१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंथा उसके सैनिकों ने अंग्रेजी तोपों पर निडर होकर हमला किया। 'चलो बहादुर, चलो! चलो बहादुर, चलो!' ऐसी गर्जना करते वे फिर-फिर उन तोपों पर चढ़ जाते। जिनके हाथों में उनका स्वराज्य ध्वज फहरा रहा था उनके वीर्यवर नायक ने स्वयं वह झंडा ऊंचा उठाकर दौड़ते हुए उस तोपखाने की खंदक में छलांग लगा दी और दूसरों को-'चलो, आगे बढ़ो' का आह्वान करता वह खंदक लांघकर अंग्रेजी तोप पर अपना क्रांतिध्वज गाड़ने लगा। परंतु इस विलक्षण साहसी पुरुष को अंग्रेजों की गोली ने तत्काल चित कर दिया। ऐसे समय उस एक शव के पीछे हजारों को आग बढ़ाना छोड़कर और जिस हेतु वह धर्मवीर गिरा उस रिपु रक्त-भाजन की मृत्यु को सार्थक न करते हुए उसे मरता देख विद्रोही आगे बढ़ने की बजाय पीछे हटने लगे। फिर भी, शाबाश सीढ़ीवाले! इन बाजारू लोगों की तरह पीछे न भागते हुए तुम आगे बढ़ रहे हो। लगाओ उन सीढ़िवालों! इन बाजारू लोगों की तरह पीछे न भागते हुए तुम आगे बढ़ रहे हो। लगाओ उन सीढ़ियों को खंदक में! फिरंगी गोलियों की वर्षा में चढ़ो फटाफट उन सीढ़ियों पर-पहला सीढ़ियों पर चढ़ा-गिरा! चलो, दूसरा आगे बढ़ो! पर दूसरा कौन आगे बढ़ेगा? यही तो अंग्रेजी सेना और विद्रोहियों में भेद है। अंग्रेज मृतक का रक्त उसके अनुयायी यों ही नहीं बह जाने देते। एक गिरा, दस आगे, यह उनकी रीत-एक गिरा तो दस पीछे यह हमारी रीत। पीछे आनेवाले कहीं भी पड़ें पर आगे जानेवालो, तुम निश्चित ही स्वर्ग में जाओगे। स्वराज्य का झंडा डरपोक लोगों की जीवित मृत्यु से गंदा न हो, इसलिए उसे हाथ में लेकर जिन्होंने शत्रु की आग उगलती तोपों पर उसे लगाना आरंभ किया, ऐसे दिव्य भमीकर्मियों, तुम्हारे रक्त से वह झंडा हमेशा शुद्ध, सतेज और पवित्रता के साथ दमकता रहे। सचमुच ऐसी ही रक्त-रंजित भुजाओं में स्वतंत्रता का झंडा खिलता है। जिनके पास रक्तरंजित होनेवाली कलाइयां न हों, उनके हाथ ऐसे स्वतंत्रता के ध्वज को स्पर्श कर विजय के बदले उस ध्वज को लांछित अवश कर देते हैं। यह पहला हमला लौट आने पर अंग्रेजी सेना से विद्रोही रोजाना छोटी-छोटी भिड़त करते रहे। उन्होंने रेसीडेंसी के घरों को बारूद लगाकर उड़ा देने का प्रयास बहुत दृढ़ता से चलाया हुआ था। ऊपर से तोपों की मार और नीचे से बारूद की ज्वाला का विस्फोट। अपने पैर के नीचे की भूमि कब जबड़ा खोलकर गटक लेगी, इसका अंग्रेजों को कोई विश्वास न था। ब्रिगेडियर इन्नेस के अनुसार-'विद्रोहियों ने कुल मिलाकर छत्तीस बार बारूद लगया था। विद्रोहियों की तोपे भी अखंड मार करती रहीं। आसपास छिपी जगहों से सिपाहियों की बंदूकों से छूटती अचूक गोलियां, अंग्रेजों की ओर से आती जवाबी गोलियां, एक-दूसरे के शिविरों से गुप्त जानकारी लाने के लिए रात के अंधियारे में निकली टोलियों की प्राणघाती कुश्तियां, परकोटे के अंदर और बाहर कान में बातें करते लोगों की करतूतें। दूसरी ओर छिपे बैठे दूसरे पक्ष ने बातें सुनीं, यह समझते ही अपमान होता। अंग्रेजों के झंडे पर गोला फेंक उसे गिराकर होता विद्रोहियों का मनोरंजन तो रात होते ही फिर से नया झंडा रेसीडेंसी पर फहराने की अंग्रेजी जिद। युद्ध के इस 1857 का स्वातंत्र्य समर - 288