भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 418 में से

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पृष्ठ 286

और मृत्यु तक बेसुध लड़ते उन वीरों के रमणीय चित्र अंग्रेजी इतिहासकारों ने कौतुक से लिखे, ऐसी लड़ाई हुई। तारीख 18 को विद्रोहियों ने अंग्रेजों पर और एक आक्रमण किया। इस दिन भी पहले बारूदी सुरंग से रास्ता बनाया और बारूद की आवाज के साथ ही विद्रोही टूट पडत्रे। मैलसन लिखता है-"शत्रुओं ने यह रास्ता बनाते ही अत्यंत आवेश से उसका लाभ लेना प्रारंभ किया। उनमें के एक अति शूर अधिकारी ने उस भगदड़ के हिस्से में तुरंत छलांग लगा दी और अपनी तलवार घुमाते हुए अपने अनुयायियों को 'चलो-चलो कहकर आह्वान करने लगा। उसके आह्वान को कोई उत्तर दे उसके पूर्व ही एक गोली ने उसे नीचे गिरा दिया। परंतु उसी समय उसकी जगह दूसरा कूद पड़ा। उसे भी गोली ने नीचे गिराया। उस टुकड़ी का नेता भी गोली से गिरा। यह देखते ही बाकी के सिपाही दुबककर पीछे खिसके ।'' उपर्युक्त तीन वीरों का विदेशी व्यक्ति द्वारा वर्णित शौर्य दिल्ली में निकल्सन की ओर के साहस के मुकाबले का था। पर अनुयायियों के डरपोकपन से ऐसी शूरता विफल हो जाए और तीन सैनिक गिरने पर अधिक उन्माद से आगे घुसना छोड़कर हजारों लोग पीछे लौट पड़े-इस लज्जास्पद बात का गहरा तात्पर्य है। यद्यपि वे बार-बार लौटाए गए, तब भी बार-बार होनेवाले आक्रमण और हर दिन पड़नेवाली विद्रोहियों की तोपों और बंदूकों की अखंड मार के कारण अब अंग्रेजो को, अपने राजनिष्ठ नेटिवों की भारी सहायता होते हुए भी, टिके रहना असहनीय होता जा रहा था। इतने में अंगद फिर लखनऊ आ गया। पीछे दिए वचन के अनुसार हैवलॉक कितना पास आ गया है, यह अत्यंत उत्सुकता से अंग्रेज कमांडर जब उससे पूछने लगा तो अंगद ने हैवलॉक का पत्र दिया।128 “और लगभग पच्चीस दिन मैं लखनऊ की ओर नहीं आ सकता!'' आशा के बाद आई निराशा जैसा विष इस विश्व में कुद भी नहीं है। आज-कल में हैवलॉक आएगा, इस उत्सुकता का यह दुर्भागी उत्तर! मरते रोगी, अशक्त औरतें ही नहीं लड़ाके सोल्जर और अधिकार प्राप्त कमांडर-इन सबको भी बहुत खेद, उदासीनता और भय हुआ। घिरी हुई सारी आंग्ल सेना पर मृत्यु की छाया पड़ने लगी। अन्न महंगा हो गया और सबको आधे पेट रहने का आदेश हुआ। लखनऊ की मुक्ति के महान् कार्य में भी हैवलॉक जैसे योद्धा को यह विलंब क्यों करना पड़ रहा है। लखनऊ में बंद अपने देश बंधुओं को मुक्त करने में क्षण भर का भी विलंब न लगे, इसलिए 29 जुलाई को ही हैवलॉक कानपुर छोड़कर गंगा पार हो गया। उसके साथ डेढ़ हजार लोग और तेरह तोपें थी और इस सेना के साथ 'मैं पांच-छह दिन में तुम्हें मुक्त कर दूंगा, ऐसा उसने लखनऊ को आश्वास्ति भरा पत्र भी भेजा था।' परंतु गंगा नदी उतरकर अवध में पैर रखते ही हैवलॉक की यह काल्पनिक सुलभता ओस की तरह 1857 का स्वातंत्र्य समर – 291 128 चार्ल्स बाल, खंड 2 ।

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