१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 270, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंकि “अंग्रेजों की बेड़ियों के टुकड़े देखना और किसी भी तरह हिंदुस्थान स्वतंत्र हो, यह मेरी तीव्र इच्छा है। परंतु इस आपात स्थिति में जो सारे देश को नेतृत्व देने में समर्थ हो, राष्ट्रीय शक्ति को जो संगठित कर सके और जिसमें सारा राष्ट्र एकमत हो सके, ऐसा कोई एक धुरंधर कर्णधार सामने आए बिना यह राज्य क्रांति सफल होनेवाली नहीं। हिंदुस्थान को अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र कर उस पर मेरा ही अधिराज्य स्थापित हो, यह मेरी व्यक्ति विषयक महत्त्वाकांक्षा शेष नहीं है। स्वदेश की स्वतंत्रता के कार्य में तलवार से सज्जित होकर अंग्रेजों को सीमा पार करने के लिए आप सब राजा तैयार हों तो हिंदुस्थान के राजमंडल द्वारा स्थापित किसी भी राजमंडल का आधिपत्य स्वीकार कर अपने साम्राज्य अधिपति के अधिकार मैं स्वयं उसके हाथ में देने को खुशी से तैयार हूं''125 यह पत्र मुसलमान धर्म का समर्थक दिल्ली का बादशाह हिंदुस्थान के हिंदू धर्मीय राजाओं को भेज रहा है। सन् 1857 के साल में स्वतंत्रता, स्वराज्य, स्वदेश और स्वधर्म आदि उदात्त शब्दों का कितना यथार्थ बोध हिंदुस्थान के लोगों को हुआ था, यह उपर्युक्त अद्भुत पत्र से स्पष्ट होता है। हिंदू और मुसलमानों की धर्म-भिन्नता स्वदेश की एकता में इतनी विलीन हुई देखकर चार्ल्स बॉल कहता है-‘’ऐसा अनपेक्षित, आश्चर्यकारी और विलक्षण परिवर्तन विश्व इतिहास में कदाचित् ही मिलेगा।‘’ परंतु यह विलक्षण परिवर्तन हिंदुस्थान देश के एक सीमित प्रदेश में ही पूरी तरह घटित होने से उसका तात्कालिक परिणाम सफल नहीं हो सका। दिल्ली की दीवार के सामने गुलामी और देश-स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू थी, यह एक अर्थ में और प्रमुखता से बलाबल की वास्तविक लड़ाई शुरू ही नहीं हुई थी, ऐसा दिखेगा। ‘दिल्ली का घेरा’ नाम की प्रसिद्ध पुस्तक का लेखक कहता है-“हमारे शिविर में एक यूरोपियन के पीछे दस नेटिव थे । जितने यूरोपियन तोपखाने पर होते उससे चौगुने नेटिव लोग और घोड़े के पीछे दो नेटिव घुड़सवार थे। नेटिवों की भरती के सिवाय एक कदम भी आगे रखना संभव नहीं।‘’ देश के एक भाग की चेतना देश के दूसरे भाग की अचेतनता ने मार गिराई। ऐसी स्थिति विद्रोहियों ने अगस्त समाप्त होने तक भी अंग्रेजों को अपने पर मार करने का अवसर न देते हुए अभी तक अघातक पद्धति का अवलंबन की कोई सामान्य पहचान नहीं थी। तोपखाने ने सारी अंग्रेजी सेना पर ऐसी मार करनी चालू की कि सर कोलिन को स्थान छोड़कर सेना की भी बहुत सी हलचल और अंग्रेजी तोपों से बहुत देर गोलाबारी बंद रखनी पड़ी। क्रांतिकारियों का इस साहस से किया हुआ रण-आह्वान आज तक चुपचाप सुनने का सर कोलिन को जो अवसर आया वह इस 5वीं तारीख के बाद 1857 का स्वातंत्र्य समर – 275 125 मेटकॉफ कृत-‘टू नेटिव नैरेटिव्स’, पृष्ठ 226 ।