भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 418 में से

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करीम को छोड़ दिया और अपने गोरे मालिक के पास अपना सा मुंह लिये लौट गया। पटना शहर में जब यह पकड़ा-धकड़ी चल रही थी तब पटना शहर के कितने ही नेताओं के नमा टेलर को अलग-अलग रास्ते से ज्ञात हो गए और उसने उनपर भी आकस्मिक छापा डालने का निश्चय किया। क्रांति पक्ष के प्रमुख नेताओं के घरों में क्रांतिकारियों की बैठकें रात्रि में होने के कारण तथा गोपनीयता के कारण सदस्यों के नामों की सूची या कार्यक्रमों का साधार साक्ष्य यद्यपि टेलर के पास नहीं था, फिर भी शहर के तीन बड़े मौलवियों की कारगुजारियों के संबंध में कोई भी आंशका न होने से उन्हें पहले बंद करना टेलर को आवश्यक लगा; पर यदि उन्हें खुले रूप में पकड़ा जाए तो दंगा वहीं से प्रारंभ हो जाएगा, इस डर से उस अंग्रेज अधिकारी ने दूसरी ही युक्ति निकाली। एक दिन उस शहर के चुने हुए लोगों को राज्य व्यवस्था के संबंध में योग्य सलाह देने के लिए टेलर साहब के घर ससम्मान बुलाया गया। उसके अनुसार सारे लोग टेलर के बंगले पर आते ही सिखों की तलवारों के साथ टेलर वहां आया और कुछ चर्चा के बाद आमंत्रित मेहमानों को विदा भी कर दिया गया; परंतु वे तीने मौलवी जाने लगे तो उन्हें टेलर ने रोक लिया और मुस्कुराते हुए सूचित किया कि ‘वर्तमान नाजुक परिस्थिति में आपको स्वतंत्र रहने देना राज्य के लिए हानिकारक होने से आपको कैद किया जा रहा है।’ इस षड़यंत्र के बारे में ‘के’ नामक इतिहासकार कहता है-‘पर कोई भी सत्यवादी कृत्य यदि कोई मुसलमान अंग्रेजों के विरूद्ध करे तो उसे कुछ और नाम दिया जाता। प्रेम से कुछ सज्जनों को बुलाना, ब्रिटिश सरकार के मेहमान के रूप में उन्हें आमंत्रित करना और उनके विश्वासपूर्वक घर आने के बाद उन्हें कैद करना लगभग विश्वासघात नहीं, होता तो उन्हें मार दिया जाता।‘’ फिर भी राज्य के लिए हितकारी होने के बहाने उस कृत्य की भी सब ओर प्रशंसा ही हुई और टेलर की युक्ति की सारे अंग्रेजों ने प्रशंसा की। राज्य क्रांति के नेताओं को इस तरह रक्त की एक बूंद भी बहाए बिना पकड़ते ही टेलर ने नागरिकों को निःशस्त्र करने और रात के नौ बजे के बाद घर से बाहर न निकलने का आदेश जारी किया, ताकि इस आकस्मिक आघात से चकित पटना शहर को उसकी चोटें असह्य होने और धीरज समाप्त होने के पूर्व ही चुप किया जा सके। इस आदेश से क्रांति पक्ष की रातों की गुप्त बैठकें असंभव हो गई। शस्त्र संचय भी बंद हो गया। इस समय तक पटना की क्रांति समिति विद्रोह के लिए दानापुर के सिपाहियों से संकेत मिलने के लिए रूकी थी। परंतु उसके पूर्व ही ये प्राणघाती हमले शुरू हो जाने के कारण ऐसी योजना उसके नेताओं की बनी कि अब नीचे कुचले जाने की अपेक्षा साहस से विद्रोह ही किया जाए। जुलाई की 3 तारीख को पटना शहर के पीर अली नामक नेता के 1857 का स्वातंत्र्य समर – 262

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