१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंडरे निंदा करते हुए वह लोक उपकार के लिए आत्मार्पण करनेवाला शहीद बोला, “मुझे आप फांसी पर चढ़ाएंगे, मेरे जैसे अन्य लोगों को फांसी पर चढ़ाएंगे, पर आप हमारे ध्येय को फांसी पर नहीं चढ़ा सकते। मैं मरा तो मेरे रक्त से हजारों नए कार्यकर्ता उत्पन्न होंगे और आपके शासन का उच्छेद करेंगे।”123 ऐसी भविष्यवाणी कर यह देशवीर अपने अस्तित्व से स्वदेश पर जरा भी लज्जा की छाया न डालते हुए अपनी मृत्यु से स्वदेश के देशवीर मंडल की तेजोमय सूची में प्रतिष्ठा पा गया। 'मेरे रक्त से हजारों नवीन कार्यकर्ता उत्पन्न होंगे', ऐसा उस शहीद का जो अंतिम वर्णोच्चार था वह असत्य होनेवाला नहीं था, वह असत्य हुआ भी नहीं। उसकी मृत्यु का समाचार सुनते ही अति राजनिष्ठ गिनी जानेवाली दानापुर की नेटिव सेना 25 जुलाई को विद्रोह कर उठी। दानापुर का यूरोपियन तोपखाना और गोरी रेजिमेंट होते हुए भी तीन नेटिव रेजिमेंटो ने अपने शस्त्रास्त्र और कंपनी के यूनीफॉर्म तिरस्कार से फेंककर शोण नदी की आरे प्रस्थान किया। उस स्थान का मुख्य अधिकारी मेजर जनरल लॉयड भयग्रस्त और बूढ़ा था, इसलिए उन सिपाहियों का तुरंत पीछा करने की उसकी हिम्मत न हुई। यद्यपि अंग्रेज मेजर जनरल अपने बुढ़ापे के कारण पंगु हो गया था, तब भी जिस दिशा को वे नेटिव रेजिमेंट जा रही थीं उस दिशा में जिसकी तलवार और भुजदंडों में अभी भी तरूणाई का तेज हिलोरें मार रहा है- ऐसा एक अप्रतिम वृद्ध युवा अपने बुढ़ापे की परवाह न करते हुए जगदीशपुर के राजमहल में मूंछों पर ताव देते खड़ा था और उसी के ध्वज की ओर ये सिपाही दौड़े जा रहे थे। अंग्रेजों के शासन का जुआ उतार फेंकने के बाद जिस एक कमी के कारण आज तक स्वतंत्रता के सिपाहियों और लोगों के सारे परिश्रम विफल हो रहे थे, वह धुरंधरत्व की न्यूनता इस शाहाबाद जिले में जगदीशपुर के महल ने शेष नहीं रहने दी थी और इसीलिए उस जगदीशपुर के हिंदू राजा के ध्वज की ओर शोण नदी उतरकर ये सिपाही दौड़ते जा रहे थे; क्योंकि स्वराज्य संग्राम के लिए सुयोग्य एक नेता उन सैनिकों को अंत में जगदीशपुर में ही मिलनेवाला था। राजपूत वंश की खान से ही जिस स्वतंत्रताप्रिय नेता का जन्म हुआ उसका नाम कुंवर सिंह था। शाहाबाद तहसील की विस्तीर्ण भूमि का स्वामित्व इस कुंवर सिंह के उदार चरित्र वंश में सुप्रतिष्ठित हुआ था और उस राजवंश । 1857 का स्वातंत्र्य समर - 264 123 कमिश्नर टेलर्स ने स्वयं कहा है कि “पीर अली स्वयं एक साहसी और दृढ़ संलल्पवाला व्यक्ति था। यद्यपि उसका रूप बेढंगा था और उसके चेहरे से ही क्रूरता और कठोरता झलकती थी, किंतु इसपर भी वह शांत और संयमी था। उसकी बोलचाल और व्यवहार में शालीनता थी। इस प्रकार के लोग अपनी अजेय निष्ठा के कारण खतरनाक शत्रु सिद्ध होते हैं। किंतु अपनी कठोर आन के कारण वे किसी सीमा तक प्रशंसा के पात्र होते हैं। -के, खंड 3, पृष्ठ 86