१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपर वहां के जन-समूह की निसर्ग स्फुरित प्रीति थी। बड़े-बड़े बादशाहों के तूफान हिंदुस्थान की राजनीति के समुद्र में उठे और इस प्रदेश के ऊपर से भी घन गर्जना करते जा-आ रहे थे तब भी परम कारुणिक राजपूत राजछत्र के नीचे वह प्रदेश स्वराज सुख का और स्वातंत्र्य चैतन्य का अखंडित लाभ लेता रहा था। राजनीति में क्रांति की ऋतु बदलते हुए उसकी गरमी-सर्दी-वर्षा के असह्य आघात अपने सिर पर लिये कुंवर सिंह के उस स्थिर वंशवृक्ष ने अपनी छाया तले के प्रजा रूपी पंछियों को स्वराज्य क`वसंत में पाला-पोसा था और उस प्रजा की उस राज्य और उस राजवंश पर अकृत्रिम श्रद्धा थी। और उस राज्य की अपनी प्रजा पर वत्सलता की कोई सीमा नहीं थी। पर पराधीनता का हलाहल हृदय में नहीं, उसके हृदय भाव को यह स्वराज्य-राजनिष्ठा का योग शूल की तरह चुभने लगा। उसने अपने तरकश की भीषण आंधी से एक प्रबल मत्सर दामिनी बाहर निकाली और इस राजवंश पर उसका निष्ठुर आघात भीषण ध्वनि के साथ आकर गिरा। स्वराज्य छत्र टूटकर वह देश नंगे सिर हो गया-स्वराज्य के विरह से वह राज्य-वृक्ष जलकर राख हो गया, उसकी छाया के नीचे के पंछी अंगारों में फड़फड़ाने लगे। और स्वदेश की यह कठिन अवस्था देखकर मन में उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि के कारण वह वृद्ध कुंवर सिंह अपने जगदीशपुर के महल में मूंछों पर ताव देता खड़ा था। वृद्ध युवा-हां, वह वृद्ध युवा था। क्योंकि आज तक अस्सी शरद ऋतुएं देह पर से उतर गई थीं, परंतु उसकी आत्मा का तेज अभी भी जीवित अंगार-सा दहकता है। अब तक लगभग अस्सी ग्रीष्म ऋतु, अपनी प्रखर धूप से चमचमा चुकी थीं तब भी उसकी भुजलता अभी युवा ही बनी हुई है। अस्सी वर्ष का कुंवर सिंह-अस्सी वर्ष का कुमार! और उसमें भी सिंह! उसके देश का अंग्रजों द्वारा किया हुआ अपहरण उसे कैस मान्य हो? अवध का राज्य डलहौजी ने गटका और फिर जब सारा भारत समतल करने के लिए अंग्रेजी तलवार भारतभूमि की टेकरियों को खोदते चली तब ही कुंवर सिंह के देश को अंग्रेजी तलवार ने घायल कर किया था। अपने स्वदेश और अपने स्वराज्य का अघोर एवं अन्यायी अपहार करनेवाली उस अंग्रेजी तलवार के टुकड़े करूंगा, ऐसी गर्जना कुंवर सिंह ने की और वह श्रीमंत नाना साहब से बोलने-चालने लगा था। भयंकर चाल और भयंकर बोल! हर-हर महादेव का बोल! अफजल खां वध के पोवाड़ा की चाल! और उस चाल पर यह भीषण रणगीत चालू था। कुंवर सिंह के मन में राज्य क्रांति के विचार घूम रहे हैं। स्वदेश क स्वतंत्रता के लिए उसने सारे हिंदुस्थान के क्रांति केंद्रों से संपर्क बनाया हुआ है। उस पटना विभाग के हजारों सिपाही गुप्त रूप से उससे मिल गए हैं। ऐसे अलग-अलग समाचार पटना के कमिश्नर टेलर को ज्ञात हुए। यह बात फिर भी टेलर को असंभव लगती थी कि यह अस्सी वर्ष का वृद्ध राजा चिता की ओर जाना छोड़ स्वतंत्रता की चिंता करे। फिर भी टेलर ने कुंवर सिंह को सूचित किया कि 1857 का स्वातंत्र्य समर - 265