१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्यायी है उसे उस अन्याय का कमाल दिखाने के सिवाय अपना श्रेष्ठतम बनाए रखने की दूसरी कोई युक्ति नहीं बचती। इस तरह अन्याय और अधमता में जहां खुली स्पर्धा शुरू होती है वहां डलहौजी ही पैदा होंगे। अनीति-मूलक साम्राज्य जहां-जहां बढ़े वहां वहां ऐसे डलहौजियों के जंगल ही देश रहे। पर इन सब डलहौजियों को पीछे छोड़ देनेवाला एक आंग्ल डलहौजी सन् 1848 में भारत आया। डलहौजी को अंग्रेज इतिहासकार 'साम्राज्य का प्रणेता' कहते हैं 'इस बात से अलग डलहौजी के अधम और नीच कर्मों के लिए अन्य किसी साक्ष्य की आवश्यकता ही नहीं है। सौ वर्ष तक चलाई गई अंग्रेजी अनीति का मूर्त परिणाम, स्वभाव से जिद्दी, जो मैं कहूं वही होगा-इस टेक पर रहनेवाला, साम्राज्य की चटक और उसका घमंड जिसके रक्त-मांस में घुला हुआ था, ऐसा धूर्त न भी हो पर दुःसाहसी राजनीतिज्ञ, हिंदुस्थान की भूमि को सपाट करने के लिए इस भूमि पर उतरा। डाकुओं के मुख्य नायक की दृष्टि में जिसके घर में संपत्ति भरी हुई है पहले उधर जाना स्वाभाविक है। ऐसा संपत्ति भरा घर दिखते ही वह उस घर पर, चाहे जिस रीति से संभव हो, डाका डालने की योजना बनाने में जुट जाता है। इस जल्दी में न्याय-अन्याय का विचार शुरू हो जाता है तो उसी समय डाकूगिरी समाप्त हो जाती है। ऐसी ही वस्तुस्थिति होने से अंग्रेजों के हिंदुस्थान पर डाले गए भयंकर डाकों¹¹ में अंग्रेजों के शासन में उस शासन को स्थिरता देनेवाले और उस डकैती को बढ़ानेवाले उनके कृत्य न्यायसंगत थे या अन्यायी, यह निश्चित करने के लिए घिस-घिस करना इतिहास की व्यर्थ खींचतान करना है। संधिपत्र, वचन, दोस्ती आदि शब्दों का डाकेजनी के शास्त्र में स्थान नहीं होता, इतना ध्यान में रखा जाए तो फिर इतिहास बहुत सी असंगतियों से बच जाएगा। फिर वॉरेन हेस्टिंग्स ने नंदकुमार को न्याय से मारा या अन्याय से और उस वॉरेन हेस्टिंग्स को अंग्रजों ने निरपराध मानकर क्यों छोड़ दिया, यह तय करने के लिए कागजों के ढेर खराब करने की आवश्यकता नहीं होगी। अज्ञानी लोग अपने भोले स्वभाव के अनुसार संधिपत्रों की सूचियां लेकर, उनकी तिथियां देकर, धर्मशास्त्र के वचन देकर, तर्कों के ताने-बाने रच या पिछली परंपराओं के आधार देकर, अपने घर पर आक्रमण करने के लिए आए डाकुओं में परावृत्ति या सहानुभूति उत्पन्न करने का भ्रमपूर्ण प्रयास 1857 का स्वातंत्र्य समर - 47 11 मॉलकम लेविन कहता है-"...Grasping everything that could render life desirable, we have desired to the people of the country all that could raise them in society, all that could elevate them as men....we have delivered up their pagoda-properly to confiscation; we have branded them in our official records as 'heathens.' We have seized the possessions of their native princes and confiscated the estates of the nobles; We have unsettled the country by exactions and collected the revenue by means neighbour's purse for what it contains."