भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 418 में से

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पृष्ठ 288

जमींदारों ने कंटकाकीर्ण रणक्षेत्र का आश्रय लिया था। उनके इस साहस को देख अंग्रेजी इतिहासकार इन्नेस कहता है-‘कम-से-कम अवध के लोगों के प्रयासों को तो स्वातंत्र्य समर का ही स्वरूप प्राप्त हो गया था।’ हैवलॉक के चारों ओर विद्रोहियो की सेना के क्षितिज जैसे दांव-पेज चल रहे थे। ज्यों-ज्यों कोई आगे जाए, क्षितिज पीछे और पीछे हटता जाता है; पर वह पीछे हट गया, यह मानकर कोई अपनी जगह लौटे तो क्षितिज भी अपनी जगह लौटता दिखाई देता है। हैवलॉक के मंगलबड़ से पीछे हटते ही विद्रोही बशीरगंज में आ जाते। 11 अगस्त को तीसरी बार बशीरगंज पर हमला किया। तीसरी बार बशीरगंज जीता, तीसरी बार विद्रोही भाग गए, पर फिर हैवलॉक मन से पूछने लगा-‘यह जय है या पराजय?’ वह न केवल जय थी और न केवल पराजय ही थी-वह तो पराजय की विजय या विजय की पराजय थी। और इसलिए हैवलॉक आगे न जाकर फिर मंगलबड़ को लौट आया। इस बीच नाना का पेच पूरे रंग पर आता जा रहा था। सागर के विद्रोही, ग्वालियर के विद्रोही और अन्य स्वयंसेवक लोगों की टोलियां आदि सेना के साथ नाना बिठूर पर आक्रमण कर कानपुर में जमे जनरल नील में न होने से उसने यह आवश्यक बात हैवलॉक को सूचित की। अब लखनऊ की ओर जाने का नाम भी लेना असंभव था। इसलिए 12 अगस्त को हैवलॉक गंगा उतरकर कानपुर लौट आया। अंग्रेजी सेना के पीछे हट जाने के समाचार का बिगुल जब अवध ने सुना तो मानो इधर-उधर स्वदेश मुक्ति की जय-दुदुंभि गरज रही है-ऐसा हर्ष ध्वनि से जयनाद होने लगा। अवध के दरवाजे में घुसना चाहती परवशता को इस तरह गंगा पार भगाकर धारातीर्थ में रक्त समाधि लिये विश्वसनीय जमींदारो, तुमने स्वदेश की जमीन की अच्छी जमींदारी की। इन्नेस लिखता है-‘इस पीछे लौटने का निश्चित परिणाम दिखा। अवध से फिरंगी शासन समाप्त होने की यह अंग्रेजों की दी हुई स्वीकृति है-ऐसा कहते हुए वहां के तालुकेदारों ने लखनऊ दरबार की प्रस्थापित राज्यसत्ता का अधिकार मान्य किया। उनके आदेश वे मानने लगे। आज तक की निरंकुशता समाप्त होने लगी और लखनऊ की मांग के अनुसार भिन्न-भिन्न राजे अपनी सेनाएं उधर युद्धभूमि की ओर भेजने लगे।’130 पर विद्रोहियों को मिली यह विजय प्रत्यक्ष विजय नहीं, अप्रत्यक्ष विजय थी। हैवलॉक द्वारा लड़ी गई चार-पांच लड़ाइयों में वह प्रत्यक्ष पराजित होकर यदि कानपुर लौटा होता तो उसकी नाकेबंदी कर भगा देने से विद्रोहियों में जो उत्साह आया उससे अधिक दृढ़तर आत्मविश्वास उसकी सेना में और धैर्यच्युति का प्रभाव अंग्रेजी सेना में उत्पन्न हुआ होता। यद्यपि वह कानपुर में पीछे हटने को बाध्य हुआ, परंतु उस अपमान 1857 का स्वातंत्र्य समर - 293 130 इन्नेस कृत-‘सेपॉइज रिवॉल्ट’, पृष्ठ 174 ।

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