१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपिघलने लगी। अवध के रास्ते का हर इंच विद्रोह कर उठा था। हर जमींदार पांच-छह सौ लोगों को इकट्ठा का स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने को तत्पर। हर गांव विद्रोहियों के झंडे की गढ़ी बना। ऐसी भयानक स्थिति देखकर हैवलॉक मन से उद्विग्न तो हो गया, पर वह निराश नहीं हुआ। उसने वैसे ही आगे कूच किया। उन्नाव के पास विद्रोहियों ने उसे पहली टक्कर दी। देकर वे आगे दौड़ गए। उन्नाव की लड़ाई लड़कर थके सैनिकों को हैवलॉक ने केवल भोजनाकाश दिया। भोजन निपटते ही फिर आगे कूच। फिर से आगे दौड़ जीती। परंतु यह जीत है क्या? इस एक दिन में उसकी मुट्ठी भर सेना का 6वां भाग समाप्त हुआ और विद्रोहियों का इस विजय से तिनका भी नहीं टूटा! अधिक क्या-परंतु लड़ाई शुरू होते ही मारधाड़ करके वे जो भाग जाते थे सचमुच अपनी पराजय के कारण या कम खर्च में अंग्रेजी सेना की नाक में दम करने की सुलभ युक्ति के कारण, यह भी शंका ही है। और उसी में दानापुर के सिपाहियों के विद्रोह का समाचार आ गया। यह भयानक परिस्थिति देखकर स्तंभित हैवलॉक तारीख 30 को आगे छोड़कर पीछे लौट गया। हैवलॉक की सेना ने कानपुर छोड़ दिया है, यह सुनते ही नाना साहब पेशवा ने फिर कानपुर में भीड़ जुटाई। हैवलॉक के कानपुर से गंगा उतरकर अवध में घुसते ही नाना अवध से गंगा उतर कानपुर में घुस रहे थे। कहीं नाना के इस लश्करी दांव में ने फंस जाएं, इस डर से हैवलॉक मंगलबड़ में 4 अगस्त तक बंधा पड़ा रहा। पांच-छह दिन में लखनऊ जाकर क्रांतिकारियों को गोमती का पानी पिलाने की जगह अब उसे नाना ही गंगा तीर पर पानी पिला रहा था। इतने में विद्रोही फिर से बशीरगंज दौड़ आए। तब उनके इस उद्दाम व्यवहार से चिढ़कर हैवलॉक जान की चिंता किए बिना और आई हुई नहीं कुमुक लेकर लखनऊ की ओर चला उसने बशीरगंज में विद्रोहियों से कुश्ती लड़ी, जहां से उसने उन्हें भगा दिया। फिर यह जय या पराजय? यह प्रश्न फिर सामने था। क्योंकि इस कुश्ती में हैवलॉक के तीन सौ लोग मारे गए। ऐसी हड्डी नरम हुई कि लखनऊ की ओर आगे न बढ़ते हुए अंग्रेजी सेना पीछे गंगा की ओर हटती गई। उस दिन शाम को उसके साथ निकले डेढ़ हज़ार में से केवल साढ़े आठ सौ लोग ही बाकी रहे। हैवलॉक 5 अगस्त को पीछे हटकर फिर से मंगलबड़ लौटा-यह सुनते ही विद्रोही फिर से बशीरगंज को कब्जे में लेकर बैठ गए। विद्रोहियों की इस सेना में अधिकतर सभ्य जमींदार लोग ही थे।129 “कल की लड़ाई में मरे अधिकतर जमींदार ही थे।“ अपनी स्वतंत्रता और अपने स्वराज्य के लिए मुलायम बिस्तर को छोड़कर इन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 292 129 के एवं मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 3, पृष्ठ 340 ।