१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
कि “अंग्रेजों की बेड़ियों के टुकड़े देखना और किसी भी तरह हिंदुस्थान स्वतंत्र हो, यह मेरी तीव्र इच्छा है। परंतु इस आपात स्थिति में जो सारे देश को नेतृत्व देने में समर्थ हो, राष्ट्रीय शक्ति को जो संगठित कर सके और जिसमें सारा राष्ट्र एकमत हो सके, ऐसा कोई एक धुरंधर कर्णधार सामने आए बिना यह राज्य क्रांति सफल होनेवाली नहीं। हिंदुस्थान को अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र कर उस पर मेरा ही अधिराज्य स्थापित हो, यह मेरी व्यक्ति विषयक महत्त्वाकांक्षा शेष नहीं है। स्वदेश की स्वतंत्रता के कार्य में तलवार से सज्जित होकर अंग्रेजों को सीमा पार करने के लिए आप सब राजा तैयार हों तो हिंदुस्थान के राजमंडल द्वारा स्थापित किसी भी राजमंडल का आधिपत्य स्वीकार कर अपने साम्राज्य अधिपति के अधिकार मैं स्वयं उसके हाथ में देने को खुशी से तैयार हूं''125 यह पत्र मुसलमान धर्म का समर्थक दिल्ली का बादशाह हिंदुस्थान के हिंदू धर्मीय राजाओं को भेज रहा है। सन् 1857 के साल में स्वतंत्रता, स्वराज्य, स्वदेश और स्वधर्म आदि उदात्त शब्दों का कितना यथार्थ बोध हिंदुस्थान के लोगों को हुआ था, यह उपर्युक्त अद्भुत पत्र से स्पष्ट होता है। हिंदू और मुसलमानों की धर्म-भिन्नता स्वदेश की एकता में इतनी विलीन हुई देखकर चार्ल्स बॉल कहता है-‘’ऐसा अनपेक्षित, आश्चर्यकारी और विलक्षण परिवर्तन विश्व इतिहास में कदाचित् ही मिलेगा।‘’ परंतु यह विलक्षण परिवर्तन हिंदुस्थान देश के एक सीमित प्रदेश में ही पूरी तरह घटित होने से उसका तात्कालिक परिणाम सफल नहीं हो सका। दिल्ली की दीवार के सामने गुलामी और देश-स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू थी, यह एक अर्थ में और प्रमुखता से बलाबल की वास्तविक लड़ाई शुरू ही नहीं हुई थी, ऐसा दिखेगा। ‘दिल्ली का घेरा’ नाम की प्रसिद्ध पुस्तक का लेखक कहता है-“हमारे शिविर में एक यूरोपियन के पीछे दस नेटिव थे । जितने यूरोपियन तोपखाने पर होते उससे चौगुने नेटिव लोग और घोड़े के पीछे दो नेटिव घुड़सवार थे। नेटिवों की भरती के सिवाय एक कदम भी आगे रखना संभव नहीं।‘’ देश के एक भाग की चेतना देश के दूसरे भाग की अचेतनता ने मार गिराई। ऐसी स्थिति विद्रोहियों ने अगस्त समाप्त होने तक भी अंग्रेजों को अपने पर मार करने का अवसर न देते हुए अभी तक अघातक पद्धति का अवलंबन की कोई सामान्य पहचान नहीं थी। तोपखाने ने सारी अंग्रेजी सेना पर ऐसी मार करनी चालू की कि सर कोलिन को स्थान छोड़कर सेना की भी बहुत सी हलचल और अंग्रेजी तोपों से बहुत देर गोलाबारी बंद रखनी पड़ी। क्रांतिकारियों का इस साहस से किया हुआ रण-आह्वान आज तक चुपचाप सुनने का सर कोलिन को जो अवसर आया वह इस 5वीं तारीख के बाद 1857 का स्वातंत्र्य समर – 275 125 मेटकॉफ कृत-‘टू नेटिव नैरेटिव्स’, पृष्ठ 226 ।
ओनेवाला नहीं था; क्योंकि अब उसने अपनी सेना की उत्तम एकबद्धता कर मार्ग की सारी बाधाएं दूर कर ली थीं और इसलिए दिनोंदिन अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ के तंबू पर प्रत्यक्ष गोलाबारी का गुल्ली-डंडा खेलते बैठे दृढ़, साहसी और उद्दाम विद्रोहियों से 6 तारीख को स्वयं आगे बढ़कर युद्ध करने का निश्चय उसने किया। इस समय विद्रोहियों की ओर कोई आठ-दस हजार सैनिक शिक्षा प्राप्त सिपाही थे और उनके बाएं बाजू में सवयं नाना साहब, दाईं ओर ग्वालियर की सेना और उस सब पर तात्या टोपे सेनापति थे। अंग्रेजों के पास कुल गोरी और काली मिलाकर पांच हजार पैदल, छह सौ घुड़सवार, पैंतीस तोपें-ऐसे लगभग छह हजार लोगों की सेना सज्ज थी। चार्ल्स बॉल कहता है-'पचहत्तर हजार सेना थी और उन सब पर स्वयं कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन सेनापति था।'' ऐसी इन तत्त्वनिष्ठा को कर्तव्य का बल देनेवाला कोई कर्णधार विद्रोहियों की ओर आने की बजाय अंग्रेजी छावनी में ही निकल्सन के आने से वह लाभ मिलने पर दिल्ली में निराश की छाया पड़ने लगी। नीमच और बरेली की सेना एक-दूसरे के सिर निराशा का खपरा फोड़ने लगी और वेतन मिलने के बाद भी बदमाश सिपाही फिर-फिर निराशा का खपरा फोड़ने लगी और वेतन मिलने के बाद भी बदमाश सिपाही फिर-फिर वेतन का तगादा क रवह न मिलने पर शहर के श्रीमान लोगों पर अत्याचार करने की धौंस देने लगे। तब बख्तर खान ने बादशाह की इ च्छा से सारे नेता, सारी सेना एवं चुने हुए नागरिकों को बुलाकर प्रश्न किया-'लड़ाई चालू रखनी है या बंद करनी है?'' आकाश फट जाए, इतने जोर की गर्जना कर सबने उत्तर दिया-'लड़ाई, लड़ाई, लड़ाई!'' दिल्ली का यह अटल निश्चय देखकर फिर से सब ओर जोश दिखा और बरेली और नीमच की सेना को साथ लेकर अंग्रेजों के सीजट्रेन पर हमला करने के लिए विद्रोहियों की सेना नजफगढ़ तक पहुंची। बरेली ब्रिगेड ने जहां डेरा डाला, नीमच की सेना वहां डेरा न डालकर शत्रु पर एक साथ आक्रमण न करते हुए और बख्तर खान का आदेश न मानते हुए पास के एक गांव में जाकर उतरी। अंग्रेजों को यह समाचार मिलते ही उनका ताजादम सेनापति निकल्सन चुनी हुई एवं भरपूर सेना के साथ बहुत तेजी से नजफगढ़ की ओर चल पड़ा और बख्तर खान का आदेश न मानकर एक तरफ पड़ाव डाले हुई नीमच ब्रिगेड पर उसने अकस्मात् छापा मारा। विद्रोही असावधान, अकेले और अव्यवस्थित थे तो आक्रमणकर्ता सावधान, सनायक, व्यवस्थित-निकल्सन के सेनापतित्व में। फिर क्रांतिकारियों की दुर्दशा की सीमा शेष नहीं रही। बेश कवे लड़े बड़ी बहादुरी से, शत्रु भी स्तुति करें-इतनी शूरता से लड़े। पर वह शूरता निष्फल। बुंदेल की सराय की लड़ाई के बाद विद्रोहियों की ऐसी पराजय नहीं हुई थी। नीमच की पूरी ब्रिगेड उस दिन नष्ट हो गई। स्वयं के द्वारा जिसे अधिकार सौंप गए थे उसके आदेश का पालन न करके अहंभाव के किए गए आचरण का ऐसा फल मिला। बिना आदेश के शूरता भी वीरता के अभाव 1857 का स्वातंत्र्य समर – 276
जैसी ही निष्फल रहती है। 25 अगस्त को मिली इस विजय से अंग्रेजी छावनी में आज तक छाए निराशा के बाद बिल्कुल छंट गए। जून माह से यही सच्ची विजय उनको मिली थी। अब हर कोई दिल्ली पर हमला करने को व्याकुल हो गया। कमांडर विल्सन ने बेअर्ड स्मिथ को अंतिम आक्रमण का नक्शा तैयार करने का आदेश दिया। जिस बेअर्ड ने निराशा से भरे अंग्रेजों को दिल्ली से वापस लौटने से रोका था उसी ने वह नक्शा भी तैयार किया। पंजाब से आनेवाली सीजट्रेन आक्रमण के लिए आवश्यक अप्रतिम युद्ध सामग्री लेकर अंग्रेजी छावनी में सुरक्षित पहुंच गई। जिस शहर ने अंग्रेजों की उत्कृष्ट सेना को, सेनापतित्व को और समरपटुत्व को तीन माह तक रणांगण में परेशान किया हुआ था उस दिल्ली को धूल में मिलाकर आज तक सहे कष्ट को सफलता में बदलने का समय निश्चित ही पास आया हुआ है-ऐसा उत्साहवर्धक संदेश भी अंग्रेजी सेना के कमांडर ने लश्कर में प्रचारित किया। पंजाब की नई सहायता आने के बाद अंग्रेजों की कुल साढ़े तीन हजार यूरोपियन, पंच हजार नेटिव सिख, पंजाबी आदि सिपाही और ढाई हजार कश्मीरी सेना मिलकर कोई ग्यारह हजार लोगों के अतिरिक्त अपने सैकड़ों सिपाही लेकर स्वयं जींद रियासत का राजा दिल्ली विजय के मुहूर्त पर अंग्रेजों से आकर मिल गया था। सितंबर के पूर्वार्ध में अंग्रेजी कमांडर ने विघातक पद्धति से आक्रमण कर नई-नई बैटरियों का निर्माण प्रारंभ किया है, यह देखकर दिल्ली के विद्रोहियों में भय निर्माण हुआ और चारदीवारी के बाहर अंग्रेज मानो एक व्यक्ति हो, ऐसे अनुशासनबद्ध होकर बढ़ते जाते थे। जबकि चारदीवारी के अंदर अवज्ञा और अनुशासनहीन व्यवहार वृद्धि पा रहा था। अंग्रेजों की ओर जो नेटिव थे वे तोपों की मार में बैटरी निर्माण के कार्य में इतनी दृढ़ता से लगे रहते कि फॉरेस्ट लिखता है-“नेटिव लोगों में कूट-कूटकर समाए निश्चलता के शौर्य का उन्होंने कमाल दिखाया। एक के बाद एक आदमी मरता जा रहा था-मृतक के लिए एक क्षण वे ठहरते, एक-दो आंसू बहाते, शवों की पंक्ति में वह शव रखते और फिर से उस मृत्यु स्थान पर काम करने लगते।" अंग्रेजों के अधीन नेटिव ऐसा अचल अनुशासन बरतते और दिल्ली शहर के नेटिव एक-दूसरे का काम ढकेल रहे थे। इस भिन्नता से बहुत सीखना आवश्यक है। अधिकारियों का उचित सम्मान और आदेश के शब्दों के प्रति आदर, यह अनुशासन का मुख्य बीज है। पर दिल्ली में इस बीज को सब जगह पैरों के नीचे कुचला जा रहा था। अधिकतर दोष असमर्थ अधिकारियों को और शेष स्वच्छंद आचरण करते अनुयायियों को; और अब उनमें निराशा, निरुत्साह का जोर! दिल्ली के बाहर बढ़ता जा रहा दबाव और दिल्ली के अंदर अस्त होता जा रहा यह उत्साह-इन दोनों का ही अंत करने के लिए सितंबर की 14 तारीख उदय हुई। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 277
अंग्रेजी सेना के चार विभाग कर उसमें से पहले तीन विभाग निकल्सन के अधीन कश्मीरी दरवाजे से घुसने के लिए भेजे गए और काबुल दरवाजे से घुसने के लिए चौथा भाग मेजर रीड के अधीन अंग्रेजों की दाईं ओर खड़ा हो गया। इन दो स्थानों पर चारदीवारी में छेद करने का काम प्रारंभ हुआ। सूर्योदय होते ही अंग्रेजों की दीवार फोड़नेवाली तोपें एकदम बंद हो गई। अंग्रेजों के शिविर में एक क्षण भर अंतिम समय की निःशब्दता! और तुरंत ही निकल्सन के साथ वह शिविर किसी जीवित दीवार की तरह एकाएक आगे दौड़ चला। उसके पहले नंबर के कॉलम ने कश्मीर बेस्टन के पास दीवार में जो छेद बनाया था उधर हमला किया। इसमें से गोलियों की बौछार शुरू हो गई। खंदक में अंग्रेजों के शव धड़ाधड़ गिरते हुए कुछ दीवार से आ लगे। दीवार को सीढ़ी लगी। सीढ़ी पर चढ़ा कि गिरा-ऐसी प्रचंड मार में अंग्रेजी सेना फिर-फिर दीवार पर चढ़ने लगी। अंग्रेजी सेना दीवार के छेद से अंदर घुसी। दीवार का वह हिससा जीत लिया गया-विजय का घंटा बजा। इस कश्मीर बेस्टन जैसे ही वॉटर बेस्टन के छेद से भी भयानक मारकाट करते, मरते-मरते एवं मारते-मारते अंग्रेजों के दूसरे नंबर के कॉलम ने वह छेद जीत दीवार के अंदर प्रवेश किया। तीसरे नंबर का कॉलम कश्मीरी दरवाजे की ओर जा रहा था। लेफ्टिनेंट होम और सालकेल्ड के वह दरवाजा बारूद लगाकर उड़ा देने के लिए उस दरवाजे के सामने आते ही दीवार के सामने खंदक पर बना पुल गिराया हुआ था। केवल एक बल्ली बची हुई दिख रही है। ठीक है, उसी पर से चलो। सार्जेंट मरा। वह महादूत भी गिरा पर आगे बढ़ो, होम आगे चला। होम ने आगे जाकर हाथ का बारूद अंत मं दरवाजे में रख ही दिया। तो फिर आग लगानेवाली दूसरी टोली बल्ली पर से घुसने लगी। लेफ्टिनेंट सालकेल्ड गोली लगकर गिर पड़ा, कारपोरल तू आगे घुस-तुझे भी गोली लगी? पर कुछ परवाह नहीं। मरते-मरते शूरों ने चिंगारी तो डाल ही दी। धड़ाड़, धड़ाड़, धड़ाड़? कश्मीरी दरवाजा खुलने की राह देखते अंग्रेजी सेनापति को उस भयानक युद्ध की मारा-मारी के घन गर्जन में वह आवाज साफ सुनाई नहीं पड़ा। परंतु वे आगे बढ़े? पर क्यों न बढ़े? यद्यपि विजय का घंटा मुझे सुनाई नहीं दी। फिर वह आगे बढ़े अंग्रेजी वीर! वे असफल हुए होंगे, यह असंभव! अब बहुत समय हो गया है, अतः हम आगे तो बढ़ ही लें। ऐसे प्रबल आत्मविश्वास से कैंपबेल ने हमले के आदेश दिए। खंदक तक वे पहुंचे। उन्होंने खंदक में पड़े अपने विजयी मरणोन्मुखों को देखा और मारते-दौड़ते वे कश्मीरी दरवाजे के टूटे हिस्से से दिल्ली में कूद पड़े। वहीं उन्हें अपने-अपने काम सफलता से पूरे कर दिल्ली में घुसे हुए वे पहले दो कॉलम भी मिले। निकल्सन के अधीनस्थ ये तीनों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 278
भाग युद्धभूमि के अपने-अपने काम रंगभूमि के पात्रों जैसी व्यवस्था से करके सेना का चौथा कॉलम कहां है-यह एक-दूसरे से पूछने लगे। अंग्रेजी सेना का चौथा भाग मेजर रीड के नेतृत्व में काबुल दरवाजे से हल्ला करने के लिए अंग्रेजों के दाएं बाजू से निकला था। सब्जी मंडी तक वह चलकर आया तो उन्हें रोकने, दिल्ली से बाहर निकले सिपाहियों से उनकी मुठभेड़ हुई। पहले हमले में ही मेजर रीड के नीचे गिर जाने से अंग्रेजी सेना में किंचित दबाव के कारण आदेश के लिए भ्रम उत्पन्न हुआ और विद्रोहियों का उत्साह चढ़ा और अंग्रेज भागता है क्या, ऐसा रंग दिखने लगा। पर होप ग्रांट अचूक रीति से अपने घुड़सवारों के साथ वहां दौड़ता आ पहुंचा और फिर से अंग्रेजी पक्ष का अटल रण शुरू हो गया। अंग्रेजों ने तोपों से जोरदार मार चालू की तब भी किशनगंज के बाग से, घर-घर से विद्रोहियों की गोलियां सूं-सूं करते रक्त की वर्षा कर रही थी। अंग्रेजी घोड़ों को आगे बढ़ाना कठिन हो गया। तोपें विद्रोही छीन लेंगे इस डर से पीछे जाना भी संभव न रहा। वे अंग्रेज घुड़सवार वहीं खड़े-खड़े मरने के लिए जम गए। एक आदमी भी नीचे गिरने के अतिरिक्त मृत्यु से डरकर इधर-उधर नहीं हिला। अंग्रेजों की ओर से नेटिव कमांडर घुड़सवारों की इस अपूर्व शूरता और आज्ञापालन के इस अपूर्व मेल के लिए उसका कमांडर होव ग्रांट कहता है-“नेटिव घुड़सवार अटल रहे। उनकी सिपाहियों पर आश्चर्य है! मैं उन्हें प्रोत्साहित करने लगा तो वे बोले, 'चिंता नहीं, इस स्थान पर हम आप जितनी देर कहें उतनी देर तक खड़े रहेंगे।'" अंग्रेजों की ओर से लड़ते नेटिव की शूरता को मात करनेवाला शौर्य स्वतंत्रता के पक्ष में सम्मिलित नेटिव ने प्रकट किया था। जिद से भरे वे विद्रोही इंच-इंच भूमि को लड़ते-लड़ते अब ईदगाह पर तेज मारामारी करने लगे। फिर गुस्से से भरकर हमले-पर-हमला। ईदगाह पर कब्जा करना चाह रही अंग्रेजी सेना डगमगाने लगी- फिर चढ़ाई करो; अंग्रेजी सेना हटी-फिर करो हमला-ईदगाह से मार खाते-खाते अंग्रेजी फौज ऊपर वर्णित बहादुर घुड़सवारों और अंग्रेजी तोपों के आश्रय में आ गई-फिर भी हमला करो। अब यहीं तक रहने दो। यह स्थान छोड़कर यह अंग्रेजी सेना लौटने लगी है। शाबाश विद्रोहियों! भी लड़ाई की। यदि तुममे से सबने ऐसा ही किया होता तो! इस चौथे भाग का जब ऐसा मनोभंग हो रहा था तब अंग्रेजों के शहर में घुसे तीन भाम कश्मीरी दरवाजे के पास थोड़ी देर ठहर फिर शहर पर कब्जा करने कूद चले। कैंपवेल, जोन्स और योद्धा निकल्सन ये तीन प्रमुख सेनापति अपनी निडर सेना को-‘चलो मर्दों, चलो' इस युद्ध गीत से आह्वान करते हुए काबुल दरवाजे की ओर लड़ते हुए निकले। जो भी तोप के रास्ते में मिले उसे कब्जाते, जो भी टेकरी दिखे उसपर अंग्रेजी झंडा फहराते और मार-काट करते-करते ब्रिटिश सेना बर्नबेस्टन स्थान तक आ पहुंची। परंतु यहां से अब खाली तोपें, बेजान टेकरियों और शूरशून्य रणक्षेत्र के स्थान पर 'दीन बोलो। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 279
दीन' की भयानक चिंघाड़ सुनाई दी और विद्रोहियों के गोलों का हमला हुआ। भयंकर रक्तपात होने लगा, मृत्यु का नाच शुरू हो गया, विजय से उन्मत्त अंग्रेजी सेना हतोत्साहित होकर पीछे हटी। सामने से यह पीछे हटना देखकर वह हठी वीर निकल्सन बाघ-सा-झपटा। शूरवीरों को जग में कुछ भी असाध्य नहीं, यह जिसका संकल्प था, वह निल्सन बर्नबेस्टन पर हुए अपमान से चिढ़कर फिर उस गली में घुसने लगा तो वहां फिर घमासान मच गया। इस दौ सौ गज लंबी गली में उस दिन जो मारकाट हुई वह पानीपत जैसे रण का एक संक्षिप्त संस्करण ही थी। जों अंग्रेज आगे पैर बढ़ाता उसे स्वतंत्रतार्थी जेहादी समर में गिरा ही देंगे, यह बात पक्की धकेलने लगी। शूर मेजर जैकब को भी उसने दांतों के नीचे रख चबा डाला। वीर निकल्सन, अब तुम ही आगे बढ़ो। तुझे छोड़कर अंग्रेजी सेना के सारे सेनापति इस गली ने नष्ट किए हैं। आया, हे स्वातंत्र्याभिमानी गली, वीरता की गुफा, आ गया स्वयं निकल्सन तुझपर दौड़ा। अब वास्तविक परीक्षा है। निकल्सन उस गली पर और गली निकल्सन पर। भयंकर युद्ध हुआ। तभी अंग्रेजी सेना में बिजली गिरने जैसा हाहाकार मच उठा। हटो, हटो! अंग्रेज सेना कहने लगी और छांटो-काटो-यह यह कोलाहल उस गली में उठा। जिसके नख निकल्सन के रक्त से भर गए थे वह भयंकर गली। जिसकी लंबाई के हर इंच पर किसी-न-किसी अंग्रेज की कब्र होगी। उस वीर्यवान गली से दूसरी बार भाग चली उस अंग्रेजी सेना का भाग किसी अंग्रेजी शासन में कभी उदय नहीं हुआ था। उनके चार भागों में से तीन भागों के प्रमुख कमांडर घायल हुए। छियासठ मृत्यु संख्या से क्या प्राप्त किया, यह देखने पर जनरल विल्सन को ज्ञात हुआ-दिल्ली के परकोटे का एक-चौथाई भाग हाथ में है। भय, चिंता और निराशा से पागल हुआ वह अंग्रेज कमांडर बोला, "दिल्ली छोड़कर तत्काल पीछे हट जाना चाहिए। सारा शहर अभी अविवाहित ही बना हुआ है। मेरे अधीनस्थ शूर लोगों की एक गली ने रक्षा की और जो मुट्ठी भर लोग अभी भी जीवित हैं उन्हें हजारों विद्रोही हर घर से आगे आने को बड़ी शान से बुला रहे हैं। ऐसी स्थिति में सारे-के-सारे लोग मर जाएं या पीछे लौटने का अपयश स्वीकार करें। " अंग्रेजों का मुख्य कमांडर 1857 का स्वातंत्र्य समर -280
जनरल विल्सन बोला, "इसलिए अब पीछे लौटना चाहिए।" पीछे लौटना चाहिए।" पीछे लौटना चाहिए? मृत्यु की ओर बढ़ते निकल्सन को अस्पताल में यह समाचार मिलते ह ीवह वीर बोला, "पीछे लौटना! उस पीछे हटनेवाले विल्सन को गोली मारने की शक्ति ईश्वर कृपा से मुझमें अभी भी शेष है।" इस मरते वीर की तरह ही सारे जीवित अंग्रेजों ने भी यही कहा और 14 सितंबर की रात कब्जा किए भाग को संभाले अंग्रेजी सेना अटल बनी रही। जनरल विल्सन के पीछे लौटने के विचार को अंग्रेज योद्धाओं ने जितना अस्वीकार कर दिया उससे भी अधिक विद्रोहियों के शिविर में चल रही हलचल ने विल्सन के भय की व्यर्थता प्रकट करना चालू कर दी। दिल्ली में अधिक देर न लड़ते हुए हम बाहर के प्रदेशों में युद्ध करेन निकल पड़ें, यह एक पक्ष का विचार बना और दूसरे पक्ष का दृढ़ विचार था कि मृत्यु-पर्यंत दिल्ली समर्पण न करें। अंग्रेजों में कितने ही मतांतर हों, तब भी बहुमत का सम्मान कर अंत में भिन्नता को एक वाक्य कर लेने का अमूल्य सद्गुण भी था इधर क्रांतिकारी सिपाहियों की अंधरे नगरी में उसका अभाव होने से उपर्युक्त दोनों पक्ष एक दिशा में न जाकर अलग-अलग रास्तों पर निकल पड़े। कुछ सिपाही दिल्ली छोड़कर बाहर निकले। कुछ अंत तक दिल्ली की भूमि से एक भी पैर पीछे न हटने का निश्चय कर रणांगण में अचल बने रहे। 15 सितंबर से 24 सितंबर तक दिल्ली में इसी पक्ष ने युद्ध किया और वह भी इतने निश्चय, शौर्य और दृढ़ता से कि मस्जिद और राजमहल में जब अंग्रेजी सेना घुस रही थी तब उस सारी सेना के सामने एक-एक रखवाला ही बंदूक हाथ में लिये खड़ा मिला। अंग्रेज पास आते ह ीवह धैर्य से बंदूक तानता, बिल्कुल निशाने पर आते ही शत्रु पर गोली चलाता और स्वदेश के लिए यह जीवित अवस्था की अंतिम सेवा कर मृत्यु क सेवा में हाजिर हो जाता। अंग्रेजी इतिहासकार लिखते हैं-"जिस समय महल मं अंग्रेज सेना घुसने लगी उस समय वहां कुछ जेहादी लोग खड़े हुए दिखाई दिए। वे पंक्ति में भी नहीं थे, क्योंकि पंक्ति बनाते, इतनी उनकी संख्या ही नहीं थी। तथापि जिस शत्रु से आज तीन माह तक बड़ी दृढ़ता से उन्होंने संघर्ष किया उन फिरंगियों से उनकी शत्रुता जीवन के अंतिम क्षण तक भी ढीली नहीं पड़ी थी, यह सिद्ध करने के लिए वे सिपाही शत्रुता जीवन के अंतिम क्षण तक भी ढीली नहीं पड़ी थी, यह सिद्ध करने के लिए वे सिपाही विजय की रत्ती भर परवाह किए बिना अद्भूत कर्मी लोग हमें चिढ़ाते अचल खड़े रहे थे।" अंग्रेजों के हाथ में दिल्ली का तीन-चौथाई भाग चला जाने के बाद कमांडर-इन-चीफ बख्तार खान दिल्ली के बादशाह से मिले और बोले, "दिल्ली तो अपने हाथ से चली गई है, परंतु इससे विजय की सारी संभावना अपने हाथ से निकल गई, ऐसा नहीं है। बंद स्थान से लड़ाई लड़ने की अपेक्षा खुले प्रदेश से शत्रु को परेशान करने का दांव अभी भी निश्चित विजयी होने वाला है। अपनी सेना के उन लोगों को लेकर, जो स्वतंत्रता युद्ध में मरते दम तक तलवार उठाए रखने को तैयार हैं, ऐसे योद्धाओं को चुनकर मैं उनके साथ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 281
दिल्ली में लड़ाई करता हुआ दूसरी जगह निकल जा रहा हूं। शत्रु की शरण जाने की अपेक्षा लड़ाई करते हुए बाहर निकल जाना ही हमें इष्ट लगता है। ऐसे समय आप भी हमारे साथ चलें और अपने झंडे के नीचे हम स्वराज्य के लिए ऐसे ही लड़ते रहें।'8 बाबर, हुमायू या अकबर के तेज का शतांश भी यदि इस वृद्ध मुगल में होता तो उसने यह वीरतापूर्ण निमंत्रण मानकर उस साहसी बख्तर खान के साथ दिल्ली से कूच किया होता। पर बुढ़ापे से बलहीन, राजविलास से मतिमंद और पराजय से भयभीत हुए उस बादशाह ने अंतिम समय तक अपनी अनिश्चितता और चंचलता बनाए रखी। अंतिम दिन वह हुमायूं की कब्र में छिपकर बैठा और बख्तर खान का निमंत्रण अस्वीकार कर इलाही बख्श मिर्जा के उपदेश के अनुसार अंग्रेजों की शरण जाने लगा। इलाही बख्श असल दगाबाज था। उसने यह समाचार अंग्रेजों को दिया अंग्रेजों ने तत्काल कैप्टन हडसन को उधर भेजा। जीवनदान का वचन लेकर बादशाह ने समर्पण किया। उसे महल तक लाकर कैद में डाल दिया गया। फिर दगाबाज कुत्ते इलाही बख्श और मुंशी रजब अली दौड़े आए और बोले, "अभी शहजादे हुमायूं के मकबरे में ही छिपे बैठे हैं।“ फिर हडसन दौड़ा गया। शहजादों ने समर्पण किया और उन्हें वह गाड़ी में बैठाकर दिल्ली की ओर ले चला। शहर में पैर रखते ही हडसन शहजादों की गाड़ी के पास दौड़कर पहुंचा और चिल्लाकर बोला, "अंग्रेजों की महिलाओं, बच्चों का वध करनेवालों को मृत्युदंड ही दिया जाना चाहिए।" कांपते हुए वे गाड़ी से नीचे खींचे गए, उनके शरीर के सारे वस्त्र उतार लिये गए और हडसन ने उन शरणागत शहजादों की ओर से अपना मुंह फेरा और तीन गोलियों से उसने उन तीनों शहजादों का मार डाला। तैमूर के वंशवृक्ष की वे अंतिम पत्तियां हडसन ने तोड़ डाली। परंतु उसकी क्रूरता का समाधान इन शरणागत शहजादों को केवल गोलियों से भूनकर नहीं हुआ। मृत्यु तक तो जंगली आदमी भी बदला लेते है। फिर सभ्य आदमी में और उनमें अंतर ही क्या रहा! इसलिए उन शहजादों के शवों को उठाकर दिल्ली की कोतवाली की ओर फेंका गया। गिद्धों को तैमूर के वंशजों की बढ़िया दावत देने के बाद उन सड़े शवों को खींचकर नदी में फेंक दिया गया। अकबर के वंशजों को दफनाने के लिए कोई भी न रहा! हे कालचक्र! तेरे कैसे-कैसे खेल हैं? अब सिखों को सचमुच लगने लगा कि उनके ग्रंथ में लिखा भविष्य सच हुआ। पर वह किस अर्थ में? किस तरह क्या फलित देकर? फिर दिल्ली में भयानक कत्ल और लूट चालू हुई। उसका वर्णन सुनकर लॉर्ड एलफिंस्टन जॉन लॉरेंस को लिखता है-"दिल्ली का घेरा समाप्त हो जाने पर अपनी सेना ने दिल्ली का जो हाल किया वह हृदयद्रावक है। शत्रु और मित्र का भेद न करते हुए सरेआम बदला लिया जा रहा है। लूट में तो हमने नादिरशाह को भी मात दे दी।"126 यूरोपियन और नेटिव सिपाहियों सहित दिल्ली के घेरे में लगी अंग्रेजों की सेना
1857 का स्वातंत्र्य समर - 282
126 'लाइफ ऑफ लॉरेंस', खंड 2, पृष्ठ 262 ।
दस हजार तक हो गई थी और उसमें से मृत्यु-मुख में पड़े और घायल पड़े कोई चार हजार लोग इस युद्ध में काम आए। क्रिमियन वार जैसे प्रचंड युद्ध में भी जनहानि का इतना विशाल अनुपात नहीं दिखता। 127 विद्रोहियों की ओर जो जनहानि हुई होगी उसका विश्वसनीय आंकड़ा निकालना-अंग्रेजी ग्रंथों से-असंभव है। फिर भी कम-से-कम पांच से छह हजार तक उनकी जनहानि हुई ही होगी। इस तरह यह इतिहास-प्रसिद्ध नगर स्वदेश, स्वतंत्रता और स्वधर्म-रक्षा की दिव्य चेतना से संचालित होकर कोई एक सौ चौंतीस दिनों तक अंग्रेजों जैसे सबल शत्रु की समर कुशलता को धिक्कारता हुआ रात-दिन संघर्षरत रहा। कुल मिलाकर यह अटल संघर्ष तत्त्वनिष्ठा को शोभा देनेवाला था । अपनी दीवार पर गढ़ा फिरंगी निशान फेंककर अपने निशान की घोषणा जिस दिन की गई, गुलामी का मायाजाल फाड़कर स्वतंत्रता प्राप्ति के साहसी अभियान पर जिस दिन दिल्ली बढ़ी, सारे हिंदुस्थान के नाम से स्वधर्म प्रतिष्ठा के साहसी अभियान ध्वज गाड़कर उस विस्तीर्ण देश की एकता की संवेदना का दिल्ली ने जिस दिन प्रथमोच्चार किया, उस दिन से बहादुरशाह के राजमहल में अंग्रेजी तलवार ने, अंतिम स्वदेशी रक्त बिंदु गिरने तक इस शहर ने स्वदेश स्वतंत्रता के जेहाद को अलंकृत करे-ऐसे वीरता-प्रचुर, स्वार्थ-निवृत्तिमय और उदारचरित्र कृत्य कुछ कम नहीं किए। नेता न होते, संगठन न होते, अंग्रेजों जैसा करते हुए शत्रु का सामना करते और विशेषकर असल फिरंगी तलवारों की तुलना में अपने ही कम-असल देशजों की तलवारें अपने प्राण लेने के लिए दिल्ली पर टूट पड़तीं-पहली बाधा से अनाथता, दूसरी से बिखराव, तीसरी से असह्यता और चौथी से उत्पन्न होती उद्विग्नता-इन सारे संकटों की परवाह न करते हुए रणभूमि पर देशवीरों और धर्मवीरों की भांति अचल, मृत्यु का वरण करते हुए सत्कृत्य दोनों ही भावी पीढ़ी के अभिमान के ही पात्र होंगे। इसलिए लज्जास्पद नहीं, उन दोषों और सत्कृत्यों की पंक्ति के एक अद्भुत तत्त्वनिष्ठा का तेज, स्वधर्माभिमान का तेज, स्वदेश स्वतंत्रता का तेज, झिलमिलाता होने से वे दोनों ही कृत्य नैतिक उदाहरण के मूर्त व्याख्यान हैं। हे दिल्ली नगरी! तू गिरी, उसमें कोई लज्जा नहीं। क्योंकि तू स्वराज्य के लिए, स्वधर्म के लिए, स्वदेश के लिए लड़ी थी! अतः 'दन्तछेदो हि नगानां श्लाघ्यो गिरिविदारणे!' पर्वत से जूझते हुए चूर्ण हुआ दांत ही गजश्रेष्ठ के लिए होता है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 283 127 1. लाइफ ऑफ लॉरेंस', खंड 2 की फॉरेस्ट द्वारा लिखित प्रस्तावना। 2. रॉटन जैसा ग्रंथकार भी कहता है- "विद्रोहियों के हताहतों की संख्या सदैव ही अगणित बताई जाती थी।" -पृष्ठ 195
प्रकरण-5 लखनऊ अव्यस्थित राज्य पद्धति से प्रजा का संरक्षण करने के लिए अवध के घरों में कोने कोने तक घुसी बैठी अंग्रेजी सत्ता को जून माह में क्रांतिकारियों ने मार-पीटकर अवध की एक छोटी सी रेसीडेंसी में धकेलकर बंद कर दिया था। वहां उसको सर हेनरी लॉरेंस ने धीरज देना प्रारंभ किया। चिनहट की लड़ाई में हारकर जब सर हेनरी ने रेसीडेंसी में कदम रखा और वहां अवध पर अधिराज्य पाने के प्रश्न पर फिर से विचार करना प्रारंभ किया तब उसके साथ उस रेसीडेंसी में कोई एक हजार यूरोपियन और आठ सौ नेटिव लोग थे। इन लश्करी लोगों के साथ ही जो अन्य गोरे और काले ईसाई भी आए थे उनकी कुल संख्या 3,000 तक थी। चिनहट की पराजय के बाद यह सेना जब पहली बार रेसीडेंसी में बंद हुई तब उस तेजी से और अकस्मात् आए हुए संकट में रेसीडेंसी का स्थान, दीवारें, कोट-ये सब बहुत कमजोर स्थिति में थे। अंग्रेजों की इस असहायता का तभी लाभ उठाकर उनपर जोर का हमला कर उस रेसीडेंसी को जीत लेने का अच्छा अवसर विद्रोहियों के लिए आया था। पर इस अवसर में बंद हो जाने के बाद कोई दो हफ्ते अपने चारों ओर कोट आदि का संरक्षण की दृष्टि से उत्तम प्रबंध करने में अंग्रेज व्यस्त रहे। विद्रोहियों की सेना को चिनहट में जिस दिन विजय मिली उसी दिन अवध में 1857 का स्वातंत्र्य समर – 284
अंग्रेज़ी राज्यसत्ता समाप्त होकर विद्रोह को राज्य क्रांति का स्वरूप प्राप्त हो गया। सिपाहियों राजाओं और नागरिकों ने प्रथम लखनऊ की खाली गद्दी पर स्वसम्मत सत्ता की प्रस्थापना करना प्रारंभ किया। चिनहट की लड़ाई के बाद पहले हफ्ते में इधर-उधर मची अराजकता-अंधाधुंधी समाप्त किए बिना युद्ध-कार्य के लिए आगे कोई प्रयास नहीं कर पाने के कारण उस हफ्ते में अंग्रेजों को अपने कोट का बंदोबस्त मजबूती से करने की छूट देकर भी विद्रोही पहले लखनऊ की राज्य-रचना के कार्य में लगे। लखनऊ के पूर्व नवाब वाजिद अली शाह कादर को ही लखनऊ क गद्दी पर सर्वसम्मति से बैठाया गया। बर्जिस कादर अल्प वय का होने के कारण अवध राज्य के सारे अधिकार राजमाता बेगम हजरत महल को सौंप दिए गए। दिल्ली के राजमहल का बादशाह बहुत बूढ़ा होने के कारण उसके नाम से शासन के सारे कार्य बेगम जीनत महल ही चलाती थीं तो लखनऊ के राजमहल में भी वहां का नवाब अल्प वय का होने के कारण वहां का राजप्रतिनिधित्व बेगम हजरत महल की कर्मठता पर ही अवलंबित था। यह अवध की बेगम यद्यपि सन् 1857 की दूसरी लक्ष्मीबाई नहीं थी, फिर भी पराकाष्ठा की कर्तव्यवती, स्वतंत्रता के रस में सराबोर और साहस-संकल्पा थी, इसमें कोई शंका नहीं। उसके दरबार के मैमूब खान आदि सरदारों के नेताओं को और अवध प्रांत के भिन्न-भिन्न स्थानों से लखनऊ की ओर स्वतंत्रता संग्राम के लिए दौड़ते आए कर्मठ लोगों को मान्य भिन्न-भिन्न पुरुषों को बेगम हजरत महल ने न्याय, वसूली, लश्कर, पुलिस आदि विभागों में अधिकारी नियुक्त कर दिया। हर दिन राजनीति के भिन्न-भिन्न पहलुओं पर चर्चा करने के लिए दरबार भरता और वहां स्वयं बेगम साहिबा अपने अल्प वय नवाब के नाम से राजकाज करती थीं। अवध प्रांत स्वतंत्र होकर अंग्रेजी सत्ता का वहां लवलेश की शेष नहीं है, यह समाचार बेगम के हस्ताक्षर-मुहर के साथ भेज दिया गया। आसपास के सारे जमींदार, मांडलीक, राजाओं को लखनऊ आ जाने के लिए पत्र भेजे गए। भिन्न-भिन्न अधिकारियों की नियुक्तियां, राज्य-व्यवस्था के सर्वांगों की व्यवस्था, हर दिन भरते दरबार आदि से ऐसा सब ओर दिखने लगा कि अवध का विद्रोहित्व समाप्त हो गया है और उसे राजनीतिक संगठनत्व प्राप्त हो गया है। पर केवल दिखने लग गया है, क्योंकि ये अधिकारी और यह अव्यवस्था और ये दरबार तत्काल नियुक्त करने में जितनी शस्त्रशुद्धता विद्रोहियों ने दिखाई उतनी उन्होंने उपर्युक्त नियुक्तियों के आज्ञापालन में बिल्कुल नहीं दिखाई थी। राज्य क्रांति में सामान्यतः यही दोष घटित होता है और इस कारण राज्य क्रांति के आरम्भ में ही उसके नाश के बीज पड़ जाते हैं। जिसका राज्य उलटना है उसके कानूनों को तलवार से चीर डालना ही राज्य क्रांति है! पर एक बार विदेशियों के कानूनों को तलवार से चीरने की आदत लग जाने पर फिर उस नशे में चाहे जिस भी कानून को अपनी इच्छा के अनुसार लतियाने की आदत लग जाती है। दुष्टतापूर्ण कानूनों को नष्ट करने का चस्का लगी तलवार कानून का ही नाश 1857 का स्वातंत्र्य समर – 285
करने लगती है। विदेशी शासन का निःपात करने निकले वीर अंत में शासन का ही नाश करने लगते हैं। विदेशी राज्य के बंधन काट देने के रण-मद में उन्हें राजबंधन ही अस्वीकार हो जाते हैं और इस तरह राज्य क्रांति का अंत अराजकता में, सद्गुणों का अंत दुर्गुणों में हो जाता है और हितकर प्रयासों के परिणाम अहितकारी होने लगते हैं। अराजकता-पराजय जितनी ही बंधन-रहितता दुष्ट बंधनों जैसी ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के नाश का कारण होनेवाली होती है-इस समाज-सत्य का विस्मरण जिस किसी क्रांति में हुआ उस क्रांति का उसके क्रांति तत्त्व कारण ही विनाश हुआ है। किसी रोग का परिहार करने के लिए मद्य सेवन की आदत जैसे जाती नहीं, वैसे ही दुष्टतापूर्ण बंधन से मुक्ति के लिए पिया जानेवाला बंधनोच्छेद का मद्य दुष्टता चली जाने के बाद भी व्यसनी लोगों को अंधाधुंध और बेसुध किए रहती है। जो राज्य क्रांति अपवित्र होने लगती है और अपवित्रता के सहभागी विनाश के बीज उसका जल्द ही प्राण हरण कर रहे हैं। इसलिए परतंत्रता के रोग का नाश करने के लिए जिन्हें राज्य क्रांति का मद्य पीना है उन्हें उस मद्य का व्यसन न लग जाए-वे ऐसी दक्षता हमेशा रखें। विदेशी सत्ता को धिक्कारते हुए ही स्वकीय सत्ता का सम्मान करने की दृढ़ शिक्षा देते जाएं, दुष्टापूर्ण बंधन का उच्छेद करते हुए निरकुंशता का चस्का न लगे, ऐसी सजगता रखें। परराज्य का एवं परनिर्मित अधिकार का निःपात करते समय स्वराज्य एवं स्वनिर्मित अधिकार को अति पूजनीय-वंदनीय मानते जाएं। पर सत्ता का उच्छेद होते ही स्वदेशीय समाज में अराजकता के नाशकारी प्रभाव न पड़ें, इसिलए तत्काल बहुमत से जो राज्य-घटना निर्माण हो उसे सब लोग वंदनीय मानें। उस राज्य-घटना की ओर से जो अधिकारी नियुक्त हो उसे सब लोग वंदनीय मानें। उस राज्य-घटना की ओर से जो अधिकारी नियुक्त किए जाएं उनके आदेशों को सिर नवाकर मानना चाहिए, उनके आदर्शों के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। व्यक्ति की झक भूलकर समष्टि कि सिद्धांत से तन्मय रहना चाहिए और इस बहुमत से निर्मित स्वराज्य घटना में यदि कुछ परिवर्तन करना अपनी विवके बुद्धि को न्यायपूर्ण लगता हो तो उसे बहुमत नियम के अनुसार वैध मार्ग से ही घटित किया जाना चाहिए। सारांश यह कि बाहर विदेशियों का तख्ता पलटना, परंतु अंदर निर्माण करना; बाहर तलवार, पर अंदर विधि-कानून राज्य क्रांति की सफलता और सिद्धि के लिए अति आवश्यक राज्य व्यवस्था के उपर्युक्त सिद्धांत का सन् 1857 के पूर्वार्ध में बहुत अच्छी तरह पालन किया गया। विद्रोह होते ही यथासंभव वेग से दिल्ली, लखनऊ, कानपुर आदि शहरों में व्यवस्था से राजय प्रबंध के कर्तव्य करने की ओर ध्यान दिया गया। व्यक्ति विषयक अन्याय के अपहरण की इच्छा से इन सब प्रमुख शहरों में कोई भी नकली व्यक्ति अंतिम क्षण तक 1857 का स्वातंत्र्य समर – 286
सामने नहीं आया। निर्विवाद सिद्ध राजपुरुषों को ही वंश परंपरागत रूप से लोकसम्मत सिंहासन पर बैठाया गया था। इन सब राजपुरुषों ने इस क्रांति का बेजा फायदा लेकर अपने पूर्वार्जित अधिकार बढ़ाने के लिए कोई स्वार्थ नहीं दर्शाया था। इतना ही नहीं, उसके विपरीत अपने कारण देश की स्वतंत्रता के उस महान् समर को अपयश से बचाने हेतु जहां संभव हुआ वे अपने पहले के अधिकार छोड़ देने के लिए भी तैयार हो गए, इसके लिखित साक्ष्य प्रकाशित हैं। यहां तक राज्य व्यवस्था का पूर्वार्ध सराहनीय उदात्तता से सन् 1857 ने पूरा किया। परंतु राज्य व्यवस्था में अत्यंत प्रमुख भाग सैन्य शक्ति-संपन्न लोगों का होने के कारण पर-राज्य बंधन तोड़ते ही उन्हें किसी तरह के बंधन स्वीकार्य न हुए और राज्य क्रांति की इस भीड़ में उनका सारा अनुशासन बिगड़ गया। इस कारण स्वराज्य चेतना की पहली पवित्र लहर में स्वयं ही नियुक्त किए अधिकारियों के सामने वे स्वयं अपमान, अवज्ञा और उपहास भी करने लगे तथा राज्य क्रांति का अंत अराजकता में होने लगा। ऐसी स्थिति में उनके स्वार्थ से दूषित हुई सिद्धांतनिष्ठा को अपने व्यक्तिनिष्ठा के ऐश्वर्य के शुद्ध करके अपने पराक्रम के दिव्यत्व से उनका मनोहररण करके जो उन्हें फिर से स्वराज्य व्यवस्था के अनुशासन पर ला बैठाए, ऐसे विलक्षण नेता भी कुछ दिव्य अपवाद छोड़कर-इन अधिकारियों में उत्पन्न नहीं हुए। इस कारण बहुत से स्थानों पर क्रांति पक्ष के शिविर में संगठित सेना की जगह व्यर्थ लोग ही अधिक भरे हुए होते थे। ये तो फालतू लोग थे और उन्होंने ही इस क्रांतियुद्ध को अपजयी बनाया। क्रांतिकारियों में जो शूर, स्वार्थ-त्यागी स्वातंत्र्य समर में कदम रखने लायक पवित्र चरित्र थे उन्होंने यह युद्ध तीन वर्ष तक लड़ा। लखनऊ का छावनी में इस दूसरे उच्च वर्ग की अपेक्षा पहले वर्ग अर्थात् फालतू लोगों की ही भरती अधिक होने से बेगम हजरत महल के दरबार से नियुक्त भिन्न-भिन्न अधिकारियों के आदेश कभी भी नहीं माने जाते थे और सिपाही लोग बेमुरव्वत, अत्याचारी, अनुशासनहीन और स्वंच्छंद व्यवहार करते थे। इस पहले वर्ग की संख्या यद्यपि बड़ी थी फिर भी दूसरे वर्ग के जो थोड़े लोग उनमें थे उनके शूरत्व और उदात्त विचारों के प्राकृतिक तेज से उन्हीं का प्रभाव सिपाहियों पर अधिक होता था और ऐसे दृढ़ निश्चयी लोगों के आग्रह के अनुसार 20 जुलाई को रेसीडेंसी में बंद अंग्रेजों पर पहला भारी हमला करने की योजना बनी। 20 जुलाई को प्रातःकाल अंग्रेजी पर दागी जा रही विद्रोहियों की तोपें पूरी तरह बंद हो गईं। सुबह आठ बजे के आसपास अंग्रेजी रेसीडेंसी के पास विद्रोहियों द्वारा लगाई बारूद धमाके से फूटते ही विद्रोहियों की सेना हमला करने के लिए जोर से उछली। उसी समय उनकी तोपों पर भिन्न-भिन्न दिशाओं से विद्रोहियों के सेना अंग्रेजों पर टूट पड़ी। उस सेना के जिस भाग ने कानपुर बैटरी पर हमला किया 1857 का स्वातंत्र्य समर – 287
था उसके सैनिकों ने अंग्रेजी तोपों पर निडर होकर हमला किया। 'चलो बहादुर, चलो! चलो बहादुर, चलो!' ऐसी गर्जना करते वे फिर-फिर उन तोपों पर चढ़ जाते। जिनके हाथों में उनका स्वराज्य ध्वज फहरा रहा था उनके वीर्यवर नायक ने स्वयं वह झंडा ऊंचा उठाकर दौड़ते हुए उस तोपखाने की खंदक में छलांग लगा दी और दूसरों को-'चलो, आगे बढ़ो' का आह्वान करता वह खंदक लांघकर अंग्रेजी तोप पर अपना क्रांतिध्वज गाड़ने लगा। परंतु इस विलक्षण साहसी पुरुष को अंग्रेजों की गोली ने तत्काल चित कर दिया। ऐसे समय उस एक शव के पीछे हजारों को आग बढ़ाना छोड़कर और जिस हेतु वह धर्मवीर गिरा उस रिपु रक्त-भाजन की मृत्यु को सार्थक न करते हुए उसे मरता देख विद्रोही आगे बढ़ने की बजाय पीछे हटने लगे। फिर भी, शाबाश सीढ़ीवाले! इन बाजारू लोगों की तरह पीछे न भागते हुए तुम आगे बढ़ रहे हो। लगाओ उन सीढ़िवालों! इन बाजारू लोगों की तरह पीछे न भागते हुए तुम आगे बढ़ रहे हो। लगाओ उन सीढ़ियों को खंदक में! फिरंगी गोलियों की वर्षा में चढ़ो फटाफट उन सीढ़ियों पर-पहला सीढ़ियों पर चढ़ा-गिरा! चलो, दूसरा आगे बढ़ो! पर दूसरा कौन आगे बढ़ेगा? यही तो अंग्रेजी सेना और विद्रोहियों में भेद है। अंग्रेज मृतक का रक्त उसके अनुयायी यों ही नहीं बह जाने देते। एक गिरा, दस आगे, यह उनकी रीत-एक गिरा तो दस पीछे यह हमारी रीत। पीछे आनेवाले कहीं भी पड़ें पर आगे जानेवालो, तुम निश्चित ही स्वर्ग में जाओगे। स्वराज्य का झंडा डरपोक लोगों की जीवित मृत्यु से गंदा न हो, इसलिए उसे हाथ में लेकर जिन्होंने शत्रु की आग उगलती तोपों पर उसे लगाना आरंभ किया, ऐसे दिव्य भमीकर्मियों, तुम्हारे रक्त से वह झंडा हमेशा शुद्ध, सतेज और पवित्रता के साथ दमकता रहे। सचमुच ऐसी ही रक्त-रंजित भुजाओं में स्वतंत्रता का झंडा खिलता है। जिनके पास रक्तरंजित होनेवाली कलाइयां न हों, उनके हाथ ऐसे स्वतंत्रता के ध्वज को स्पर्श कर विजय के बदले उस ध्वज को लांछित अवश कर देते हैं। यह पहला हमला लौट आने पर अंग्रेजी सेना से विद्रोही रोजाना छोटी-छोटी भिड़त करते रहे। उन्होंने रेसीडेंसी के घरों को बारूद लगाकर उड़ा देने का प्रयास बहुत दृढ़ता से चलाया हुआ था। ऊपर से तोपों की मार और नीचे से बारूद की ज्वाला का विस्फोट। अपने पैर के नीचे की भूमि कब जबड़ा खोलकर गटक लेगी, इसका अंग्रेजों को कोई विश्वास न था। ब्रिगेडियर इन्नेस के अनुसार-'विद्रोहियों ने कुल मिलाकर छत्तीस बार बारूद लगया था। विद्रोहियों की तोपे भी अखंड मार करती रहीं। आसपास छिपी जगहों से सिपाहियों की बंदूकों से छूटती अचूक गोलियां, अंग्रेजों की ओर से आती जवाबी गोलियां, एक-दूसरे के शिविरों से गुप्त जानकारी लाने के लिए रात के अंधियारे में निकली टोलियों की प्राणघाती कुश्तियां, परकोटे के अंदर और बाहर कान में बातें करते लोगों की करतूतें। दूसरी ओर छिपे बैठे दूसरे पक्ष ने बातें सुनीं, यह समझते ही अपमान होता। अंग्रेजों के झंडे पर गोला फेंक उसे गिराकर होता विद्रोहियों का मनोरंजन तो रात होते ही फिर से नया झंडा रेसीडेंसी पर फहराने की अंग्रेजी जिद। युद्ध के इस 1857 का स्वातंत्र्य समर - 288
भीषण उपहास से लखनऊ की रणभूमि कभी-कभी जोरों से हंसती भी थी।“ पर अंग्रेजों की ओर के नेटिव सिपाहियों ने जो शूरता दिखाई उसे देखकर रणांगण के भूत-पिशाच जितने हंसे उतना बीभत्स हास्य रस कभी भी उत्पन्न न हुआ होगा। हर दिन रात को विद्रोहियों के दूत सिखों या अन्य नेटिव लोगों के अधीन परकोटे की ओर छिपते हुए जाते और उनसे पूछते कि तुम स्वदेश से नमकहरामी कर फिरंगियों की तलवार को मां के पेट में क्यों ठूस रहे हो? विद्रोहियों की ओर से यह प्रश्न कभी अधिक ही गंभीरता से पूछा जाता तो बीच में ही थोड़ा मजा कर लेने के लिए तटबंदी के राजनिष्ठ नेटिव कहते—'किंचत् पास आओ तो कह सकें!'' और वे पास जाते तो किसी छिपाए हुए गोरे साहब को वे आगे कर देते। ऐसा दगा देखकर विद्रोही लज्जित होकर निकल जातें विद्रोहियों के जो अचूक और विविश्रांत बंदूकबाज थे उन सबमें अवध के भूतपूर्व नवाब का एक अफ्रीकन खोजा अंग्रेजों की रेसीडेंसी में बहुत खलबली मचाए हुए था। उसे अंग्रेज 'ओथेलो' कहते थे। चार्ल्स बॉल लिखता है—“जोहांस के घर पर बैठकर यह अफ्रीकी खोजा दिन-रात गोलियां दागता रहता था। उसके अचूक निशाने और प्राणहारी गोलियों से यूरोपियन लोग चटपट मरते थे। विद्रोहियों की ओर से किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में इस खोजा ने अधिक यूरोपियनों के प्राण लिये।“ सर हेनरी लॉरेंस के मारे जाने पर अवध ने मार डाला। अंग्रेजों का यह दूसरा चीफ कमिश्नर लखनऊ के घेरे में मारा गया। परंतु 'घेरे' जैसी अनिश्चित भयंकरता में भी उनकी सेना की आधारभूत नियमबद्धता और अनुशासनबद्ध रचना के कारण किसी सोल्जर का मरना या अधिकारी का मरना व्यवस्था की दृष्टि से एक जैसा ही रहता। इस दूसरे कमिश्नर के मरते ही सारे अधिकारों का चार्ज ब्रिगेडियर इंग्लिस ने ले लिया और घेरे का कार्य उसी तरह चालू रहा। अब तक हुई हानि, मृत्यु संख्या, कर्मठ लोगों के देहांत, अन्न की कमी और शत्रु की व्यूह-रचना से अंग्रेज यद्यपि निराश नहीं हुए थे, फिर भी हताश होते जा रहे थे। इसी समय कानपुर से अंगद लौट आया। यह अंगद नामक नेटिव नौकर पहले अंग्रेजी सेना में नौकर था और अब पेंशनभोगी था। लखनऊ का घेरा पड़ने के बाद बाहर का कोई समाचार लाना किसी भी गोरे दूत को संभव नहीं था। उनकी गोरी चमड़ी, भूरे बाल या उनकी कंजी आंखे उन्हें सिपाही की तलवार से जीवित वापस नहीं जाने देते थे। इसलिए इस आंग्ल दूत कर्म पर किसी काले आदमी की नियुक्ति आवश्यक होने से बहुत से राजनिष्ठ काले लोग अंग्रेजों ने अब तक लखनऊ के बाहरी प्रदेश में भेजे थे। परंतु उन सबमें से अकेला अंगद ही जीवित लौट आया। विद्रोहियों के डर से वह कोई चिट्ठी-पत्री साथ नहीं लाया था, फिर भी 'अंग्रेजी सेना कानपुर से लखनऊ की सहायता के लिए 1857 का स्वातंत्र्य समर – 289
निकली है'- यह प्रत्यक्ष देखा हुआ समाचार उसने कमांडर इंग्लिस को सुनाया। इस समाचार से आनंदित हुए अंग्रेजों ने अंगद से कहा, "तू फिर से लौट जा और हैवलॉक का लिखित उत्तर लेकर आ।" तारीख 22 को लखनऊ छोड़क रवह अंगद 25 की रात ग्यारह बजे फिर लौट आया। उसके साथ हैवलॉक का पत्र था-"किसी भी कठिनाई से निपटने के लिए आवश्यक सबल सेना के साथ हैवलॉक आ रहा है, पांच-छह दिन में लखनऊ मुक्त हो जाएगा।" अपनी मुक्ति के लिए आनेवाले उस शूर हैवलॉक को लखनऊ की पूरी जानकारी मिले, इसलिए लश्करी नक्शे हाथ में देकर अंग्रेजों ने अंगद को कहा, "तू फिर से हैवलॉक के पास जा।" वह विलक्षण दूत फिर से हैवलॉक के पास गया और उसने सारे लश्करी नक्शे उसे दिए। अब हैवलॉक की विजयी सेना के ध्वज लखनऊ के श्मशान पर से आते ही होंगे। अंग्रेज उन्हें लगा, ये हैवलॉक की तोपें तो नहीं! इस आशा में तोपों की आवाजें जब अंग्रेज ध्यान देकर सुनने लगे तो उनके ध्यान में आया कि आज शत्रु दूसरा आक्रमण बढ़ाता चला आ रहा है। कानपुर बैटरी, जोहांस हाउस, बेराम कोठी आदि स्थानों पर विद्रोही मार करने लगे। उस दिन विद्रोहियों की बारूदी सुरंग ने बढ़िया धमाका किया। पूरी रेजिमेंट कवायद करती अंदर चली जाए इतना बड़ा रास्ता परकोटे में बन गया। परंतु यहां से अंदर जानेवाली रेजिमेंट कहां है? अंग्रेजों की सेना ने शत्रु की दीवार में ऐसा रास्ता बनाया होता तो उन्होंने आधे घंटे में उस रेसीडेंसी को खंडहर बना दिया होता। दोपहर दो बजे तक विद्रोहियों में ऐसी शूरता और देशभक्ति के पक्ष में भीरुता हो, यह कितना बड़ा दुर्भाग्य! दौड़ो, कोई तो आगे बढ़ो, इस दुर्भाग्य का कंठच्छेद करने दौड़ो दिन के पांच बजे हैं और आक्रमण लगभग विफल हो गया है। तथापि तत्कालीन विजय के लिए नही तो भी सर्वकालीन सफलता के लिए दौड़ो, कोई तो दौड़ो! कैप्टन सांडर्स-अब संभालो इस ध्येयनिष्ठों की दौड़ को। और यह क्रोधित यमों की टोली सीधे चली आ रही है। अंग्रेजों की गोलियों की परवाह न करते वह सीधी बढ़ रही है-वह उनकी दीवार से टकराकर उसे अपने सीने की टक्कर मार रही है-अंग्रेजों ने बंदूकें फेंककर इस आमने-सामने की लड़ाई में बैनेट ले ली-जय स्वतंत्रता! वाह रे वीर! उसने अपने हाथ से परकोटे के ऊपर से मार करनेवाली अंग्रेजी बैनेट को दबाकर छीन लिया। वाह रे वीर! उसने अपने हाथ से परकोटे के ऊपर से मार करनेवाली अंग्रेजी बैनेट को दबाकर छीन लिया। वाह रे वीर! अंत में शत्रु की गोली से गिर गया! स्वदेश की जितनी बच सके उतनी लाज बचाने को समरांगण में शत्रु पक्ष भी दांतों तले अंगुली दबाए, ऐसी शूरता दिखाकर शहादत के रक्त-तीर्थ में रक्त-समाधि ले गया। वह गिरा, दूसरा गिरा तीसरा भी गिरा, जोरदार लड़ाई हुई। बैनटों को अपने हाथों से झपटकर छीन लेनेवाले 1857 का स्वातंत्र्य समर - 290
और मृत्यु तक बेसुध लड़ते उन वीरों के रमणीय चित्र अंग्रेजी इतिहासकारों ने कौतुक से लिखे, ऐसी लड़ाई हुई। तारीख 18 को विद्रोहियों ने अंग्रेजों पर और एक आक्रमण किया। इस दिन भी पहले बारूदी सुरंग से रास्ता बनाया और बारूद की आवाज के साथ ही विद्रोही टूट पडत्रे। मैलसन लिखता है-"शत्रुओं ने यह रास्ता बनाते ही अत्यंत आवेश से उसका लाभ लेना प्रारंभ किया। उनमें के एक अति शूर अधिकारी ने उस भगदड़ के हिस्से में तुरंत छलांग लगा दी और अपनी तलवार घुमाते हुए अपने अनुयायियों को 'चलो-चलो कहकर आह्वान करने लगा। उसके आह्वान को कोई उत्तर दे उसके पूर्व ही एक गोली ने उसे नीचे गिरा दिया। परंतु उसी समय उसकी जगह दूसरा कूद पड़ा। उसे भी गोली ने नीचे गिराया। उस टुकड़ी का नेता भी गोली से गिरा। यह देखते ही बाकी के सिपाही दुबककर पीछे खिसके ।'' उपर्युक्त तीन वीरों का विदेशी व्यक्ति द्वारा वर्णित शौर्य दिल्ली में निकल्सन की ओर के साहस के मुकाबले का था। पर अनुयायियों के डरपोकपन से ऐसी शूरता विफल हो जाए और तीन सैनिक गिरने पर अधिक उन्माद से आगे घुसना छोड़कर हजारों लोग पीछे लौट पड़े-इस लज्जास्पद बात का गहरा तात्पर्य है। यद्यपि वे बार-बार लौटाए गए, तब भी बार-बार होनेवाले आक्रमण और हर दिन पड़नेवाली विद्रोहियों की तोपों और बंदूकों की अखंड मार के कारण अब अंग्रेजो को, अपने राजनिष्ठ नेटिवों की भारी सहायता होते हुए भी, टिके रहना असहनीय होता जा रहा था। इतने में अंगद फिर लखनऊ आ गया। पीछे दिए वचन के अनुसार हैवलॉक कितना पास आ गया है, यह अत्यंत उत्सुकता से अंग्रेज कमांडर जब उससे पूछने लगा तो अंगद ने हैवलॉक का पत्र दिया।128 “और लगभग पच्चीस दिन मैं लखनऊ की ओर नहीं आ सकता!'' आशा के बाद आई निराशा जैसा विष इस विश्व में कुद भी नहीं है। आज-कल में हैवलॉक आएगा, इस उत्सुकता का यह दुर्भागी उत्तर! मरते रोगी, अशक्त औरतें ही नहीं लड़ाके सोल्जर और अधिकार प्राप्त कमांडर-इन सबको भी बहुत खेद, उदासीनता और भय हुआ। घिरी हुई सारी आंग्ल सेना पर मृत्यु की छाया पड़ने लगी। अन्न महंगा हो गया और सबको आधे पेट रहने का आदेश हुआ। लखनऊ की मुक्ति के महान् कार्य में भी हैवलॉक जैसे योद्धा को यह विलंब क्यों करना पड़ रहा है। लखनऊ में बंद अपने देश बंधुओं को मुक्त करने में क्षण भर का भी विलंब न लगे, इसलिए 29 जुलाई को ही हैवलॉक कानपुर छोड़कर गंगा पार हो गया। उसके साथ डेढ़ हजार लोग और तेरह तोपें थी और इस सेना के साथ 'मैं पांच-छह दिन में तुम्हें मुक्त कर दूंगा, ऐसा उसने लखनऊ को आश्वास्ति भरा पत्र भी भेजा था।' परंतु गंगा नदी उतरकर अवध में पैर रखते ही हैवलॉक की यह काल्पनिक सुलभता ओस की तरह 1857 का स्वातंत्र्य समर – 291 128 चार्ल्स बाल, खंड 2 ।
पिघलने लगी। अवध के रास्ते का हर इंच विद्रोह कर उठा था। हर जमींदार पांच-छह सौ लोगों को इकट्ठा का स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने को तत्पर। हर गांव विद्रोहियों के झंडे की गढ़ी बना। ऐसी भयानक स्थिति देखकर हैवलॉक मन से उद्विग्न तो हो गया, पर वह निराश नहीं हुआ। उसने वैसे ही आगे कूच किया। उन्नाव के पास विद्रोहियों ने उसे पहली टक्कर दी। देकर वे आगे दौड़ गए। उन्नाव की लड़ाई लड़कर थके सैनिकों को हैवलॉक ने केवल भोजनाकाश दिया। भोजन निपटते ही फिर आगे कूच। फिर से आगे दौड़ जीती। परंतु यह जीत है क्या? इस एक दिन में उसकी मुट्ठी भर सेना का 6वां भाग समाप्त हुआ और विद्रोहियों का इस विजय से तिनका भी नहीं टूटा! अधिक क्या-परंतु लड़ाई शुरू होते ही मारधाड़ करके वे जो भाग जाते थे सचमुच अपनी पराजय के कारण या कम खर्च में अंग्रेजी सेना की नाक में दम करने की सुलभ युक्ति के कारण, यह भी शंका ही है। और उसी में दानापुर के सिपाहियों के विद्रोह का समाचार आ गया। यह भयानक परिस्थिति देखकर स्तंभित हैवलॉक तारीख 30 को आगे छोड़कर पीछे लौट गया। हैवलॉक की सेना ने कानपुर छोड़ दिया है, यह सुनते ही नाना साहब पेशवा ने फिर कानपुर में भीड़ जुटाई। हैवलॉक के कानपुर से गंगा उतरकर अवध में घुसते ही नाना अवध से गंगा उतर कानपुर में घुस रहे थे। कहीं नाना के इस लश्करी दांव में ने फंस जाएं, इस डर से हैवलॉक मंगलबड़ में 4 अगस्त तक बंधा पड़ा रहा। पांच-छह दिन में लखनऊ जाकर क्रांतिकारियों को गोमती का पानी पिलाने की जगह अब उसे नाना ही गंगा तीर पर पानी पिला रहा था। इतने में विद्रोही फिर से बशीरगंज दौड़ आए। तब उनके इस उद्दाम व्यवहार से चिढ़कर हैवलॉक जान की चिंता किए बिना और आई हुई नहीं कुमुक लेकर लखनऊ की ओर चला उसने बशीरगंज में विद्रोहियों से कुश्ती लड़ी, जहां से उसने उन्हें भगा दिया। फिर यह जय या पराजय? यह प्रश्न फिर सामने था। क्योंकि इस कुश्ती में हैवलॉक के तीन सौ लोग मारे गए। ऐसी हड्डी नरम हुई कि लखनऊ की ओर आगे न बढ़ते हुए अंग्रेजी सेना पीछे गंगा की ओर हटती गई। उस दिन शाम को उसके साथ निकले डेढ़ हज़ार में से केवल साढ़े आठ सौ लोग ही बाकी रहे। हैवलॉक 5 अगस्त को पीछे हटकर फिर से मंगलबड़ लौटा-यह सुनते ही विद्रोही फिर से बशीरगंज को कब्जे में लेकर बैठ गए। विद्रोहियों की इस सेना में अधिकतर सभ्य जमींदार लोग ही थे।129 “कल की लड़ाई में मरे अधिकतर जमींदार ही थे।“ अपनी स्वतंत्रता और अपने स्वराज्य के लिए मुलायम बिस्तर को छोड़कर इन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 292 129 के एवं मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 3, पृष्ठ 340 ।
जमींदारों ने कंटकाकीर्ण रणक्षेत्र का आश्रय लिया था। उनके इस साहस को देख अंग्रेजी इतिहासकार इन्नेस कहता है-‘कम-से-कम अवध के लोगों के प्रयासों को तो स्वातंत्र्य समर का ही स्वरूप प्राप्त हो गया था।’ हैवलॉक के चारों ओर विद्रोहियो की सेना के क्षितिज जैसे दांव-पेज चल रहे थे। ज्यों-ज्यों कोई आगे जाए, क्षितिज पीछे और पीछे हटता जाता है; पर वह पीछे हट गया, यह मानकर कोई अपनी जगह लौटे तो क्षितिज भी अपनी जगह लौटता दिखाई देता है। हैवलॉक के मंगलबड़ से पीछे हटते ही विद्रोही बशीरगंज में आ जाते। 11 अगस्त को तीसरी बार बशीरगंज पर हमला किया। तीसरी बार बशीरगंज जीता, तीसरी बार विद्रोही भाग गए, पर फिर हैवलॉक मन से पूछने लगा-‘यह जय है या पराजय?’ वह न केवल जय थी और न केवल पराजय ही थी-वह तो पराजय की विजय या विजय की पराजय थी। और इसलिए हैवलॉक आगे न जाकर फिर मंगलबड़ को लौट आया। इस बीच नाना का पेच पूरे रंग पर आता जा रहा था। सागर के विद्रोही, ग्वालियर के विद्रोही और अन्य स्वयंसेवक लोगों की टोलियां आदि सेना के साथ नाना बिठूर पर आक्रमण कर कानपुर में जमे जनरल नील में न होने से उसने यह आवश्यक बात हैवलॉक को सूचित की। अब लखनऊ की ओर जाने का नाम भी लेना असंभव था। इसलिए 12 अगस्त को हैवलॉक गंगा उतरकर कानपुर लौट आया। अंग्रेजी सेना के पीछे हट जाने के समाचार का बिगुल जब अवध ने सुना तो मानो इधर-उधर स्वदेश मुक्ति की जय-दुदुंभि गरज रही है-ऐसा हर्ष ध्वनि से जयनाद होने लगा। अवध के दरवाजे में घुसना चाहती परवशता को इस तरह गंगा पार भगाकर धारातीर्थ में रक्त समाधि लिये विश्वसनीय जमींदारो, तुमने स्वदेश की जमीन की अच्छी जमींदारी की। इन्नेस लिखता है-‘इस पीछे लौटने का निश्चित परिणाम दिखा। अवध से फिरंगी शासन समाप्त होने की यह अंग्रेजों की दी हुई स्वीकृति है-ऐसा कहते हुए वहां के तालुकेदारों ने लखनऊ दरबार की प्रस्थापित राज्यसत्ता का अधिकार मान्य किया। उनके आदेश वे मानने लगे। आज तक की निरंकुशता समाप्त होने लगी और लखनऊ की मांग के अनुसार भिन्न-भिन्न राजे अपनी सेनाएं उधर युद्धभूमि की ओर भेजने लगे।’130 पर विद्रोहियों को मिली यह विजय प्रत्यक्ष विजय नहीं, अप्रत्यक्ष विजय थी। हैवलॉक द्वारा लड़ी गई चार-पांच लड़ाइयों में वह प्रत्यक्ष पराजित होकर यदि कानपुर लौटा होता तो उसकी नाकेबंदी कर भगा देने से विद्रोहियों में जो उत्साह आया उससे अधिक दृढ़तर आत्मविश्वास उसकी सेना में और धैर्यच्युति का प्रभाव अंग्रेजी सेना में उत्पन्न हुआ होता। यद्यपि वह कानपुर में पीछे हटने को बाध्य हुआ, परंतु उस अपमान 1857 का स्वातंत्र्य समर - 293 130 इन्नेस कृत-‘सेपॉइज रिवॉल्ट’, पृष्ठ 174 ।
का कारण शौर्य का अभाव नहीं, सैन्याभाव है, यह समझ में आ जाने से अंग्रेजी सेना की आशा विफल हुई; लेकिन आत्मनिष्ठा, जोश और दृढ़ता उस अप्रत्यक्ष पराजय से कम नहीं हुए थे, इसलिए गोरी सेना की नई कुसुम आते ही-लखनऊ को मुक्त करने मैं जल्दी ही फिर निकलूंगा-इस हिम्मत से हैवलॉक कानपुर में जमा। इस समय नील और हैवलॉक में व्यक्तिगत मत्सर से कितना वैर हो गया था, हैवलॉक के नील को लिखे इस पत्र से स्पष्ट दिख जाता है-'इस तरह का व्यवहार आगे सहन नहीं किया जाएगा। आप मुझे निंदा, धौंस और उपदेश से भरे पत्र लिखते हैं; परंतु इनमें से एक भी बात कोई मेरे अधीनस्थ अधिकारी मुझे कहे, यह सहन करनेवाला आदमी मैं नहीं! आप यह समझकर रखें। यदि सार्वजनिक हित को कोई बाधा न पहुंचती तो मैं आपको कैद करने से नहीं चूकतां अभी आपको केवल आगाह कर रहा हूं, फिर से ऐसा बड़प्पन नहीं चलेगा।'' इस पत्र का एक वाक्य अंग्रेजों की रग-रग में समाए राष्ट्र-कर्तव्य का अत्युत्तम द्योतक हैं गुस्से से उबलते हुए भी हैवलॉक कहता है-'लोकहित में कोई बाधा न पहुंचती तो मैंने अपने अपमान का प्रतिशोध तत्काल लिया होता।' नील तथा हैवलॉक-दोनों रणपटु योद्धाओं ने ऐन संकट के समय उत्पन्न हुए आपसी झगड़े से शत्रु के ध्यान में आ जाए या उसे लाभ मिले, ऐसी एक भी घटिया कृति नहीं की। इतना ही नहीं अपितु लश्करी संबंधों के अनुसार पूरे अनुशासन में रहकर एक-दूसरे की सहायता भी की थी। हाथी समान व्यक्ति के मदमलिन मस्तक पर राष्ट्रीयता का यह तीक्ष्ण अंकुश जहां गड़ा रहता है उसी समाज में श्री, धी, धृति, कीर्ति, स्वतंत्रता वास करती है। कानपुर शहर में आते ही हैवलॉक को पहला समाचार यह ज्ञात हुआ कि नाना साहब की सेना ने ब्रह्मवर्त शहर पर फिर से कब्जा कर लिया है। कानपुर शहर की अंग्रेजी सेना के कंधे से कंधा भिड़ाकर विद्रोहियों द्वारा दी गई यह भयंकर शह देखते ही हैवलॉक सेना सहित उधर दौड़ पड़ा। उस दिन ब्रह्मवर्त में हुई लड़ाई में विद्रोहियों की 42वीं रेजिमेंट ने अंग्रेजी सेना के लड़ते-लड़ते बीस गज तक आते ही बैनेट लेकर लड़ना प्रारंभ किया। आज तक अंग्रेज लोग विद्रोहियों को डराने के लिए बैनेट को अंतिम साधन समझते थे। पर आज उन शूर स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वयं ही फिरंगियों पर बैनेट चलाकर घमासान मचा दिया। इसी समय विद्रोहियों के घुड़सवारों ने अंग्रेजों की पिछाड़ी पर टूटकर उनकी रसद मार दी। इस तरह पीछे और आगे से अंग्रेजी सेना को विद्रोहियों ने मारा। अंग्रेजी कमांडर की समझ में भी यह आया कि दिन-ब-दिन विद्रोहियों का समर साहस बढ़ता ही जा रहा है। ब्रह्मवर्त की लड़ाई में इस सारे पराक्रम के बाद भी पराजय लेकर पीछे हटना पड़ा। 17 अगस्त को विद्रोहियों को पराजित कर हैवलॉक पीछे कानपुर लौटा तो उसे यह ध्यान में आया कि नाना ने पूरी सेना ब्रह्मवर्त में नहीं रखी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 294