भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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के लिए सारा हिंदुस्थान जीता था, उन सिपाहियों से इतना क्रूर व्यवहार किया जाता कि जनरल ऑर्थर वेलेजली घायल हुए सिपाहियों का उपचार करने के स्थान पर उन्हें तोप से उड़ा देता। इस तरह हिंदुस्थान के कोने-कोने में भयंकर क्रांतियुद्ध के बीज अंग्रेज लगातार बोते आ रहे थे और उनके इन प्रयासों को सफलता जल्दी ही प्राप्त होगी, ऐसे चिह्न प्रादुर्भूत होने में अधिक देर नहीं लगती।10 डलहौजी जिस दिन स्पेन ने नीदरलैंड की भूमि पर परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपनी गुलामी लादी, उसी दिन यह निश्चित हो गया था कि नीदरलैंड और स्पेन के मध्य हजारों लड़ाइयों से भरा हुआ क्रांतियुद्ध होगा। वह कब, कहां और कैसे होगा-केवल इन गौण बातों का निर्णय आल्वा नामक स्पेन के गर्वनर ने किया। जिस क्षण ऑस्ट्रिया ने इटली के पैरों में गुलामी की बेड़ियां डाली। उसी दिन अनेक पराजयों परंतु अंतिम जय से घटित होनेवाला प्रचंड क्रांतियुद्ध निश्चित हो गया था। केवल शेष रहा तिथि निर्णय, वह मैटरनिख के जुल्मों से हो गया। उसी तरह जिस समय आंग्ल भूमि हिंद भूमि पर दासता लादने के लिए किसी राक्षस की तरह दौड़कर आई उसी दिन अंग्रेजों और हिंदुओं का जो भयंकर, क्रूर और घमासान युद्ध होना है, यह तय हो गया; केवल उसका आरंभ कब हो, यह डलहौजी ने तय कर दिया। डलहौजी के शासनकाल में हुए अमानुषी अन्याय कुछ सीमा तक नरम भी हुए होते तो भी उसके कारण अंतिम संग्राम टल नहीं सकता था, क्योंकि प्रत्येक देश स्वतंत्र रहे, यही प्राकृतिक दर्शनशास्त्र का अबाधित रहने वाला अंतिम सिद्धांत है। इस प्रकृति-हेतु के विरूद्ध कोई राष्ट्र के पैरों में बलपूर्वक गुलामी की बेड़ियां, फिर भले ही वे सोने से मढ़ी क्यों न हों, डाल दे तो काल के घन प्रहार के नीचे उनके टुकड़े होना निश्चित है। तथापि जहां-जहां गुलामी होती है वहां-वहां अत्याचार होना स्वाभाविक है और जहां-जहां फिरंगी शासन है वहां-वहां डलहौजी आने ही चाहिए, क्योंकि बिना अत्याचार के जिस तरह गुलामी असंभव है उसी तरह बिना डलहौजी फिरंगी राज्य असंभव बात है। विदेशियों पर अपना अन्यायमूलक शासन चलाना जहां सर्वसम्मत हो, वहां अपने शासन में जो सर्वाधिक क्रूर होगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा-अर्थात् जो जितना ही 1857 का स्वातंत्र्य समर – 46 10 प्राप्त नहीं होती थीं, फिर चाहे उन्हें कितनी भी लंबी यात्रा क्यों न करनी पड़े। वे कहते थे-निजाम और मराठी सरदारों के सिपाही भी हमारे सूबेदारों और जमादारों से अच्छा जीवन व्यतीत करते थे। अंग्रेज अधिकारी देश की सुंदरतम महिलाओं के जनानेखानों में भी प्रविष्ट हो सकते थे।' 'और इस सबकी पराकाष्ठा तो तब हो गई थी जबकि जनरल ऑर्थर वेलेजली ने अपने घायल सैनिकों को निर्ममता सहित गोलियों से उड़ा देने का आदेश दे दिया था।” –सर जॉन के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 160-61