१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभले ही करें; परंतु धूर्त लोग इन निष्फल, बांझ प्रयासों पर हंसे बिना नहीं रहेंगे। डाकुओं पर लागू ये सारी बातें डलहौजी की डकैतियों पर तो विशेष रूप से लागू होती हैं, अतः उसके शासनकाल में घटित कृत्यों में न्याय-अन्याय निश्चित करने का प्रयास करना मूर्खता है। हिंदुस्थान की भूमि समतल करके उसपर तांडव करने डलहौजी आया था, इतना ध्यान में रखा जाए तो काफी होगा। जिसका अंतिम उद्देश्य प्राकृतिक रूप से सुंदर हिंद भूमि को अपनी दासी बनाना था, ऐसे दुर्योधन के लिए न्याय कैसा और अन्याय कैसा? इस पाप वासना को तृप्त करने के लिए जो भी साधन मिलें वे सारे वह उपयोग में लाता ही। इन साधनों में से पहला साधन था पंजाब से हुई लड़ाई। डलहौजी के पैरों का स्पर्श हिंदुस्थान के किनारे से होते ही उसे तुरंत यह ध्यान में आया कि पंजाब में जब तक रणजीत सिंह है तब तक अपनी पाप वासना पूरी करना इंग्लैंड के लिए बहुत भारी होगा यह देखकर उसका दृढ़ निश्चय बना कि उस पंजाबी सिंह को किसी तरह गुलामी के जाल में फंसाना ही चाहिए। यद्यपि चिलियनवाला के द्वार से बाहर आकर उस पंजाबी सिंह ने एक भयंकर आघात अपने शत्रु की छाती कर किया, लेकिन गुजरात के पिछले द्वार से शत्रु अंदर घुसा और सिंह गुफा जल्दी ही सिंह का पिंजरा बन गई। रणजीत सिंह की पटरानी चंद्रकुंवर लंदन में घुटकर मरी और रणजीत सिंह का पुत्र दिलीप सिंह दूसरे के दरवाजे टुकड़े जोड़ता पड़ा रहा। 12 अब हिमालय से कन्याकुमारी तक तो सारा हिंदुस्थान लाल हो गया, परंतु अभी भी सिंधु नदी से इरावती (नदी) तक जैसा चाहिए था वैसा लाल नहीं हुआ था। फिर देर क्यों? ब्रह्मदेश में एक शांति मिशन भेजा कि फतह हुई। केवल वह शांति मिशन शांति का इतने प्रेम से आलिंगन करे कि उसकी पसलियां चूर-चूर हो जाएं। यह अति प्यारा कार्य भी अंत में संपन्न हो गया और ब्रह्मदेश लाल रंग में रंग गया। अब सिंधु नदी से इरावती तक और हिमालय से रामेश्वरम तक सारा हिंदुस्थान सचमुच लाल हो गया! पर जल्दी ही रक्तरंजित नहीं होगा, यह कैसे कहें? पंजाब और ब्रह्मदेश अंग्रेजों ने जीते अर्थात् क्या किया, उसकी कल्पना केवल नामों से नहीं हो सकती। अकेले पंजाब का अर्थ था पचास हजार वर्ग मील का प्रदेश और चालीस लाख जनसंख्या। जिन पांच नदियों के तट पर ऋषियों ने वेदमंत्र गाए, उनके द्वारा सिंचित यह प्रदेश-पंजाब। यही प्रदेश लेने अलेक्जेंडर आया और इसी प्रदेश को बचाने के लिए पोरस लड़ा। इसी प्रदेश को लेकर रावण की भी महत्त्वाकांक्षा 1857 का स्वातंत्र्य समर – 48 12 रणजीत सिंह के साम्राज्य के उत्तराधिकारी दिलीप सिंह की दुर्दशा सुनकर किसी को भी दया आएगी। किंतु 'निष्पक्ष' के ने लिखा है-“दिलीप सिंह के लिए यह एक सुखद परिवर्तन था कि अपने जीवन के 12वें वर्ष में ही वह गवर्नर जनरल का आश्रित हो गया और उसे बंगाल की सेना के एक सहायक कर्मचारी की देखरेख में रखा गया, जो इस कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति था, जिसके निर्देशन में सिख राजकुमार का विकास एक भद्र ईसाई, एक अंग्रेज दरबारी के रूप में हुआ। ”