ का नाम मिटा नहीं है, प्रताप आदि का नाम मिटा नहीं हैं या गुरू गोविन्द सिंह का नाम पोंछा नहीं गया है, तब तक ये स्वधर्म और स्वराज्य के तत्त्व हिंदुस्थान के रक्त-मांस में जमे रहेंगे। उनपर क्षण भर गुलामी के भ्रम के बादल चाहे आएं-सूर्य पर भी बादल आते हैं-परंतु वह क्षण समाप्त होते-न-होते उस तत्व सूर्य की उष्णता से वे पिघल जाएंगे, इसमें शंका नहीं। स्वराज्य के लिए हिंदुस्थान ने कौन सा प्रयास नहीं किया और स्वधर्म के लिए हिंदुस्थान ने कौन सी दिव्यता अंगीकार नहीं की। ˙˙˙"सूरा सो पचालिए जो लढ़े दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरे तबहु न छोड़े खेत।''(गुरू गोविंद सिंह) इस रीति से स्वधर्म के लिए रण-मैदान में टुकड़े-टुकड़े हो जाने पर भी जो हटते नहीं-वीरों की ऐसी घटनाओं से भारतभूमि का संपूर्ण इतिहास भरा हुआ है। इस परंपरागत एवं तत्त्व का संचार होने के लिए सन् 1857 के वर्ष में जितने कारण घटित हुए उतने पहले कुछेक बार ही घटित हुए थे। इन विशिष्ट घटनाओं से हिंद भूमि के शरीर में किंचित् प्रस्फुरण हुआ, इन मनोवृत्तियों को विलक्षण चेतना मिली और स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए लोक-शक्तियां सज्जित होने लगी। दिल्ली के बादशाह द्वारा स्वराज्य-स्थापना के लिए जारी घोषणापत्र में वे कहते हैं और अपने प्राणप्रिय धर्म एवं प्राणप्रिय देश को पूरी तरह भयमुक्त कर सकते हैं।''³ इस वाक्य में उल्लेखित दिव्य तत्त्वों के लिए जो क्रांति होती है, अपने प्राणप्रिय धर्म को एवं अपने प्राणप्रिय देश को बंधनमुक्त करने के लिए जो क्रांतियुद्ध से अधिक पवित्र विश्व में दूसरा क्या मिलनेवाला है? स्वदेश-रक्षा, स्वराज्य-संस्थापन एवं स्वधर्म-परित्राण के लिए दिल्ली के सिंहासन से प्रार्थित इस स्पष्ट दिव्य एवं स्फूर्तिजनक मंत्र में ही सन् 1857 की क्रांति का बीज है। बरेली में मुद्रित कर प्रकाशित किए हुए, अवध के नवाब द्वारा निकाले गए दूसरे एक आज्ञापत्र में वे कहते हैं-"हिंदुस्थान के सारे हिंदुओं और मुसलमानो, उठो! स्वदेश बंधुओं, परमेश्वर की दी हुई सौगात में सबसे श्रेष्ठ सौगात स्वराज्य (Sovereign) ही है। यह ईश्वरीय सौगात जिसने हमसे छल से छीन ली है उस अत्याचारी राक्षस को वह बहुत दिन प्रचेगी क्या? यह ईश्वरीय इच्छा के विरूद्ध किया गया कृत्य क्या जय प्राप्त करेगा? नहीं, नहीं। अंग्रेजों ने इतने जुल्म ढाए हैं कि उनके पाप के घड़े पहले ही लबालब भरे हुए हैं। और 1857 का स्वातंत्र्य समर – 39 ³ लेकी द्वारा लिखित-'फिक्शन एक्सपोज्ड'।