भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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लिए टेलर ने तत्काल बुलाए और वे उस बुलावे के अनुसार पटना की ओर आने के लिए निकले। पर रास्ते पर पूरे प्रदेश भर में रात-दिन उनकी 'छिः-थूः' शुरू हो गई। स्वदेश के प्रति नमकहरामी करने का आरोप उनपर लगने लगा। रास्ते के गांव उन्हें व्यंग्य से पूछते, “तुम असल सिख हो या धर्मच्युत फिरंगी हो?” गुप्त और खुला उपदेश उन्हें दिया जाता कि “समय आने पर स्वदेश की ओर से लड़ना।” इस तरह सारे प्रदेश की गाली-गलौज सिर पर लेते-लेते ये राजनिष्ठ सिख सिपाही जब पटना शहर में घुसने लगे तब लोकद्वेष की ज्वालाएं रास्ते-रास्ते में उन्हें जलाने लगीं। उन्हें देखते ही उस अभिमानी शहर का हर नागरिक उनकी छाया तक अपने शरीर पर न पड़ने देता। और तो और, उस स्वतंत्रता, प्रेमी नगर के मुख्य सिख उपाध्याय ने भी अपने सिख मंदिर में उन स्वधर्मद्रोही अनुयायियों को आने से साफ मना कर दिया। विदेशी सत्ता को प्रणाम करने वाले प्राणी सिर पर बड़े केश रख लें तब भी वे गुरु गोविंद सिंह के सिख धर्म के सच्चे भक्त नहीं होते-ऐसा विश्वास उस सिख गुरु का भी हो गया था। ऐसी ही धारणा मुसलमान मौलवी की और हिंदू धर्माचार्यों की हिंदू समाज के संबंध में हो गई था, इसका पटना शहर उत्कृष्ट उदाहरण है।122 सिख सेना के पटना शहर में आते ही टेलर ने विद्रोह की चिंगारी कुचल डालने को कमर कसी। तिरहुत जिले के पुलिस जमादार वारिस अली के संबंध में वहां के अधिकारियों को आशंका होने से उसके घर पर छापा मार उसे पकड़ लाया गया। यह अंग्रेजी पुलिस का जमादार गया के अली करीम नामक क्रांति के नेता को पत्र लिख रहा था। उसके घर मिले क्रांति के पत्राचार के कारण उसे जल्द ही मृत्युदंड देकर जब फांसी स्थल पर लाया गया त बवह एकाएक लोगों की ओर देखकर चिल्लाया, “स्वराज्य का कोई सच्चा भक्त हो तो मुझे मुक्त करो!” उसका यह निवेदन स्वराज्य-भक्त के कान में जाने से पूर्व ही उसकी निर्जीव देह फांसी पर लटक रही थी। इस वारिस अली के पत्र मे मिले सबूत पर उपर्युक्त नेता अली करीम को भी पकड़ने का आदेश जारी कर उसक काम के लिए एक यूरोपियन टोली भेजी गई। मि. लुई के सामने दिखते-न-दिखते अली करीम अपने हाथी पर चढ़ा। वह आगे और लुई पीछे, ऐसी जंगी दौड़ शुरू हुई। परंतु जल्दी ही दौड़ देखने जमा दर्शकों ने अपने दर्शकीय अधिकारों का उल्लघंन करके पक्षपात करना शुरू किया। आसपास के गांववालों ने यह देखते ही कि अपने स्वदेश बंधु पर यह फिरंगी आदमी टूटा पड़ रहा है, उसे त्रास देना शुरू किया। उसकी राह बदल दी और उसक टट्टू भी कोई भगा ले गया। श्रम और निराशा से ग्रस्त वह अंग्रेज अधिकारी अपने नेटिव सहायकों को चतुर करीम का पीछा करने का काम सौंपकर दूसरे दिन हाथ हिलाता लौट आया। उसका नेटिव सहायक भी फिरंगियों का कट्टर द्वेषी था, अतः उसने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 261 122 "ज्यों ही सिख सैनिकों ने गुरुद्वारे में पग धरा त्यों ही एक पागल फकीर सड़क पर दौड़ता हुआ आया और मुट्ठियां बांधकर उन्हें देशद्रोही, विश्वासघाती आदि अपशब्दों से संबोधित करने लगा।" – टेलर कृत 'पटना क्राइसेस'