१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूरी हो गई होती। परंतु डलहौजी को पंजाब और ब्रह्मदेश जैसे विस्तृत प्रदेश लेकर भी कोई संतोष न हुआ। हिंदुस्थान की सरहद तो अवश्य बढ़ी, परंतु अब भी अंदर पूर्व बादशाहों के कुछ मजार षेश थे, अतः उन्हें भी उखाड़कर सर्वत्र मैदान करने की उसने प्रतिज्ञा की। पुरानी बादशाही के ये मजार स्थान घेरे हुए थे; केवल इतना ही नहीं, इन पुराने मजारों में गड़े प्रेतों से ही भावी बादशाही के पुनरुज्जीवित होने की संभावना थी और यह संभावना डलहौजी को पूरी तरह समझ में आ गई थी। सतारा के मजार में हिंदू पदपादशाही गड़ी हुई थी और यीषू मसीह के पुनरुज्जीवन की तरह उन गाड़े हुए प्रेतों में से कदाचित् किसी भावी बादशाही का पुरुज्जीवन होगा, यह डर यीषू के चरित्र पर विश्वास रखने वाले डलहौजी को लगा हो तो कोई आश्चर्य नहीं। सन् 1857 के अप्रैल माह में सतारा के अंतिम महाराज अप्पा साहब दिवंगत हुए । यह समाचार मिलते ही डलहौजी ने वह रियासत हथियाने का निश्चय किया। कारण यह कि राजा की जायज संतति नहीं थी। जायज संतति न होने से गंवार मजदूर की झोंपड़ी भी लावारिस नहीं हो जाती। वह उके द्वारा नियुक्त दत्तक को या उसके निकट संबंधी को दे दी जाती है। पर सतारा? वह तो किसी गंवार की झोंपड़ी न होकर अंग्रेजों की बराबरी की 'दोस्त सरकार' थी।¹³ सन् 1839 में प्रताप सिंह छत्रपति पर अंग्रेजी राज्य उलटने के षड्यंत्र का आरोप लगाकर उन्हें गद्दी से हटाने के बाद उके स्थान पर छत्रपति अप्पा साहब की नियुक्ति अंग्रेज सरकार ने ही की थी। इस पदच्युति के संबंध में मि. आर्नाल्ड अपने ग्रंथ ‘Dalhousie’s Administration” में कहते हैं-‘“it is not pleasant to dwell upon the circumstances of the dethronement&so discreditable they were.” परंतु इस बेहूदी पदच्युति के बाद जिसे अंग्रेजों ने सतारा की गद्दी पर बैठाया वह प्रताप सिंह का जायज पुत्र न होकर भाई था। अर्थात् जायज पुत्र के अभाव में हिंदू षास्त्र के अनुसार अन्य संबंधियों का सिंहासन पर अधिकार बनता है, इस समय तक अंग्रेजों ने यह स्पष्ट स्वीकार किया है। यह स्वीकृति अपनी नियमित विश्वासघाती रीति के अनुसार डलहौजी साहब ने अस्वीकार कर दी। यही सत्य है। विभिन्न राजाओं से किए गए समझौतों में हमने दत्तक संतति पहले ही अमान्य की हुई है, ऐसा वे कभी भी नहीं कह सकते थे। सन् 1824 में कोटा के राजा का दत्तक स्वीकार करते समय अंग्रेजी सरकार ने ऐसा स्पष्ट कहा था- “कोटा के राजकुमार के इस अधिकार को मान्यता दी ही जानी चाहिए कि उन्हें षास्त्रों के नियमानुसार दत्तक पुत्र ग्रहण करने और उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त 1857 का स्वातंत्र्य समर – 49 ¹³ सतारा की गद्दी पर सन् 1819 में छत्रपति की पुनर्योजना करते हुए अंग्रेजी द्वारा किए गए समझौते की पहली धारा निम्नवत् थी-‘‘अंग्रेज सरकार अपनी ओर से वह देश अथवा क्षेत्र, जिसको विशेष रूप से निर्दिष्ट किया गया है, सरकार अथवा महाराजाधिराज छत्रपति (सतारा-नरेश) को देने पर सहमत है। हिज हाइनेस महाराजा छत्रपति और उनके पुत्र और उत्तराधिकारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रभुसत्ता प्राप्त राजाओं के रूप में इस क्षेत्र पर शासन करते रहेंगे।’’