१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 282, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंसामने नहीं आया। निर्विवाद सिद्ध राजपुरुषों को ही वंश परंपरागत रूप से लोकसम्मत सिंहासन पर बैठाया गया था। इन सब राजपुरुषों ने इस क्रांति का बेजा फायदा लेकर अपने पूर्वार्जित अधिकार बढ़ाने के लिए कोई स्वार्थ नहीं दर्शाया था। इतना ही नहीं, उसके विपरीत अपने कारण देश की स्वतंत्रता के उस महान् समर को अपयश से बचाने हेतु जहां संभव हुआ वे अपने पहले के अधिकार छोड़ देने के लिए भी तैयार हो गए, इसके लिखित साक्ष्य प्रकाशित हैं। यहां तक राज्य व्यवस्था का पूर्वार्ध सराहनीय उदात्तता से सन् 1857 ने पूरा किया। परंतु राज्य व्यवस्था में अत्यंत प्रमुख भाग सैन्य शक्ति-संपन्न लोगों का होने के कारण पर-राज्य बंधन तोड़ते ही उन्हें किसी तरह के बंधन स्वीकार्य न हुए और राज्य क्रांति की इस भीड़ में उनका सारा अनुशासन बिगड़ गया। इस कारण स्वराज्य चेतना की पहली पवित्र लहर में स्वयं ही नियुक्त किए अधिकारियों के सामने वे स्वयं अपमान, अवज्ञा और उपहास भी करने लगे तथा राज्य क्रांति का अंत अराजकता में होने लगा। ऐसी स्थिति में उनके स्वार्थ से दूषित हुई सिद्धांतनिष्ठा को अपने व्यक्तिनिष्ठा के ऐश्वर्य के शुद्ध करके अपने पराक्रम के दिव्यत्व से उनका मनोहररण करके जो उन्हें फिर से स्वराज्य व्यवस्था के अनुशासन पर ला बैठाए, ऐसे विलक्षण नेता भी कुछ दिव्य अपवाद छोड़कर-इन अधिकारियों में उत्पन्न नहीं हुए। इस कारण बहुत से स्थानों पर क्रांति पक्ष के शिविर में संगठित सेना की जगह व्यर्थ लोग ही अधिक भरे हुए होते थे। ये तो फालतू लोग थे और उन्होंने ही इस क्रांतियुद्ध को अपजयी बनाया। क्रांतिकारियों में जो शूर, स्वार्थ-त्यागी स्वातंत्र्य समर में कदम रखने लायक पवित्र चरित्र थे उन्होंने यह युद्ध तीन वर्ष तक लड़ा। लखनऊ का छावनी में इस दूसरे उच्च वर्ग की अपेक्षा पहले वर्ग अर्थात् फालतू लोगों की ही भरती अधिक होने से बेगम हजरत महल के दरबार से नियुक्त भिन्न-भिन्न अधिकारियों के आदेश कभी भी नहीं माने जाते थे और सिपाही लोग बेमुरव्वत, अत्याचारी, अनुशासनहीन और स्वंच्छंद व्यवहार करते थे। इस पहले वर्ग की संख्या यद्यपि बड़ी थी फिर भी दूसरे वर्ग के जो थोड़े लोग उनमें थे उनके शूरत्व और उदात्त विचारों के प्राकृतिक तेज से उन्हीं का प्रभाव सिपाहियों पर अधिक होता था और ऐसे दृढ़ निश्चयी लोगों के आग्रह के अनुसार 20 जुलाई को रेसीडेंसी में बंद अंग्रेजों पर पहला भारी हमला करने की योजना बनी। 20 जुलाई को प्रातःकाल अंग्रेजी पर दागी जा रही विद्रोहियों की तोपें पूरी तरह बंद हो गईं। सुबह आठ बजे के आसपास अंग्रेजी रेसीडेंसी के पास विद्रोहियों द्वारा लगाई बारूद धमाके से फूटते ही विद्रोहियों की सेना हमला करने के लिए जोर से उछली। उसी समय उनकी तोपों पर भिन्न-भिन्न दिशाओं से विद्रोहियों के सेना अंग्रेजों पर टूट पड़ी। उस सेना के जिस भाग ने कानपुर बैटरी पर हमला किया 1857 का स्वातंत्र्य समर – 287