१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघर की ओर मुसलमान जाने लगे। थोड़ी ही देर में उस घर से एक के बाद दूसरा हरा झंडा लिये बाहर निकला और 'दीन-दीन' की गर्जना हो उठी। कोई दो सौ जेहादी लोगों ने उन हरे झंडों के साथ जाकर एक चर्च पर हमला किया। इतने में एक लायल नामक गोरा कुछ सिखों के साथ आता दिखा जिसे पीर अली ने गोली से मार गिराया और फिर उस गोरे रक्त की पहली बलि गिरते ही शेष मुसलमानों ने उस गोरे पर इतनेवार किए कि उसका चेहरा पहचानना भी कठिन हो गया। परंतु जब रैटरे ने अपने सिखों के साथ चढ़ाई की, जब उन राजनिष्ठ सिखों ने स्वदेश बंधुओं पर जोरदार हमला किया, अपने हिंदुस्थान के पेट में सिखों ने जब अपनी तलवारें घुसेड़ीं और जब सिखों के शरीर भारत माता के रक्त से लाल होकर शोभित हुए तब उस जोरदार मार के सामने उन मुट्ठी भर क्रांतिकारियों की भीड़ बिखरकर इधर-उधर हो गई। अंग्रेजों ने दंगाकारी लोगों के नेताओं को तुरंत कैद किया। उसमें लायल को मारनेवाला पीर अली भी था। पीर अली लखनऊ का मूल निवासी था और कुद समय से पटना में पुस्तक बेचने का कार्य कर रहा था। बेची जानेवाली पुस्तकों को पढ़ते-पढ़ते उसे देश की स्वतंत्रता की चाह हो गई। उसमें स्वधर्म-प्रतिष्ठापन की महत्त्वकांक्षा जागी। उसके मन को परतंत्रता का घाव और पैरों में पड़ी गुलामी की बेड़ियां असह्य होने लगीं। दिल्ली और लखनऊ शहर की क्रांति समितियों से आवाजाही बढ़ाकर वह अंग्रेजों के राज्य के संबंध में अपने हृदय में चुभते लज्जा के कांटे दूसरों के हृदय में भी रोपने लगा। वह व्यवसाय से पुस्तक विक्रेता था, परंतु पटना की क्रांति समिति में उसका प्रभाव इतना बढ़ा कि समिति के श्रीमान लोगों के द्रव्य सहयोग से उसके धीन अनेक सशस्त्र नौकर रखे गए और उन्हें आदेश मिलते ही अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध युद्ध करने की शपथ दिलाई गई। पटना के अंग्रेज अधिकारियों द्वारा अत्याचार प्रारंभ करते ही पीर अली के तेज स्वभाव के लिए चुप रहना कठिन हो गया। वह व्यवहार से बड़ा कर्मठ, स्वाभिमानी और शूर था। उससे स्वदेश की दुर्दशा देखी नहीं गई, इसलिए उसी के बयान के अनुसार-"अपक्व स्थिति में ही विद्रोह किया।" फांसी का दंड दिए जाने पर जिसके हाथों में भारी-भारी हथकड़ियां हैं, शरीर पर हुए घावों से जिसके वस्त्र रक्त से सने हैं और मरण की भयानकता को अपनी मुद्रा के वीर हास्य से जो धिक्कार रहा है, ऐसा पीर अली फांसी के फंदे के सामने खड़ा है। अपने प्रिय पुत्र का नाम लेते ही उसक कंठ भर आया। इतने में अंग्रेज अधिकारियों ने पूछा, "शांत दृष्टि से उन अंग्रेजों की ओर घूमकर वह बड़े धैर्य से बोला, "जीवन में कुछ अवसर ऐसे होते हैं जब अपनी रक्षा करना इष्ट होता है, पर कुछ ऐसे होते हैं जो चिरंजीवी होने का उत्तम साधन है तत्काल मृत्यु।" फिर अंग्रेजों द्वारा किए जानेवाले अन्याय व अत्याचारों की बिना 1857 का स्वातंत्र्य समर - 263