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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पर वहां के जन-समूह की निसर्ग स्फुरित प्रीति थी। बड़े-बड़े बादशाहों के तूफान हिंदुस्थान की राजनीति के समुद्र में उठे और इस प्रदेश के ऊपर से भी घन गर्जना करते जा-आ रहे थे तब भी परम कारुणिक राजपूत राजछत्र के नीचे वह प्रदेश स्वराज सुख का और स्वातंत्र्य चैतन्य का अखंडित लाभ लेता रहा था। राजनीति में क्रांति की ऋतु बदलते हुए उसकी गरमी-सर्दी-वर्षा के असह्य आघात अपने सिर पर लिये कुंवर सिंह के उस स्थिर वंशवृक्ष ने अपनी छाया तले के प्रजा रूपी पंछियों को स्वराज्य क`वसंत में पाला-पोसा था और उस प्रजा की उस राज्य और उस राजवंश पर अकृत्रिम श्रद्धा थी। और उस राज्य की अपनी प्रजा पर वत्सलता की कोई सीमा नहीं थी। पर पराधीनता का हलाहल हृदय में नहीं, उसके हृदय भाव को यह स्वराज्य-राजनिष्ठा का योग शूल की तरह चुभने लगा। उसने अपने तरकश की भीषण आंधी से एक प्रबल मत्सर दामिनी बाहर निकाली और इस राजवंश पर उसका निष्ठुर आघात भीषण ध्वनि के साथ आकर गिरा। स्वराज्य छत्र टूटकर वह देश नंगे सिर हो गया-स्वराज्य के विरह से वह राज्य-वृक्ष जलकर राख हो गया, उसकी छाया के नीचे के पंछी अंगारों में फड़फड़ाने लगे। और स्वदेश की यह कठिन अवस्था देखकर मन में उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि के कारण वह वृद्ध कुंवर सिंह अपने जगदीशपुर के महल में मूंछों पर ताव देता खड़ा था। वृद्ध युवा-हां, वह वृद्ध युवा था। क्योंकि आज तक अस्सी शरद ऋतुएं देह पर से उतर गई थीं, परंतु उसकी आत्मा का तेज अभी भी जीवित अंगार-सा दहकता है। अब तक लगभग अस्सी ग्रीष्म ऋतु, अपनी प्रखर धूप से चमचमा चुकी थीं तब भी उसकी भुजलता अभी युवा ही बनी हुई है। अस्सी वर्ष का कुंवर सिंह-अस्सी वर्ष का कुमार! और उसमें भी सिंह! उसके देश का अंग्रजों द्वारा किया हुआ अपहरण उसे कैस मान्य हो? अवध का राज्य डलहौजी ने गटका और फिर जब सारा भारत समतल करने के लिए अंग्रेजी तलवार भारतभूमि की टेकरियों को खोदते चली तब ही कुंवर सिंह के देश को अंग्रेजी तलवार ने घायल कर किया था। अपने स्वदेश और अपने स्वराज्य का अघोर एवं अन्यायी अपहार करनेवाली उस अंग्रेजी तलवार के टुकड़े करूंगा, ऐसी गर्जना कुंवर सिंह ने की और वह श्रीमंत नाना साहब से बोलने-चालने लगा था। भयंकर चाल और भयंकर बोल! हर-हर महादेव का बोल! अफजल खां वध के पोवाड़ा की चाल! और उस चाल पर यह भीषण रणगीत चालू था। कुंवर सिंह के मन में राज्य क्रांति के विचार घूम रहे हैं। स्वदेश क स्वतंत्रता के लिए उसने सारे हिंदुस्थान के क्रांति केंद्रों से संपर्क बनाया हुआ है। उस पटना विभाग के हजारों सिपाही गुप्त रूप से उससे मिल गए हैं। ऐसे अलग-अलग समाचार पटना के कमिश्नर टेलर को ज्ञात हुए। यह बात फिर भी टेलर को असंभव लगती थी कि यह अस्सी वर्ष का वृद्ध राजा चिता की ओर जाना छोड़ स्वतंत्रता की चिंता करे। फिर भी टेलर ने कुंवर सिंह को सूचित किया कि 1857 का स्वातंत्र्य समर - 265

आप बहुत वृद्ध हैं, आपका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है, अतः आपके शेष जीवन का सान्निध्य लाभ मुझे मिल सके, ऐसी मेरी प्रबल इच्छा होने से आप पटना में मेरे मेहमान रहें तो मैं आपका आभारी हूंगा। यह आमंत्रण अस्वीकृत नहीं होगा ऐसी आशा करता हूं-टेलर, अफजल खां ने शिवाजी को ऐसे ही मिलने का निमंत्रण दिया था। उस चतुर राजपूत ने तब ही जाना कि पटना के चीफ कमिश्नर का यह प्रेम निमंत्रण माने कैदखाने का दरवाजा किसी भी प्रतिकार के बिना खोल देना था। इसलिए उसने भी उत्तर भेजा-''आभारी हूं। मेरा स्वास्थ्य आप लिखते हैं वैसे-मैं सचमुच बहुत अस्वस्थ हूं और इसीलिए अभी पटना नहीं आ सकता। मैं स्वस्थ होते ही तुरंत वहां आता हूं।'' कुंवर सिंह! 'अस्वस्थता' सुधारने को जो औषधि चाहिए थी वही लेकर दानापुर के विद्रोही सिपाही जगदीशपुर आ पहुंचे फिर अब इहरना किसके लिए? तेरी देशमाता की शपथ है, तेरे स्वधर्म की शपथ है, तेरे मानभंग की शपथ है, कुंवर सिंह म्यान फेंक दे और स्वतंत्रता के लिए तलवार खींच! तू हमारा राजा, तू हमारा नेता, तू हमारा सेनानी है। राजपूत वंश के शिरभूषण, तेरी यह उदात्त चरित्र देह! 'यह शय्या पर नहीं, रणभूमि पर ही गिरने के योग्य है।' स्वराज्य के लिए उतावले वे सैनिक चिल्लाने लगे-यही कुंवर सिंह के कुलोपाध्याय शुचिव्रत ब्राह्मण उपदेश करने लगे।¹²⁴ ऐसा ही उसकी तैयार तलवार भी कहने लगी। पटना शहर हाथी पर बैठकर जाना भी जिसे अस्वस्थता के कारण असंभव, वह अस्सी वर्ष का राजपूत कुंवर सिंह तड़ाक से उठा और रुग्ण शय्या पर से वह जो उठा तो एकदम रणक्षेत्र में ही जाकर रूका। शाहाबाद जिले के मुख्यालय 'आरा' शहर में जगदीशपुर से निकले सिपाही दौड़ते गए और उन्होंने वहां का अंग्रेजी खजाना, झंडा, कारावास, कार्यालय सबमें उत्पात किया और एक छोटे से परकोटे की ओर मुंह मोड़ा। विद्रोह हो जाए तो स्व संरक्षण कर सकें इसक लिए उस शहर के धूर्त अंग्रेजों ने उस परकोटे में गोला-बारूद्ध, अस्त्र, अन्न, वस्त्र आदि सामग्री रखी हुई थी। केवल उस शहर के मुट्ठी भर अंग्रेजों को सहायता देने के लिए पटना से पचास सिखों की एक टुकड़ी भी आई हुई थी। ऐसी तैयारी से सिखों सहित पचहत्तर लोग उस गढ़ी में व्यवस्था से रह रहे थे। उस गढ़ी को विद्रोही सैनिकों ने घेर लिया। उस छोटी गढ़ी में ये पच्चीस अंग्रेज और पचास सिख बड़ी ही मजबूती से अपना संरक्षण कर रहे थे, तब बाहर के सैकड़ों सिपाही उस गढ़ी पर एकदम हमला 1857 का स्वातंत्र्य समर - 266 ¹²⁴ ''ब्राह्मणों ने भी कुंवर सिंह को विप्लव और विद्रोह के लिए प्रोत्साहित किया।'' - 'ऑफिसियल डिस्पैच'

करना छोड़ इधर-उधर से शत्रु को घेरने में लगे हुए थे। कदाचित् ऐसा भी रहा होगा कि गढ़ी तो कब्जे में है ही, उसपर समय गंवाने और मनुष्य हानि करने की अपेक्षा आसपास के क्षेत्र और अन्य अंग्रेजी स्थानों का बंदोबस्त करना विद्रोहियों को अधिक लाभदायी लगा होगा। कुछ इस कारण और कुछ गढ़ चढ़ाकर गोले बरसाने चालू किए। एक-दो बार गुप्त सुरंग खोदकर परकोटे के नीचे बारूद भी लगाई गई। अंदर के लोगों को थोड़े ही दिनों में पानी की बूंद भी मिलना कठिन हो गया। पर अपने गोरे अन्नदाता के ऐसे हाल होते देखकर सिख लोग चुप बैठनेवाले नामर्द नहीं थे। उन्होंने चौबीस घंटे में उस गढ़ी में से जो लड़ रहे हैं वे केवल यूरोपियन नहीं, उनमें अधिकतर सिख हैं यह बात जब खुली तब विद्रोहियों को बहुत खेद हुआ। क्योंकि यह लड़ाई अंग्रेजों के विरुद्ध हिंदुस्थानियों की न होकर गुरु गोविंद सिंह और कुंवर सिंह के बीच हो गई। जो अंग्रेजों की ओर से इतनी विलक्षण शूरता से पर ऐसे नीचे देशद्रोह से लड़ रहे हैं उन सिखों को अपनी तरफ करने के लिए रोज शाम को विद्रोहियों के दूत एक खंभे की आड़ में खड़े हो जोर-जोर से उपदेश करते- "ऐ सिखों! तुम फिरंगियों की ओर से लड़त्रकर किस नरक में जाना चाहते हो? जिन्होंने अपना राज डुबाया, जो अपनी देशमाता पर जबरदस्ती करना चाह रहे हैं, जिन्होंने अपना धर्म अनाथ कर दिया है, उनकी ओर से लड़कर तुम किस नरक का साधन कर रहे हो?" परंतु विद्रोहियों के स्वधर्म, स्वदेश, स्वहित और स्वतंत्रता आदि की हर शपथ से अंग्रेजों का पक्ष छोड़ने के लिए किए गए आनेवाले निवेदनों तथा तुमने यह देशद्रोह न छोड़ा तो हम तुम्हें मार डालने से भी नहीं चूकेंगे-उनकी ऐसी धमकियों का सिखों पर तिल भर असर नहीं हुआ। उलटे अपनों द्वारा किए गए निवेदनों के उत्तर में वे गोलियां चलाते और यह देखकर शाबाश! शाबाश!! कहते हुए यूरोपियन उनकी पीठ ठोंकते। ऐसी स्थिति में उस घेरे को तीन दिन हो गए। तीसरे दिन अर्थात् जुलाई 29 की रात उस गढ़ी की वह छोटी अंग्रेजी सेना से आनेवाली तोपों की गड़गड़ाहट से उछल पड़ी। आनंद से उनके चेहरे प्रमुदित हो उठे। इन विद्रोहियों का नाश कर यह घेरा तोड़ने अंग्रेजी सेना तो नहीं चली आ रही? हां, वह अंग्रेजी सेना ही घेरा तोड़ने के लिए अंत में चली आ रही है। दानापुर में जो गोरी रेजिमेंट थी उसमें से दो सौ गोरे लड़ाके और सौ काले लड़ाके-यह सेना कैप्टन डनबार जैसे साहसी योद्धा के अधीन इकट्ठी होकर आरा में पड़ा घेरा तोड़ने शोण नदी के किनारे आ गई। इस अंग्रेजी सेना के चेहरे पर जो उत्साह और विजय की निश्चिंता दिख रही थी वैसी कभी भी दिखाई न दी होगी। उन्हें विदा करने आए आंग्ल नर-नारियों ने हंसते-मुसकराते उनसे विदा ली। शोण नदी में नावें चलने लगीं और शाम सात बजे 1857 का स्वातंत्र्य समर – 267

आरा शहर के तीर को उस सेना ने स्पर्श किया। शुक्ल पक्ष का मनोहर शशि बिंब उस भूमि की विजयी सेना के विजयोत्साह का हिस्सेदार बनने के लिए आकाश से उनके साथ चलने लगा। कैप्टन डनबार, इस सफेद चांदनी में अपनी सेना का व्यूह समय पर उत्तम रच ले! क्योंकि आगे चांदनी होगी या कालिमा, इसका कोई भरोसा नहीं। इस व्यूह में हमेशा की तरह ये राजनिष्ठ सिख ही हैं-ऐसा मानकर वे पहली पंक्तियों में खड़े रहने को तैयार ही हैं। आरा के घने जंगल में ले जानेवाला वह काला पथ-प्रदर्शक कहां है? उसे आगे करो और चलो। विजयी सैनिकों, रणांगण के लिए उत्सुक अपनी तलवारें इस चांदनी में चमकाते आगे बढ़ो। पेड़ के बाद पेड़ चला, जमीन के पीछे जमीन छूटने लगी। और यह आरा शहर का पुल भी आ गया। पर यह क्या? शत्रु कहां है? अभी तो एक भी पांडे अपनी प्यासी तलवार को तो छोड़ो दीर्घ दृष्टि बंदूक को भी दीख रहा, यह कैसे हुआ? भाग गए डरपोक! डनबार आ रहा है, केवल यही सुनकर वे सारे नामर्द लोग भाग गए। सिकंदर का भी उसके शत्रु पर इतना आतंक न रहा होगा। हे चंद्रमा! रण-समर की आशा में तू इतनी देर ठंडी हव में सिहरता खड़ा रहा, पर इन डरपोक विद्रोहियों का पलायन चातुर्य तो तूने देख ही है। तो अब अधिक निराश न होकर तू सुख शय्या करने के लिए अपने विश्व मंदिर पर रात का परदा गिराकर शय्यागृह में लौट जा। चंद्रमा लौट गया, पर डनबार तू मत लौटना। च्रदंमा को जाना-बूझा शशलांछन! पर तेरी सफलता को सिंह भी लांछन लगाने की हिम्मत न कर सके, इसलिए तू मत लौट जा। चंद्रमा लौट गया, पर डनबार तू मत लौटना। अब यह अमराई आ गई है और डरपोक पांडे अब उनके हाथ आने की कोई संभावना नहीं है। पर यह आवाज कैसी! अमराई के पत्ते तो खड़ाखड़ नहीं कर रहे? सूँऽ सूँऽ सूँऽ ! अरे बाप रे! सावधान ! अंग्रेज सैनिकों, सावधान! गोलियों की बरसात, चारों ओर से झड़ी लग गई। अमराई का हर वृक्ष अपने अनंत शाखा रूपी हाथों में बंदूकें लेकर उस अंग्रेजी सेना पर टूट पड़ा। आया ˙कुंवर सिंह आया। अस्सी वर्ष का योद्धा और तू एकदम जवान। चलो देखें, कौन हटता है। अंग्रेजी सेना ने लड़ने में पूरा जोर लगाया, पर लड़े किससे? शत्रु पक्ष का एक भी सिपाही दिखे नहीं। उस घनी अमराई में; मध्य रात के उस घने अंधियारे में उस ऊंचे नीचे प्रदेश के घूम-घूमाव में छिपकर बैठा कुंवर सिंह की सेना का एक आदमी भी अंग्रेजी सेना को नहीं दिखता था। आकाश के तारे और जमीन के वृक्ष, इसके सिवाय कुछ दिखे नहीं और इन दोनों पर गोलियां चलाकर उन्हें जीतना संभव न हो। वायु देवता ने कुपित होकर अपने झंझावत से लाल-लाल गोलियों की आंधी फुफकारते हुए चलाई हा, ऐसे इस अंग्रेजी सेना पर किसी अदेहधारी देवता की मार पड़ने लगी। बाईं ओर से मार, दाईं ओर से मार, पीछे से मार! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 268

अंग्रेजों की वरदी सफेद रंग की होने से वह कुंवर सिंह को दिखाई देती थी। परंतु कुंवर सिंह के लोग काले, उनकी वरदी काली और रात काली और रात काली! सारे काले वस्त्रों के एक दिल हो जाने से सिखों के काले-दोनों पैर रणक्षेत्र से भाग खड़े हुए। उनका कमांडर डनबार पहले झटके में ही मारा गया था। अपने प्राण बचा भागते वह अंग्रेजी सेना एक गांव में आ पड़ी। वहां कुछ देर छिपकर बैठने का प्रयास कर भोर होते ही उस घनघोर रात में रणक्षेत्र में मरे हुए ही नहीं, अपने घायल बंधुओं को वहीं छोड़ऋ अपने कमांडर का शव भी वैसे ही छोड़कर वे भूखे, प्यासे, रक्तरंजित, शर्म से काले पड़े अंग्रेज सैनिक प्राण की आशा में शोण नदी की ओर दौड़ने लगे। परंतु कुंवर सिंह के आगे दौड़ना भी कोई साधारण बात नहीं थी। हर कदम पर उनका रक्त टपकता। कोई जंगली सूअर शिकारी का भाला घोंपे जाने शरीर से रक्त की अविरल धार बहाते, शक्ति क्षय से बार-बार इधर-उधर गिरते, किसी पिघले मेघ जैसा लाला शोणित बिखेरता दौड़ता जाए-वैसे ही अंग्रेजी सेना शोण नदी तक दौड़ती आई। पर यहां तो विनाश की पराकाष्ठा हो गई। नौकाएं न मिलीं, जो मिलीं, जो मिलीं वे रेत में धंस गईं, जो रेत में नहीं धंसी उन्हें पांडे लोगों ने जला दिया । एक-दो नौकाएं शेष रहीं। आरा का घेरा तोड़कर वहां के बहादुर लोगों सहित विजय गीत गाती अपनी सेना लौटी होगी, इसलिए दानापुर के अंग्रेज नर-नारी नदी किनारे पहुंचे तो उन्हें नौकाओं से एक भी उत्तेजक हंसी सुनाई नहीं दी। झंडा नहीं, बैंड नहीं, कोई ऊपर सिर उठाए नहीं, सबका सीना धड़धड़ाने लगा। मेरा पुत्र, मेरा भाई, मेरा बाप, मेरा पति-कल ही आकर हंसते-मुस्कुराते लड़ाई पर गया और आज हे भगवान! कृपा कर, अमंगल टाल। यह निवेदन परमेश्वर के घर पहुंचने के पहले ही अपयश लिये वह अंग्रेज सेना दानापुर के घाट पर आकर लगी। और तुरंत ही वह भयानक समाचार इधर-उधर फैला कि चार सौ पंद्रह में से कोई पचास लोग ही कुंवर सिंह की मार से बचकर जीवित लौटे हैं। एक अंग्रेज लेखक लिखता है-‘उस समय का महिलाओं द्वारा किया गया विलाप जिसने सुना होगा वह उसे आजीवन भूल नहीं सकता। कुछ स्त्रियां कर्कश ध्वनि से चीखने लगीं, कुछ फूट-फूटकर रोने और अपने बाल नोचने लगीं। उनके उस शोक आवेग में उन्हें जनरल लॉयड दिखाई दे जाता तो इस नाश के मूल उत्पादक को वे जीवित फाड़ डालतीं-इसमें शंका नहीं थी।’ परंतु इन अंग्रेज महिलाओं के रूद्रन स्वर से दानापुर का आकाश जब इधर फट रहा था तब उनके दुःखों का बदला लेने के लिए मेजर आयर उधर आरा की ओर जा रहा था। उसे उपर्युक्त पराजय का समाचार अभी मिला नहीं था, फिर भी आरा में अंग्रेजी सेना घिरी हुई है, यह सुनते ही वह उधर दौड़ पड़ा। 29 और 30 जुलाई को डनबार की 1857 का स्वातंत्र्य समर – 269

सेना को नेस्तनाबूद कर कुंवर सिंह के सिपाही जो वापस लौटे तो आयर की सेना के उधर आने का समाचार उस वृद्ध सेनानी को मिला। क्षण भर का भी विश्राम न लेकर उसने अपनी सेना इकट्ठी की। मेजर आयर जिधर से आ रहा था उस रास्ते के हर अवरोध का लाभ लेते हुए उसने लड़ाई जारी रखी और अंत में 2 अगस्त को बीबीगंज गांव के पास लड़ाई की टक्कर ली। सामने की एक झाड़ी की ओर ये दोनों उसे अपने कब्जे में लेने के लिए दौड़ रही थीं। उस वृद्ध और युवा की भयंकर स्पर्धा में वृद्ध कुंवर सिंह ही उस झाड़ी पर पहले कब्जा करने में सफल रहा। और वहां आते ही उसने आयर पर जोरदार मार चालू की। आयर के पास तीन उत्तम तोपें और उनके सहारे से वह आगे बढ़ रहा था। कुंवर सिंह के सिपाही उसपर तीन बार टूटे। तीनों ही बार उन अग्निवर्षा तोपों के मुंह तक उनके हल्ले पहुंचे, पर अंग्रेज तोपों की मार अखंड चलती रही। इसी समय कैप्टन हेस्टिंग नामक अंग्रेजी योद्धा आयर के पास हांफते हुए आया है।‘‘ यह उग्र स्थिति और आधा घंटा बनी रहती तो कुंवर सिंह वह लड़ाई जीत जाता। अब कुद भी करें तो भी विजय हाथ से जा रही है तो क्यों न एक बार साहस की परीक्षा कर ली जाए। तुरंत अंग्रेजी सेना बैनेट साधकर विद्रोहियों पर तीर की तरह टूट पड़ी। तोपों में मुंह पर भी जो सिपाही टूटने में डगमगाते नहीं थे वे विद्रोही सिपाही अंग्रेजों के बैनेट के हमले के आगे खड़े रहने का जाने क्यों कभी साहस नहीं करते थे और यहां भी वे हिम्मत हार गए। आयर उन्हें उस झाड़ी में से बाहर निकाल आगे घुसा और आरा की गढ़ी की ओर बढ़ गया। वहां बंद अंग्रेजी सेना को उसने मुक्त किया और इस तरह आरा शहर फिर से अंग्रेजों के हाथ आ गया। आरा शहर का घेरा कोई आठ दि नही चला था। उन आठ दिनों में यह घेरा संभालते जगदीशपुर के उस शूर पररावार नहीं था तब भी उसके बाजारू अनुयायियों में जोड़-तोड़ और साहस की कमी के कारण आयर से पराजित होते ही कुंवर सिंह जगदीशपुर की ओर निकल गया। अंग्रेजी को आरा की सेना और अन्य नई कुमुक मिलने से वह सेना फूलती जा रही है, यह ज्ञात होने पर कुंवर सिंह ने जगदीशपुर के पास यथासंभव लोगों को इकट्ठा करना चालू किया। अंग्रेजी सेना को कुंवर सिंह के कर्तव्य की थोड़ी सी पहचान हो जाने से कदाचित् वह फिर से आरा के घेरा टूट जाने पर जिनका उत्साह भंग हुआ है ऐसे अनुयायियों के साथ अंग्रेजों जैसे अनुशासित, एक दिलवाले और विजय से सबल हुए शत्रु से राजधानी के एक शहर के पास खुली लड़ाई लड़कर सारी हानि न 1857 का स्वातंत्र्य समर – 270

करके छापामार लड़ाई करने के विचार से अंग्रेजी सेना से दो अच्छी भिड़त हो जाने पर कुंवर सिंह जगदीशपुर के बाहर निकला और 14 अगस्त को आयर कुंवर सिंह के महल में तंबू गाड़कर बैठा। इस तरह जगदीशपुर यद्यपि अंग्रेजों के कब्जे में आ गया, उन्होंने जगदीशपुर के राजमहल, हिंदू मंदिरों और भवनों का नाश किया तो भी उस महल का राजा, उन मंदिरों का देवता, उन भवनों का मालिक योद्धा कुंवर सिंह इस लड़ाई के पहले जितना अजित था उतना ही लड़ाई के बाद भी अजित ही था। राजधानी जाते ही अन्य राजा भले हार जाते हों, पर इस जगदीशपुर के महल की बात वैसी नहीं थी। वहां वह वहां उसका जगदीशपुर-ऐसी उसकी प्रतिज्ञा होने से उसे पकड़े बिना केवल जगदीशपुर पकड़कर बैठना व्यर्थ था। उसने घर खोया, पर रणांगण ही उसका घर हो गया। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 271

प्रकरण-4 दिल्ली हारी अंग्रेजी सेना के तीसरे मुख्य कमांडर द्वार दिल्ली शहर न जीत सकने से निराश होकर त्यागपत्र देने के बाद ब्रिगेडियर विल्सन ने जब मुख्य कमांडर का चार्ज लिया तब विद्रोहियों के आक्रमणों से पगलाई अंग्रेजी सेना के अधिकारियों में दिल्ली का घेरा छोड़कर पीछे जाने का हताश विचार चलने लगा था। घेरा उठाने का वह विचार यदि पक्का हो गया होता तो सन् 1857 का इतिहास कैसा बदला होता, यह सही-सही कहना यद्यपि कठिन है, तथापि विद्रोहियों के हजारो हमलों से अंग्रेजों की जितनी हानि होनेवाली नहीं थी उतनी अंग्रेज पीछे हटकर अपने हाथ से कर लेते, इतना साफ-साफ दिखाई देता है। दिल्ली को घेरने से, शत्रु का शहर कब्जे में कर लेने से अधिक जो दूसरा सैनिक लाभ अंग्रेजों को सहज प्राप्त हो रहा था वह यह कि इससे विद्रोहियों का सैन्य लाभ अंग्रेजों को सहज प्राप्त हो रहा था वह यह कि इससे विद्रोहियों का सैनय सागर दिल्ली जैसे शहर में बंद हो गया था। ऐसा न होता तो वह सारे खुले प्रदेश में फैल गया होता और वह छोटी-छोटी टोलियों में चारों ओर से जूझते रहते तो ऐसे इस छापामार युद्ध से विद्रोहियों को अंग्रेजों पर चारों ओर से कड़े हमले करना और उनकी मुट्ठी भर सेना की मारपीट करना सुलभ हो गया होता। परंतु दिल्ली को घेरे रखकर यह विस्तार पाकर होनेवाला रणक्रंदन सामप्तप्राय हो गया। अंग्रेजों का असह्य कष्ट न देकर सारे विद्रोही एक शहर में जमा होकर स्वतः ही नियंत्रण में आ गए थे। ऐसी स्थिति में दिल्ली का घेरा उठा देने का अर्थ था-इस सेना सागर को सारे प्रदेश पर 1857 का स्वातंत्र्य समर — 272

धींगामुश्ती करने को अपने हाथों बांध फोड़कर खुला छोड़ना। दिल्ली जीत लेने के बाद भी वे सिपाही इधर-उधर फैलनेवाले थे ही। परंतु असफलता से उनका उत्साह भंग करके दिल्ली से भगा देना और हमने अंग्रेजों को घेरा उठाने को बाध्य किया-ऐसी जीत से प्रस्फुरित होकर अपने ऊपर चढ़ा लेने में बहुत भारी अंतर था। अंग्रेज कमांडरों के ध्यान में यह अंतर होते हुए भी हताशा, निरूत्साह और विद्रोहियों द्वारा की हुई नाकेबंदी से जब दिल्ली का घेरा उठाकर वह अंग्रेजी साम्राज्य का सारा भविष्य उसके व्यवहार पर टिका हुआ था-ऐसे समय में दिल्ली के अंग्रेजी शिविर में बेअर्ड स्मिथ जैसा साहसी अधिकारी भी था, यह उनका सौभाग्य ही था। जब अन्य सारे अंग्रेज अधिकारी भाग जाने के विचार में थे तब उसने सबको निश्चय से कहा, "दिल्ली पर से अपनी पकड़ रत्ती भर भी ढीली करना इष्ट नहीं है। निष्ठुर कालपाश की तरह उसके कंठ में पड़ा अपना यह पाश अभेद्य और अटल रहना चाहिए। दिल्ली का घेरा हमने उठाया तो पंजाब भी हाथ से चला जाएगा, हिंदुस्थान हाथ से जाएगा, साम्राज्य हाथ से जाएगा।" बेअर्ड स्मिथ के इस करारे उपदेश से उत्साहित होकर दिल्ली जीतने के पहले लौटना नहीं- ऐसा दृढ़ निश्चय जब अंग्रेजी कमांडर ब्रिगेडियर विल्सन कर रहा था तब भी विद्रोहियों ने अंग्रेजों के दांए या बाएं बाजू पर हमला करके जितनों को मार सकें उतने लोगों को मार लेते। जैसे ही अंग्रेज उनको मारने के लिए उठते, विद्रोही इतनी तेजी से पीछे हटते कि उनका पीछा करने की अपरिहार्य इच्छा अंग्रेजों के मन में उठती और इस तरह अंग्रेजी सेना को परकोटे के पास लाते ही तोपों की भयंकर मार शुरु हो जाती। इस नई युक्ति से विद्रोहियों ने अंग्रेजों को इतनी बार अचूक ढंग से फंसाया और उनकी इतनी हानि की कि कुछ भी हो जाए तो भी सिपाहियों का पीछा न किया जाए, ऐसा विशेष आदेश अंग्रेज कमांडर को देना पड़ा। विद्रोहियों की इस नई युक्ति से अंग्रेजी सेना जैसे-जैसे समाप्त होने लगी वैसे-वैसे उनका कमांडर पंजाब से आनेवाली नई सीजट्रेन की ओर चातक की तरह आंखे गड़ाए देखने लगा। दिल्ली के दक्षिण में अंग्रेजी सेना की क्या स्थिति है? कलकत्ता से निकली अंग्रेज सेना कहां तक आ गई? लखनऊ, कानपुर, बनारस आदि शहरों को क्या हाल है आदि समाचार, उत्तर भारत के आवाजाही के सारे रास्ते, तार, रेल, डाक नष्ट कर देना दिल्ली में कैद अंग्रेजी सेना को ज्ञात नहीं थे। सर हो व्हीलर का सिर कानपुर में उसके धड़ से अलग हुए एक माह बीत जाने पर दिल्ली के कैंप में अंग्रेजों को विश्वसनीय समाचार मिला कि सर हो व्हीलर गोरी सेना के साथ उनकी सहायता को दौड़ता आ रहा है। कलकत्ता की ओर से आनेवाली सहायता की निराशा हो जाने से दिल्ली के अंग्रेजों का सारा बोझ पंजाब पर पड़ा था और आज तक गोरी और काली सेना की नई-नई कुमुक भेजकर जॉन लॉरेंस ने वह बोझ यथासंभव संभाला भी था। फिर भी दिल्ली से मांगी गई सीजट्रेन और कुमु की नई मांग का अनादर न करते हुए जॉन लॉरेंस ने कोई दो हजार चुनी हुई सेना निकल्सन के नेतृत्व में 1857 का स्वातंत्र्य समर - 273

भेज दी थी। इस सेना के आने का समाचार अंग्रेजी छावनी में फैलते ही सैनिकों की मुद्रा में आनंद, उत्साह और द्वेष का तेज झलकने लगा। उस तेज में दो हजार सैनिक आने का हिस्सा उतना नहीं था, उस निकल्सन के आने से वह तेज विशेष झलकने लगा था। निकल्सन जैसे एक नेता का अर्थ हजारों सैनिकों का उत्साह था। हतोत्साहित अंग्रेजी सेना का हर जवान कहने लगा, "निकल्सन आया है, अब विजय में शंका नहीं!'' सुयोग्य कर्णधार मिल जाने से अंग्रेजी सेना के लिए विजय जितनी आशंकारहित होती गई उतनी ही दिल्ली के लिए पराजय सुनिश्चित होती गई; क्योंकि उनकी मुख्य कमी सुयोग्य कर्णधार की ही थी। विद्रोहियों ने जिसे नव सिंहासन पर बैठाया था। वह बादशाह शांतिकाल में दयाशीलता में कितना ही चरित्रवान् हो, परंतु युद्धकाल में अत्यावश्यक रणपटुता और नेतृत्व में असमर्थ और पूरी तरह अनभ्यस्त था। रणपटु सेना को भी लज्जित किया था। अंग्रेजों की अधीनता में ही जिनके शस्त्राभ्यास और अनुशासन की शिक्षा पूरी हुई थी, जिन्होंने तलवार से ही अंग्रेजों के लिए अफगानिस्तान तक साम्राज्य की सीमा बढ़ाई थी, ऐसे कोई पचास हजार सिपाही उस दिल्ली की चारदीवारी के अंदर से उन अभिमानी अंग्रेजों को एक जगह बांधकर आज तक चिढ़ा रहे थे। परंतु उन पचास हजार सिरों को एकीकृत करनेवाला एक सिर फिर भी दिल्ली को चाहिए था। इन इतने भिन्न-भिन्न मणियों की स्वतंत्रता की उत्सुकता एक धागे में पिरोई गई थी। परंतु अंतिम सूत्रमणि का बंधन न मिलने से यह बंधरहित माला एक झटके में आब तक छितर नहीं गई यही एक आश्चर्य था। स्वतंत्रता की हवा से ये रेत कण एक बादल में मिल गए थे, पर हवा से उत्पन्न बादल जैसा ही बिखराव उनमें बना हुआ था। ऐसी स्थिति में उन्हें एक कर्णधार चाहिए था। उन्होंने जिसे मुखिया माना था वह वृद्ध बादशाह भी किसी एक कर्णधार के लिए उन हजारों सिपाहियों जितना ही उतावला था। उसने बख्तर खान को सारे अधिकार देकर देखे। फिर उसने तीन जनरल नियुक्त कर उनके हाथों में नेतत्व देकर देखा। फिर दिल्ली के तीन नागरिक और सिपाहियों के तीन प्रतिनिधि ऐसे छह लोगों का प्रतिनिधिमंडल सारी कार्यवाही संगठित रीति और एकमत से करे, यह निश्चित किया। पर वह प्रतिनिधिमंडल भी जब निष्फल हो गया तब उस उदार और देशाभिमानी बादशाह ने अपने कारण यदि राज्य क्रांति का नाश हो रहा हो और अपने कारण कर्ता लोग अंग्रेजों की ओर जा रहे हों तो अपना शासन भी छोड़ देने को मैं तैयार हूं, इसकी घोषणा की। हिंदुस्थान अंग्रेजों के अधीन रहने की अपेक्षा, हिंदुस्थान में विदेशियों का भ्रमण चालू रहने की अपेक्षा तथा हिंदुस्थान किसी तरह की राजनीतिक गुलामी में सड़ते रहने की अपेक्षा, स्वदेश को स्वतंत्रता प्राप्त करा देनेवाला कोई भी स्वदेशी अधिपति आगे आए तो मुझे सौ गुना अधिक आनंद होगा, ऐसा उस वृद्ध मुगल ने सबको सूचित किया और अपने हस्ताक्षरों से जयपुर, अलवर, जोधपुर, बीकानेर आदि प्रमुख राज्यें को पत्र लिखे 1857 का स्वातंत्र्य समर – 274

कि “अंग्रेजों की बेड़ियों के टुकड़े देखना और किसी भी तरह हिंदुस्थान स्वतंत्र हो, यह मेरी तीव्र इच्छा है। परंतु इस आपात स्थिति में जो सारे देश को नेतृत्व देने में समर्थ हो, राष्ट्रीय शक्ति को जो संगठित कर सके और जिसमें सारा राष्ट्र एकमत हो सके, ऐसा कोई एक धुरंधर कर्णधार सामने आए बिना यह राज्य क्रांति सफल होनेवाली नहीं। हिंदुस्थान को अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र कर उस पर मेरा ही अधिराज्य स्थापित हो, यह मेरी व्यक्ति विषयक महत्त्वाकांक्षा शेष नहीं है। स्वदेश की स्वतंत्रता के कार्य में तलवार से सज्जित होकर अंग्रेजों को सीमा पार करने के लिए आप सब राजा तैयार हों तो हिंदुस्थान के राजमंडल द्वारा स्थापित किसी भी राजमंडल का आधिपत्य स्वीकार कर अपने साम्राज्य अधिपति के अधिकार मैं स्वयं उसके हाथ में देने को खुशी से तैयार हूं''125 यह पत्र मुसलमान धर्म का समर्थक दिल्ली का बादशाह हिंदुस्थान के हिंदू धर्मीय राजाओं को भेज रहा है। सन् 1857 के साल में स्वतंत्रता, स्वराज्य, स्वदेश और स्वधर्म आदि उदात्त शब्दों का कितना यथार्थ बोध हिंदुस्थान के लोगों को हुआ था, यह उपर्युक्त अद्भुत पत्र से स्पष्ट होता है। हिंदू और मुसलमानों की धर्म-भिन्नता स्वदेश की एकता में इतनी विलीन हुई देखकर चार्ल्स बॉल कहता है-‘’ऐसा अनपेक्षित, आश्चर्यकारी और विलक्षण परिवर्तन विश्व इतिहास में कदाचित् ही मिलेगा।‘’ परंतु यह विलक्षण परिवर्तन हिंदुस्थान देश के एक सीमित प्रदेश में ही पूरी तरह घटित होने से उसका तात्कालिक परिणाम सफल नहीं हो सका। दिल्ली की दीवार के सामने गुलामी और देश-स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू थी, यह एक अर्थ में और प्रमुखता से बलाबल की वास्तविक लड़ाई शुरू ही नहीं हुई थी, ऐसा दिखेगा। ‘दिल्ली का घेरा’ नाम की प्रसिद्ध पुस्तक का लेखक कहता है-“हमारे शिविर में एक यूरोपियन के पीछे दस नेटिव थे । जितने यूरोपियन तोपखाने पर होते उससे चौगुने नेटिव लोग और घोड़े के पीछे दो नेटिव घुड़सवार थे। नेटिवों की भरती के सिवाय एक कदम भी आगे रखना संभव नहीं।‘’ देश के एक भाग की चेतना देश के दूसरे भाग की अचेतनता ने मार गिराई। ऐसी स्थिति विद्रोहियों ने अगस्त समाप्त होने तक भी अंग्रेजों को अपने पर मार करने का अवसर न देते हुए अभी तक अघातक पद्धति का अवलंबन की कोई सामान्य पहचान नहीं थी। तोपखाने ने सारी अंग्रेजी सेना पर ऐसी मार करनी चालू की कि सर कोलिन को स्थान छोड़कर सेना की भी बहुत सी हलचल और अंग्रेजी तोपों से बहुत देर गोलाबारी बंद रखनी पड़ी। क्रांतिकारियों का इस साहस से किया हुआ रण-आह्वान आज तक चुपचाप सुनने का सर कोलिन को जो अवसर आया वह इस 5वीं तारीख के बाद 1857 का स्वातंत्र्य समर – 275 125 मेटकॉफ कृत-‘टू नेटिव नैरेटिव्स’, पृष्ठ 226 ।

ओनेवाला नहीं था; क्योंकि अब उसने अपनी सेना की उत्तम एकबद्धता कर मार्ग की सारी बाधाएं दूर कर ली थीं और इसलिए दिनोंदिन अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ के तंबू पर प्रत्यक्ष गोलाबारी का गुल्ली-डंडा खेलते बैठे दृढ़, साहसी और उद्दाम विद्रोहियों से 6 तारीख को स्वयं आगे बढ़कर युद्ध करने का निश्चय उसने किया। इस समय विद्रोहियों की ओर कोई आठ-दस हजार सैनिक शिक्षा प्राप्त सिपाही थे और उनके बाएं बाजू में सवयं नाना साहब, दाईं ओर ग्वालियर की सेना और उस सब पर तात्या टोपे सेनापति थे। अंग्रेजों के पास कुल गोरी और काली मिलाकर पांच हजार पैदल, छह सौ घुड़सवार, पैंतीस तोपें-ऐसे लगभग छह हजार लोगों की सेना सज्ज थी। चार्ल्स बॉल कहता है-'पचहत्तर हजार सेना थी और उन सब पर स्वयं कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन सेनापति था।'' ऐसी इन तत्त्वनिष्ठा को कर्तव्य का बल देनेवाला कोई कर्णधार विद्रोहियों की ओर आने की बजाय अंग्रेजी छावनी में ही निकल्सन के आने से वह लाभ मिलने पर दिल्ली में निराश की छाया पड़ने लगी। नीमच और बरेली की सेना एक-दूसरे के सिर निराशा का खपरा फोड़ने लगी और वेतन मिलने के बाद भी बदमाश सिपाही फिर-फिर निराशा का खपरा फोड़ने लगी और वेतन मिलने के बाद भी बदमाश सिपाही फिर-फिर वेतन का तगादा क रवह न मिलने पर शहर के श्रीमान लोगों पर अत्याचार करने की धौंस देने लगे। तब बख्तर खान ने बादशाह की इ च्छा से सारे नेता, सारी सेना एवं चुने हुए नागरिकों को बुलाकर प्रश्न किया-'लड़ाई चालू रखनी है या बंद करनी है?'' आकाश फट जाए, इतने जोर की गर्जना कर सबने उत्तर दिया-'लड़ाई, लड़ाई, लड़ाई!'' दिल्ली का यह अटल निश्चय देखकर फिर से सब ओर जोश दिखा और बरेली और नीमच की सेना को साथ लेकर अंग्रेजों के सीजट्रेन पर हमला करने के लिए विद्रोहियों की सेना नजफगढ़ तक पहुंची। बरेली ब्रिगेड ने जहां डेरा डाला, नीमच की सेना वहां डेरा न डालकर शत्रु पर एक साथ आक्रमण न करते हुए और बख्तर खान का आदेश न मानते हुए पास के एक गांव में जाकर उतरी। अंग्रेजों को यह समाचार मिलते ही उनका ताजादम सेनापति निकल्सन चुनी हुई एवं भरपूर सेना के साथ बहुत तेजी से नजफगढ़ की ओर चल पड़ा और बख्तर खान का आदेश न मानकर एक तरफ पड़ाव डाले हुई नीमच ब्रिगेड पर उसने अकस्मात् छापा मारा। विद्रोही असावधान, अकेले और अव्यवस्थित थे तो आक्रमणकर्ता सावधान, सनायक, व्यवस्थित-निकल्सन के सेनापतित्व में। फिर क्रांतिकारियों की दुर्दशा की सीमा शेष नहीं रही। बेश कवे लड़े बड़ी बहादुरी से, शत्रु भी स्तुति करें-इतनी शूरता से लड़े। पर वह शूरता निष्फल। बुंदेल की सराय की लड़ाई के बाद विद्रोहियों की ऐसी पराजय नहीं हुई थी। नीमच की पूरी ब्रिगेड उस दिन नष्ट हो गई। स्वयं के द्वारा जिसे अधिकार सौंप गए थे उसके आदेश का पालन न करके अहंभाव के किए गए आचरण का ऐसा फल मिला। बिना आदेश के शूरता भी वीरता के अभाव 1857 का स्वातंत्र्य समर – 276

जैसी ही निष्फल रहती है। 25 अगस्त को मिली इस विजय से अंग्रेजी छावनी में आज तक छाए निराशा के बाद बिल्कुल छंट गए। जून माह से यही सच्ची विजय उनको मिली थी। अब हर कोई दिल्ली पर हमला करने को व्याकुल हो गया। कमांडर विल्सन ने बेअर्ड स्मिथ को अंतिम आक्रमण का नक्शा तैयार करने का आदेश दिया। जिस बेअर्ड ने निराशा से भरे अंग्रेजों को दिल्ली से वापस लौटने से रोका था उसी ने वह नक्शा भी तैयार किया। पंजाब से आनेवाली सीजट्रेन आक्रमण के लिए आवश्यक अप्रतिम युद्ध सामग्री लेकर अंग्रेजी छावनी में सुरक्षित पहुंच गई। जिस शहर ने अंग्रेजों की उत्कृष्ट सेना को, सेनापतित्व को और समरपटुत्व को तीन माह तक रणांगण में परेशान किया हुआ था उस दिल्ली को धूल में मिलाकर आज तक सहे कष्ट को सफलता में बदलने का समय निश्चित ही पास आया हुआ है-ऐसा उत्साहवर्धक संदेश भी अंग्रेजी सेना के कमांडर ने लश्कर में प्रचारित किया। पंजाब की नई सहायता आने के बाद अंग्रेजों की कुल साढ़े तीन हजार यूरोपियन, पंच हजार नेटिव सिख, पंजाबी आदि सिपाही और ढाई हजार कश्मीरी सेना मिलकर कोई ग्यारह हजार लोगों के अतिरिक्त अपने सैकड़ों सिपाही लेकर स्वयं जींद रियासत का राजा दिल्ली विजय के मुहूर्त पर अंग्रेजों से आकर मिल गया था। सितंबर के पूर्वार्ध में अंग्रेजी कमांडर ने विघातक पद्धति से आक्रमण कर नई-नई बैटरियों का निर्माण प्रारंभ किया है, यह देखकर दिल्ली के विद्रोहियों में भय निर्माण हुआ और चारदीवारी के बाहर अंग्रेज मानो एक व्यक्ति हो, ऐसे अनुशासनबद्ध होकर बढ़ते जाते थे। जबकि चारदीवारी के अंदर अवज्ञा और अनुशासनहीन व्यवहार वृद्धि पा रहा था। अंग्रेजों की ओर जो नेटिव थे वे तोपों की मार में बैटरी निर्माण के कार्य में इतनी दृढ़ता से लगे रहते कि फॉरेस्ट लिखता है-“नेटिव लोगों में कूट-कूटकर समाए निश्चलता के शौर्य का उन्होंने कमाल दिखाया। एक के बाद एक आदमी मरता जा रहा था-मृतक के लिए एक क्षण वे ठहरते, एक-दो आंसू बहाते, शवों की पंक्ति में वह शव रखते और फिर से उस मृत्यु स्थान पर काम करने लगते।" अंग्रेजों के अधीन नेटिव ऐसा अचल अनुशासन बरतते और दिल्ली शहर के नेटिव एक-दूसरे का काम ढकेल रहे थे। इस भिन्नता से बहुत सीखना आवश्यक है। अधिकारियों का उचित सम्मान और आदेश के शब्दों के प्रति आदर, यह अनुशासन का मुख्य बीज है। पर दिल्ली में इस बीज को सब जगह पैरों के नीचे कुचला जा रहा था। अधिकतर दोष असमर्थ अधिकारियों को और शेष स्वच्छंद आचरण करते अनुयायियों को; और अब उनमें निराशा, निरुत्साह का जोर! दिल्ली के बाहर बढ़ता जा रहा दबाव और दिल्ली के अंदर अस्त होता जा रहा यह उत्साह-इन दोनों का ही अंत करने के लिए सितंबर की 14 तारीख उदय हुई। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 277

अंग्रेजी सेना के चार विभाग कर उसमें से पहले तीन विभाग निकल्सन के अधीन कश्मीरी दरवाजे से घुसने के लिए भेजे गए और काबुल दरवाजे से घुसने के लिए चौथा भाग मेजर रीड के अधीन अंग्रेजों की दाईं ओर खड़ा हो गया। इन दो स्थानों पर चारदीवारी में छेद करने का काम प्रारंभ हुआ। सूर्योदय होते ही अंग्रेजों की दीवार फोड़नेवाली तोपें एकदम बंद हो गई। अंग्रेजों के शिविर में एक क्षण भर अंतिम समय की निःशब्दता! और तुरंत ही निकल्सन के साथ वह शिविर किसी जीवित दीवार की तरह एकाएक आगे दौड़ चला। उसके पहले नंबर के कॉलम ने कश्मीर बेस्टन के पास दीवार में जो छेद बनाया था उधर हमला किया। इसमें से गोलियों की बौछार शुरू हो गई। खंदक में अंग्रेजों के शव धड़ाधड़ गिरते हुए कुछ दीवार से आ लगे। दीवार को सीढ़ी लगी। सीढ़ी पर चढ़ा कि गिरा-ऐसी प्रचंड मार में अंग्रेजी सेना फिर-फिर दीवार पर चढ़ने लगी। अंग्रेजी सेना दीवार के छेद से अंदर घुसी। दीवार का वह हिससा जीत लिया गया-विजय का घंटा बजा। इस कश्मीर बेस्टन जैसे ही वॉटर बेस्टन के छेद से भी भयानक मारकाट करते, मरते-मरते एवं मारते-मारते अंग्रेजों के दूसरे नंबर के कॉलम ने वह छेद जीत दीवार के अंदर प्रवेश किया। तीसरे नंबर का कॉलम कश्मीरी दरवाजे की ओर जा रहा था। लेफ्टिनेंट होम और सालकेल्ड के वह दरवाजा बारूद लगाकर उड़ा देने के लिए उस दरवाजे के सामने आते ही दीवार के सामने खंदक पर बना पुल गिराया हुआ था। केवल एक बल्ली बची हुई दिख रही है। ठीक है, उसी पर से चलो। सार्जेंट मरा। वह महादूत भी गिरा पर आगे बढ़ो, होम आगे चला। होम ने आगे जाकर हाथ का बारूद अंत मं दरवाजे में रख ही दिया। तो फिर आग लगानेवाली दूसरी टोली बल्ली पर से घुसने लगी। लेफ्टिनेंट सालकेल्ड गोली लगकर गिर पड़ा, कारपोरल तू आगे घुस-तुझे भी गोली लगी? पर कुछ परवाह नहीं। मरते-मरते शूरों ने चिंगारी तो डाल ही दी। धड़ाड़, धड़ाड़, धड़ाड़? कश्मीरी दरवाजा खुलने की राह देखते अंग्रेजी सेनापति को उस भयानक युद्ध की मारा-मारी के घन गर्जन में वह आवाज साफ सुनाई नहीं पड़ा। परंतु वे आगे बढ़े? पर क्यों न बढ़े? यद्यपि विजय का घंटा मुझे सुनाई नहीं दी। फिर वह आगे बढ़े अंग्रेजी वीर! वे असफल हुए होंगे, यह असंभव! अब बहुत समय हो गया है, अतः हम आगे तो बढ़ ही लें। ऐसे प्रबल आत्मविश्वास से कैंपबेल ने हमले के आदेश दिए। खंदक तक वे पहुंचे। उन्होंने खंदक में पड़े अपने विजयी मरणोन्मुखों को देखा और मारते-दौड़ते वे कश्मीरी दरवाजे के टूटे हिस्से से दिल्ली में कूद पड़े। वहीं उन्हें अपने-अपने काम सफलता से पूरे कर दिल्ली में घुसे हुए वे पहले दो कॉलम भी मिले। निकल्सन के अधीनस्थ ये तीनों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 278

भाग युद्धभूमि के अपने-अपने काम रंगभूमि के पात्रों जैसी व्यवस्था से करके सेना का चौथा कॉलम कहां है-यह एक-दूसरे से पूछने लगे। अंग्रेजी सेना का चौथा भाग मेजर रीड के नेतृत्व में काबुल दरवाजे से हल्ला करने के लिए अंग्रेजों के दाएं बाजू से निकला था। सब्जी मंडी तक वह चलकर आया तो उन्हें रोकने, दिल्ली से बाहर निकले सिपाहियों से उनकी मुठभेड़ हुई। पहले हमले में ही मेजर रीड के नीचे गिर जाने से अंग्रेजी सेना में किंचित दबाव के कारण आदेश के लिए भ्रम उत्पन्न हुआ और विद्रोहियों का उत्साह चढ़ा और अंग्रेज भागता है क्या, ऐसा रंग दिखने लगा। पर होप ग्रांट अचूक रीति से अपने घुड़सवारों के साथ वहां दौड़ता आ पहुंचा और फिर से अंग्रेजी पक्ष का अटल रण शुरू हो गया। अंग्रेजों ने तोपों से जोरदार मार चालू की तब भी किशनगंज के बाग से, घर-घर से विद्रोहियों की गोलियां सूं-सूं करते रक्त की वर्षा कर रही थी। अंग्रेजी घोड़ों को आगे बढ़ाना कठिन हो गया। तोपें विद्रोही छीन लेंगे इस डर से पीछे जाना भी संभव न रहा। वे अंग्रेज घुड़सवार वहीं खड़े-खड़े मरने के लिए जम गए। एक आदमी भी नीचे गिरने के अतिरिक्त मृत्यु से डरकर इधर-उधर नहीं हिला। अंग्रेजों की ओर से नेटिव कमांडर घुड़सवारों की इस अपूर्व शूरता और आज्ञापालन के इस अपूर्व मेल के लिए उसका कमांडर होव ग्रांट कहता है-“नेटिव घुड़सवार अटल रहे। उनकी सिपाहियों पर आश्चर्य है! मैं उन्हें प्रोत्साहित करने लगा तो वे बोले, 'चिंता नहीं, इस स्थान पर हम आप जितनी देर कहें उतनी देर तक खड़े रहेंगे।'" अंग्रेजों की ओर से लड़ते नेटिव की शूरता को मात करनेवाला शौर्य स्वतंत्रता के पक्ष में सम्मिलित नेटिव ने प्रकट किया था। जिद से भरे वे विद्रोही इंच-इंच भूमि को लड़ते-लड़ते अब ईदगाह पर तेज मारामारी करने लगे। फिर गुस्से से भरकर हमले-पर-हमला। ईदगाह पर कब्जा करना चाह रही अंग्रेजी सेना डगमगाने लगी- फिर चढ़ाई करो; अंग्रेजी सेना हटी-फिर करो हमला-ईदगाह से मार खाते-खाते अंग्रेजी फौज ऊपर वर्णित बहादुर घुड़सवारों और अंग्रेजी तोपों के आश्रय में आ गई-फिर भी हमला करो। अब यहीं तक रहने दो। यह स्थान छोड़कर यह अंग्रेजी सेना लौटने लगी है। शाबाश विद्रोहियों! भी लड़ाई की। यदि तुममे से सबने ऐसा ही किया होता तो! इस चौथे भाग का जब ऐसा मनोभंग हो रहा था तब अंग्रेजों के शहर में घुसे तीन भाम कश्मीरी दरवाजे के पास थोड़ी देर ठहर फिर शहर पर कब्जा करने कूद चले। कैंपवेल, जोन्स और योद्धा निकल्सन ये तीन प्रमुख सेनापति अपनी निडर सेना को-‘चलो मर्दों, चलो' इस युद्ध गीत से आह्वान करते हुए काबुल दरवाजे की ओर लड़ते हुए निकले। जो भी तोप के रास्ते में मिले उसे कब्जाते, जो भी टेकरी दिखे उसपर अंग्रेजी झंडा फहराते और मार-काट करते-करते ब्रिटिश सेना बर्नबेस्टन स्थान तक आ पहुंची। परंतु यहां से अब खाली तोपें, बेजान टेकरियों और शूरशून्य रणक्षेत्र के स्थान पर 'दीन बोलो। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 279

दीन' की भयानक चिंघाड़ सुनाई दी और विद्रोहियों के गोलों का हमला हुआ। भयंकर रक्तपात होने लगा, मृत्यु का नाच शुरू हो गया, विजय से उन्मत्त अंग्रेजी सेना हतोत्साहित होकर पीछे हटी। सामने से यह पीछे हटना देखकर वह हठी वीर निकल्सन बाघ-सा-झपटा। शूरवीरों को जग में कुछ भी असाध्य नहीं, यह जिसका संकल्प था, वह निल्सन बर्नबेस्टन पर हुए अपमान से चिढ़कर फिर उस गली में घुसने लगा तो वहां फिर घमासान मच गया। इस दौ सौ गज लंबी गली में उस दिन जो मारकाट हुई वह पानीपत जैसे रण का एक संक्षिप्त संस्करण ही थी। जों अंग्रेज आगे पैर बढ़ाता उसे स्वतंत्रतार्थी जेहादी समर में गिरा ही देंगे, यह बात पक्की धकेलने लगी। शूर मेजर जैकब को भी उसने दांतों के नीचे रख चबा डाला। वीर निकल्सन, अब तुम ही आगे बढ़ो। तुझे छोड़कर अंग्रेजी सेना के सारे सेनापति इस गली ने नष्ट किए हैं। आया, हे स्वातंत्र्याभिमानी गली, वीरता की गुफा, आ गया स्वयं निकल्सन तुझपर दौड़ा। अब वास्तविक परीक्षा है। निकल्सन उस गली पर और गली निकल्सन पर। भयंकर युद्ध हुआ। तभी अंग्रेजी सेना में बिजली गिरने जैसा हाहाकार मच उठा। हटो, हटो! अंग्रेज सेना कहने लगी और छांटो-काटो-यह यह कोलाहल उस गली में उठा। जिसके नख निकल्सन के रक्त से भर गए थे वह भयंकर गली। जिसकी लंबाई के हर इंच पर किसी-न-किसी अंग्रेज की कब्र होगी। उस वीर्यवान गली से दूसरी बार भाग चली उस अंग्रेजी सेना का भाग किसी अंग्रेजी शासन में कभी उदय नहीं हुआ था। उनके चार भागों में से तीन भागों के प्रमुख कमांडर घायल हुए। छियासठ मृत्यु संख्या से क्या प्राप्त किया, यह देखने पर जनरल विल्सन को ज्ञात हुआ-दिल्ली के परकोटे का एक-चौथाई भाग हाथ में है। भय, चिंता और निराशा से पागल हुआ वह अंग्रेज कमांडर बोला, "दिल्ली छोड़कर तत्काल पीछे हट जाना चाहिए। सारा शहर अभी अविवाहित ही बना हुआ है। मेरे अधीनस्थ शूर लोगों की एक गली ने रक्षा की और जो मुट्ठी भर लोग अभी भी जीवित हैं उन्हें हजारों विद्रोही हर घर से आगे आने को बड़ी शान से बुला रहे हैं। ऐसी स्थिति में सारे-के-सारे लोग मर जाएं या पीछे लौटने का अपयश स्वीकार करें। " अंग्रेजों का मुख्य कमांडर 1857 का स्वातंत्र्य समर -280

जनरल विल्सन बोला, "इसलिए अब पीछे लौटना चाहिए।" पीछे लौटना चाहिए।" पीछे लौटना चाहिए? मृत्यु की ओर बढ़ते निकल्सन को अस्पताल में यह समाचार मिलते ह ीवह वीर बोला, "पीछे लौटना! उस पीछे हटनेवाले विल्सन को गोली मारने की शक्ति ईश्वर कृपा से मुझमें अभी भी शेष है।" इस मरते वीर की तरह ही सारे जीवित अंग्रेजों ने भी यही कहा और 14 सितंबर की रात कब्जा किए भाग को संभाले अंग्रेजी सेना अटल बनी रही। जनरल विल्सन के पीछे लौटने के विचार को अंग्रेज योद्धाओं ने जितना अस्वीकार कर दिया उससे भी अधिक विद्रोहियों के शिविर में चल रही हलचल ने विल्सन के भय की व्यर्थता प्रकट करना चालू कर दी। दिल्ली में अधिक देर न लड़ते हुए हम बाहर के प्रदेशों में युद्ध करेन निकल पड़ें, यह एक पक्ष का विचार बना और दूसरे पक्ष का दृढ़ विचार था कि मृत्यु-पर्यंत दिल्ली समर्पण न करें। अंग्रेजों में कितने ही मतांतर हों, तब भी बहुमत का सम्मान कर अंत में भिन्नता को एक वाक्य कर लेने का अमूल्य सद्गुण भी था इधर क्रांतिकारी सिपाहियों की अंधरे नगरी में उसका अभाव होने से उपर्युक्त दोनों पक्ष एक दिशा में न जाकर अलग-अलग रास्तों पर निकल पड़े। कुछ सिपाही दिल्ली छोड़कर बाहर निकले। कुछ अंत तक दिल्ली की भूमि से एक भी पैर पीछे न हटने का निश्चय कर रणांगण में अचल बने रहे। 15 सितंबर से 24 सितंबर तक दिल्ली में इसी पक्ष ने युद्ध किया और वह भी इतने निश्चय, शौर्य और दृढ़ता से कि मस्जिद और राजमहल में जब अंग्रेजी सेना घुस रही थी तब उस सारी सेना के सामने एक-एक रखवाला ही बंदूक हाथ में लिये खड़ा मिला। अंग्रेज पास आते ह ीवह धैर्य से बंदूक तानता, बिल्कुल निशाने पर आते ही शत्रु पर गोली चलाता और स्वदेश के लिए यह जीवित अवस्था की अंतिम सेवा कर मृत्यु क सेवा में हाजिर हो जाता। अंग्रेजी इतिहासकार लिखते हैं-"जिस समय महल मं अंग्रेज सेना घुसने लगी उस समय वहां कुछ जेहादी लोग खड़े हुए दिखाई दिए। वे पंक्ति में भी नहीं थे, क्योंकि पंक्ति बनाते, इतनी उनकी संख्या ही नहीं थी। तथापि जिस शत्रु से आज तीन माह तक बड़ी दृढ़ता से उन्होंने संघर्ष किया उन फिरंगियों से उनकी शत्रुता जीवन के अंतिम क्षण तक भी ढीली नहीं पड़ी थी, यह सिद्ध करने के लिए वे सिपाही शत्रुता जीवन के अंतिम क्षण तक भी ढीली नहीं पड़ी थी, यह सिद्ध करने के लिए वे सिपाही विजय की रत्ती भर परवाह किए बिना अद्भूत कर्मी लोग हमें चिढ़ाते अचल खड़े रहे थे।" अंग्रेजों के हाथ में दिल्ली का तीन-चौथाई भाग चला जाने के बाद कमांडर-इन-चीफ बख्तार खान दिल्ली के बादशाह से मिले और बोले, "दिल्ली तो अपने हाथ से चली गई है, परंतु इससे विजय की सारी संभावना अपने हाथ से निकल गई, ऐसा नहीं है। बंद स्थान से लड़ाई लड़ने की अपेक्षा खुले प्रदेश से शत्रु को परेशान करने का दांव अभी भी निश्चित विजयी होने वाला है। अपनी सेना के उन लोगों को लेकर, जो स्वतंत्रता युद्ध में मरते दम तक तलवार उठाए रखने को तैयार हैं, ऐसे योद्धाओं को चुनकर मैं उनके साथ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 281

दिल्ली में लड़ाई करता हुआ दूसरी जगह निकल जा रहा हूं। शत्रु की शरण जाने की अपेक्षा लड़ाई करते हुए बाहर निकल जाना ही हमें इष्ट लगता है। ऐसे समय आप भी हमारे साथ चलें और अपने झंडे के नीचे हम स्वराज्य के लिए ऐसे ही लड़ते रहें।'8 बाबर, हुमायू या अकबर के तेज का शतांश भी यदि इस वृद्ध मुगल में होता तो उसने यह वीरतापूर्ण निमंत्रण मानकर उस साहसी बख्तर खान के साथ दिल्ली से कूच किया होता। पर बुढ़ापे से बलहीन, राजविलास से मतिमंद और पराजय से भयभीत हुए उस बादशाह ने अंतिम समय तक अपनी अनिश्चितता और चंचलता बनाए रखी। अंतिम दिन वह हुमायूं की कब्र में छिपकर बैठा और बख्तर खान का निमंत्रण अस्वीकार कर इलाही बख्श मिर्जा के उपदेश के अनुसार अंग्रेजों की शरण जाने लगा। इलाही बख्श असल दगाबाज था। उसने यह समाचार अंग्रेजों को दिया अंग्रेजों ने तत्काल कैप्टन हडसन को उधर भेजा। जीवनदान का वचन लेकर बादशाह ने समर्पण किया। उसे महल तक लाकर कैद में डाल दिया गया। फिर दगाबाज कुत्ते इलाही बख्श और मुंशी रजब अली दौड़े आए और बोले, "अभी शहजादे हुमायूं के मकबरे में ही छिपे बैठे हैं।“ फिर हडसन दौड़ा गया। शहजादों ने समर्पण किया और उन्हें वह गाड़ी में बैठाकर दिल्ली की ओर ले चला। शहर में पैर रखते ही हडसन शहजादों की गाड़ी के पास दौड़कर पहुंचा और चिल्लाकर बोला, "अंग्रेजों की महिलाओं, बच्चों का वध करनेवालों को मृत्युदंड ही दिया जाना चाहिए।" कांपते हुए वे गाड़ी से नीचे खींचे गए, उनके शरीर के सारे वस्त्र उतार लिये गए और हडसन ने उन शरणागत शहजादों की ओर से अपना मुंह फेरा और तीन गोलियों से उसने उन तीनों शहजादों का मार डाला। तैमूर के वंशवृक्ष की वे अंतिम पत्तियां हडसन ने तोड़ डाली। परंतु उसकी क्रूरता का समाधान इन शरणागत शहजादों को केवल गोलियों से भूनकर नहीं हुआ। मृत्यु तक तो जंगली आदमी भी बदला लेते है। फिर सभ्य आदमी में और उनमें अंतर ही क्या रहा! इसलिए उन शहजादों के शवों को उठाकर दिल्ली की कोतवाली की ओर फेंका गया। गिद्धों को तैमूर के वंशजों की बढ़िया दावत देने के बाद उन सड़े शवों को खींचकर नदी में फेंक दिया गया। अकबर के वंशजों को दफनाने के लिए कोई भी न रहा! हे कालचक्र! तेरे कैसे-कैसे खेल हैं? अब सिखों को सचमुच लगने लगा कि उनके ग्रंथ में लिखा भविष्य सच हुआ। पर वह किस अर्थ में? किस तरह क्या फलित देकर? फिर दिल्ली में भयानक कत्ल और लूट चालू हुई। उसका वर्णन सुनकर लॉर्ड एलफिंस्टन जॉन लॉरेंस को लिखता है-"दिल्ली का घेरा समाप्त हो जाने पर अपनी सेना ने दिल्ली का जो हाल किया वह हृदयद्रावक है। शत्रु और मित्र का भेद न करते हुए सरेआम बदला लिया जा रहा है। लूट में तो हमने नादिरशाह को भी मात दे दी।"126 यूरोपियन और नेटिव सिपाहियों सहित दिल्ली के घेरे में लगी अंग्रेजों की सेना

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126 'लाइफ ऑफ लॉरेंस', खंड 2, पृष्ठ 262 ।

दस हजार तक हो गई थी और उसमें से मृत्यु-मुख में पड़े और घायल पड़े कोई चार हजार लोग इस युद्ध में काम आए। क्रिमियन वार जैसे प्रचंड युद्ध में भी जनहानि का इतना विशाल अनुपात नहीं दिखता। 127 विद्रोहियों की ओर जो जनहानि हुई होगी उसका विश्वसनीय आंकड़ा निकालना-अंग्रेजी ग्रंथों से-असंभव है। फिर भी कम-से-कम पांच से छह हजार तक उनकी जनहानि हुई ही होगी। इस तरह यह इतिहास-प्रसिद्ध नगर स्वदेश, स्वतंत्रता और स्वधर्म-रक्षा की दिव्य चेतना से संचालित होकर कोई एक सौ चौंतीस दिनों तक अंग्रेजों जैसे सबल शत्रु की समर कुशलता को धिक्कारता हुआ रात-दिन संघर्षरत रहा। कुल मिलाकर यह अटल संघर्ष तत्त्वनिष्ठा को शोभा देनेवाला था । अपनी दीवार पर गढ़ा फिरंगी निशान फेंककर अपने निशान की घोषणा जिस दिन की गई, गुलामी का मायाजाल फाड़कर स्वतंत्रता प्राप्ति के साहसी अभियान पर जिस दिन दिल्ली बढ़ी, सारे हिंदुस्थान के नाम से स्वधर्म प्रतिष्ठा के साहसी अभियान ध्वज गाड़कर उस विस्तीर्ण देश की एकता की संवेदना का दिल्ली ने जिस दिन प्रथमोच्चार किया, उस दिन से बहादुरशाह के राजमहल में अंग्रेजी तलवार ने, अंतिम स्वदेशी रक्त बिंदु गिरने तक इस शहर ने स्वदेश स्वतंत्रता के जेहाद को अलंकृत करे-ऐसे वीरता-प्रचुर, स्वार्थ-निवृत्तिमय और उदारचरित्र कृत्य कुछ कम नहीं किए। नेता न होते, संगठन न होते, अंग्रेजों जैसा करते हुए शत्रु का सामना करते और विशेषकर असल फिरंगी तलवारों की तुलना में अपने ही कम-असल देशजों की तलवारें अपने प्राण लेने के लिए दिल्ली पर टूट पड़तीं-पहली बाधा से अनाथता, दूसरी से बिखराव, तीसरी से असह्यता और चौथी से उत्पन्न होती उद्विग्नता-इन सारे संकटों की परवाह न करते हुए रणभूमि पर देशवीरों और धर्मवीरों की भांति अचल, मृत्यु का वरण करते हुए सत्कृत्य दोनों ही भावी पीढ़ी के अभिमान के ही पात्र होंगे। इसलिए लज्जास्पद नहीं, उन दोषों और सत्कृत्यों की पंक्ति के एक अद्भुत तत्त्वनिष्ठा का तेज, स्वधर्माभिमान का तेज, स्वदेश स्वतंत्रता का तेज, झिलमिलाता होने से वे दोनों ही कृत्य नैतिक उदाहरण के मूर्त व्याख्यान हैं। हे दिल्ली नगरी! तू गिरी, उसमें कोई लज्जा नहीं। क्योंकि तू स्वराज्य के लिए, स्वधर्म के लिए, स्वदेश के लिए लड़ी थी! अतः 'दन्तछेदो हि नगानां श्लाघ्यो गिरिविदारणे!' पर्वत से जूझते हुए चूर्ण हुआ दांत ही गजश्रेष्ठ के लिए होता है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 283 127 1. लाइफ ऑफ लॉरेंस', खंड 2 की फॉरेस्ट द्वारा लिखित प्रस्तावना। 2. रॉटन जैसा ग्रंथकार भी कहता है- "विद्रोहियों के हताहतों की संख्या सदैव ही अगणित बताई जाती थी।" -पृष्ठ 195

प्रकरण-5 लखनऊ अव्यस्थित राज्य पद्धति से प्रजा का संरक्षण करने के लिए अवध के घरों में कोने कोने तक घुसी बैठी अंग्रेजी सत्ता को जून माह में क्रांतिकारियों ने मार-पीटकर अवध की एक छोटी सी रेसीडेंसी में धकेलकर बंद कर दिया था। वहां उसको सर हेनरी लॉरेंस ने धीरज देना प्रारंभ किया। चिनहट की लड़ाई में हारकर जब सर हेनरी ने रेसीडेंसी में कदम रखा और वहां अवध पर अधिराज्य पाने के प्रश्न पर फिर से विचार करना प्रारंभ किया तब उसके साथ उस रेसीडेंसी में कोई एक हजार यूरोपियन और आठ सौ नेटिव लोग थे। इन लश्करी लोगों के साथ ही जो अन्य गोरे और काले ईसाई भी आए थे उनकी कुल संख्या 3,000 तक थी। चिनहट की पराजय के बाद यह सेना जब पहली बार रेसीडेंसी में बंद हुई तब उस तेजी से और अकस्मात् आए हुए संकट में रेसीडेंसी का स्थान, दीवारें, कोट-ये सब बहुत कमजोर स्थिति में थे। अंग्रेजों की इस असहायता का तभी लाभ उठाकर उनपर जोर का हमला कर उस रेसीडेंसी को जीत लेने का अच्छा अवसर विद्रोहियों के लिए आया था। पर इस अवसर में बंद हो जाने के बाद कोई दो हफ्ते अपने चारों ओर कोट आदि का संरक्षण की दृष्टि से उत्तम प्रबंध करने में अंग्रेज व्यस्त रहे। विद्रोहियों की सेना को चिनहट में जिस दिन विजय मिली उसी दिन अवध में 1857 का स्वातंत्र्य समर – 284