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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

सामने नहीं आया। निर्विवाद सिद्ध राजपुरुषों को ही वंश परंपरागत रूप से लोकसम्मत सिंहासन पर बैठाया गया था। इन सब राजपुरुषों ने इस क्रांति का बेजा फायदा लेकर अपने पूर्वार्जित अधिकार बढ़ाने के लिए कोई स्वार्थ नहीं दर्शाया था। इतना ही नहीं, उसके विपरीत अपने कारण देश की स्वतंत्रता के उस महान् समर को अपयश से बचाने हेतु जहां संभव हुआ वे अपने पहले के अधिकार छोड़ देने के लिए भी तैयार हो गए, इसके लिखित साक्ष्य प्रकाशित हैं। यहां तक राज्य व्यवस्था का पूर्वार्ध सराहनीय उदात्तता से सन् 1857 ने पूरा किया। परंतु राज्य व्यवस्था में अत्यंत प्रमुख भाग सैन्य शक्ति-संपन्न लोगों का होने के कारण पर-राज्य बंधन तोड़ते ही उन्हें किसी तरह के बंधन स्वीकार्य न हुए और राज्य क्रांति की इस भीड़ में उनका सारा अनुशासन बिगड़ गया। इस कारण स्वराज्य चेतना की पहली पवित्र लहर में स्वयं ही नियुक्त किए अधिकारियों के सामने वे स्वयं अपमान, अवज्ञा और उपहास भी करने लगे तथा राज्य क्रांति का अंत अराजकता में होने लगा। ऐसी स्थिति में उनके स्वार्थ से दूषित हुई सिद्धांतनिष्ठा को अपने व्यक्तिनिष्ठा के ऐश्वर्य के शुद्ध करके अपने पराक्रम के दिव्यत्व से उनका मनोहररण करके जो उन्हें फिर से स्वराज्य व्यवस्था के अनुशासन पर ला बैठाए, ऐसे विलक्षण नेता भी कुछ दिव्य अपवाद छोड़कर-इन अधिकारियों में उत्पन्न नहीं हुए। इस कारण बहुत से स्थानों पर क्रांति पक्ष के शिविर में संगठित सेना की जगह व्यर्थ लोग ही अधिक भरे हुए होते थे। ये तो फालतू लोग थे और उन्होंने ही इस क्रांतियुद्ध को अपजयी बनाया। क्रांतिकारियों में जो शूर, स्वार्थ-त्यागी स्वातंत्र्य समर में कदम रखने लायक पवित्र चरित्र थे उन्होंने यह युद्ध तीन वर्ष तक लड़ा। लखनऊ का छावनी में इस दूसरे उच्च वर्ग की अपेक्षा पहले वर्ग अर्थात् फालतू लोगों की ही भरती अधिक होने से बेगम हजरत महल के दरबार से नियुक्त भिन्न-भिन्न अधिकारियों के आदेश कभी भी नहीं माने जाते थे और सिपाही लोग बेमुरव्वत, अत्याचारी, अनुशासनहीन और स्वंच्छंद व्यवहार करते थे। इस पहले वर्ग की संख्या यद्यपि बड़ी थी फिर भी दूसरे वर्ग के जो थोड़े लोग उनमें थे उनके शूरत्व और उदात्त विचारों के प्राकृतिक तेज से उन्हीं का प्रभाव सिपाहियों पर अधिक होता था और ऐसे दृढ़ निश्चयी लोगों के आग्रह के अनुसार 20 जुलाई को रेसीडेंसी में बंद अंग्रेजों पर पहला भारी हमला करने की योजना बनी। 20 जुलाई को प्रातःकाल अंग्रेजी पर दागी जा रही विद्रोहियों की तोपें पूरी तरह बंद हो गईं। सुबह आठ बजे के आसपास अंग्रेजी रेसीडेंसी के पास विद्रोहियों द्वारा लगाई बारूद धमाके से फूटते ही विद्रोहियों की सेना हमला करने के लिए जोर से उछली। उसी समय उनकी तोपों पर भिन्न-भिन्न दिशाओं से विद्रोहियों के सेना अंग्रेजों पर टूट पड़ी। उस सेना के जिस भाग ने कानपुर बैटरी पर हमला किया 1857 का स्वातंत्र्य समर – 287

था उसके सैनिकों ने अंग्रेजी तोपों पर निडर होकर हमला किया। 'चलो बहादुर, चलो! चलो बहादुर, चलो!' ऐसी गर्जना करते वे फिर-फिर उन तोपों पर चढ़ जाते। जिनके हाथों में उनका स्वराज्य ध्वज फहरा रहा था उनके वीर्यवर नायक ने स्वयं वह झंडा ऊंचा उठाकर दौड़ते हुए उस तोपखाने की खंदक में छलांग लगा दी और दूसरों को-'चलो, आगे बढ़ो' का आह्वान करता वह खंदक लांघकर अंग्रेजी तोप पर अपना क्रांतिध्वज गाड़ने लगा। परंतु इस विलक्षण साहसी पुरुष को अंग्रेजों की गोली ने तत्काल चित कर दिया। ऐसे समय उस एक शव के पीछे हजारों को आग बढ़ाना छोड़कर और जिस हेतु वह धर्मवीर गिरा उस रिपु रक्त-भाजन की मृत्यु को सार्थक न करते हुए उसे मरता देख विद्रोही आगे बढ़ने की बजाय पीछे हटने लगे। फिर भी, शाबाश सीढ़ीवाले! इन बाजारू लोगों की तरह पीछे न भागते हुए तुम आगे बढ़ रहे हो। लगाओ उन सीढ़िवालों! इन बाजारू लोगों की तरह पीछे न भागते हुए तुम आगे बढ़ रहे हो। लगाओ उन सीढ़ियों को खंदक में! फिरंगी गोलियों की वर्षा में चढ़ो फटाफट उन सीढ़ियों पर-पहला सीढ़ियों पर चढ़ा-गिरा! चलो, दूसरा आगे बढ़ो! पर दूसरा कौन आगे बढ़ेगा? यही तो अंग्रेजी सेना और विद्रोहियों में भेद है। अंग्रेज मृतक का रक्त उसके अनुयायी यों ही नहीं बह जाने देते। एक गिरा, दस आगे, यह उनकी रीत-एक गिरा तो दस पीछे यह हमारी रीत। पीछे आनेवाले कहीं भी पड़ें पर आगे जानेवालो, तुम निश्चित ही स्वर्ग में जाओगे। स्वराज्य का झंडा डरपोक लोगों की जीवित मृत्यु से गंदा न हो, इसलिए उसे हाथ में लेकर जिन्होंने शत्रु की आग उगलती तोपों पर उसे लगाना आरंभ किया, ऐसे दिव्य भमीकर्मियों, तुम्हारे रक्त से वह झंडा हमेशा शुद्ध, सतेज और पवित्रता के साथ दमकता रहे। सचमुच ऐसी ही रक्त-रंजित भुजाओं में स्वतंत्रता का झंडा खिलता है। जिनके पास रक्तरंजित होनेवाली कलाइयां न हों, उनके हाथ ऐसे स्वतंत्रता के ध्वज को स्पर्श कर विजय के बदले उस ध्वज को लांछित अवश कर देते हैं। यह पहला हमला लौट आने पर अंग्रेजी सेना से विद्रोही रोजाना छोटी-छोटी भिड़त करते रहे। उन्होंने रेसीडेंसी के घरों को बारूद लगाकर उड़ा देने का प्रयास बहुत दृढ़ता से चलाया हुआ था। ऊपर से तोपों की मार और नीचे से बारूद की ज्वाला का विस्फोट। अपने पैर के नीचे की भूमि कब जबड़ा खोलकर गटक लेगी, इसका अंग्रेजों को कोई विश्वास न था। ब्रिगेडियर इन्नेस के अनुसार-'विद्रोहियों ने कुल मिलाकर छत्तीस बार बारूद लगया था। विद्रोहियों की तोपे भी अखंड मार करती रहीं। आसपास छिपी जगहों से सिपाहियों की बंदूकों से छूटती अचूक गोलियां, अंग्रेजों की ओर से आती जवाबी गोलियां, एक-दूसरे के शिविरों से गुप्त जानकारी लाने के लिए रात के अंधियारे में निकली टोलियों की प्राणघाती कुश्तियां, परकोटे के अंदर और बाहर कान में बातें करते लोगों की करतूतें। दूसरी ओर छिपे बैठे दूसरे पक्ष ने बातें सुनीं, यह समझते ही अपमान होता। अंग्रेजों के झंडे पर गोला फेंक उसे गिराकर होता विद्रोहियों का मनोरंजन तो रात होते ही फिर से नया झंडा रेसीडेंसी पर फहराने की अंग्रेजी जिद। युद्ध के इस 1857 का स्वातंत्र्य समर - 288

भीषण उपहास से लखनऊ की रणभूमि कभी-कभी जोरों से हंसती भी थी।“ पर अंग्रेजों की ओर के नेटिव सिपाहियों ने जो शूरता दिखाई उसे देखकर रणांगण के भूत-पिशाच जितने हंसे उतना बीभत्स हास्य रस कभी भी उत्पन्न न हुआ होगा। हर दिन रात को विद्रोहियों के दूत सिखों या अन्य नेटिव लोगों के अधीन परकोटे की ओर छिपते हुए जाते और उनसे पूछते कि तुम स्वदेश से नमकहरामी कर फिरंगियों की तलवार को मां के पेट में क्यों ठूस रहे हो? विद्रोहियों की ओर से यह प्रश्न कभी अधिक ही गंभीरता से पूछा जाता तो बीच में ही थोड़ा मजा कर लेने के लिए तटबंदी के राजनिष्ठ नेटिव कहते—'किंचत् पास आओ तो कह सकें!'' और वे पास जाते तो किसी छिपाए हुए गोरे साहब को वे आगे कर देते। ऐसा दगा देखकर विद्रोही लज्जित होकर निकल जातें विद्रोहियों के जो अचूक और विविश्रांत बंदूकबाज थे उन सबमें अवध के भूतपूर्व नवाब का एक अफ्रीकन खोजा अंग्रेजों की रेसीडेंसी में बहुत खलबली मचाए हुए था। उसे अंग्रेज 'ओथेलो' कहते थे। चार्ल्स बॉल लिखता है—“जोहांस के घर पर बैठकर यह अफ्रीकी खोजा दिन-रात गोलियां दागता रहता था। उसके अचूक निशाने और प्राणहारी गोलियों से यूरोपियन लोग चटपट मरते थे। विद्रोहियों की ओर से किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में इस खोजा ने अधिक यूरोपियनों के प्राण लिये।“ सर हेनरी लॉरेंस के मारे जाने पर अवध ने मार डाला। अंग्रेजों का यह दूसरा चीफ कमिश्नर लखनऊ के घेरे में मारा गया। परंतु 'घेरे' जैसी अनिश्चित भयंकरता में भी उनकी सेना की आधारभूत नियमबद्धता और अनुशासनबद्ध रचना के कारण किसी सोल्जर का मरना या अधिकारी का मरना व्यवस्था की दृष्टि से एक जैसा ही रहता। इस दूसरे कमिश्नर के मरते ही सारे अधिकारों का चार्ज ब्रिगेडियर इंग्लिस ने ले लिया और घेरे का कार्य उसी तरह चालू रहा। अब तक हुई हानि, मृत्यु संख्या, कर्मठ लोगों के देहांत, अन्न की कमी और शत्रु की व्यूह-रचना से अंग्रेज यद्यपि निराश नहीं हुए थे, फिर भी हताश होते जा रहे थे। इसी समय कानपुर से अंगद लौट आया। यह अंगद नामक नेटिव नौकर पहले अंग्रेजी सेना में नौकर था और अब पेंशनभोगी था। लखनऊ का घेरा पड़ने के बाद बाहर का कोई समाचार लाना किसी भी गोरे दूत को संभव नहीं था। उनकी गोरी चमड़ी, भूरे बाल या उनकी कंजी आंखे उन्हें सिपाही की तलवार से जीवित वापस नहीं जाने देते थे। इसलिए इस आंग्ल दूत कर्म पर किसी काले आदमी की नियुक्ति आवश्यक होने से बहुत से राजनिष्ठ काले लोग अंग्रेजों ने अब तक लखनऊ के बाहरी प्रदेश में भेजे थे। परंतु उन सबमें से अकेला अंगद ही जीवित लौट आया। विद्रोहियों के डर से वह कोई चिट्ठी-पत्री साथ नहीं लाया था, फिर भी 'अंग्रेजी सेना कानपुर से लखनऊ की सहायता के लिए 1857 का स्वातंत्र्य समर – 289

निकली है'- यह प्रत्यक्ष देखा हुआ समाचार उसने कमांडर इंग्लिस को सुनाया। इस समाचार से आनंदित हुए अंग्रेजों ने अंगद से कहा, "तू फिर से लौट जा और हैवलॉक का लिखित उत्तर लेकर आ।" तारीख 22 को लखनऊ छोड़क रवह अंगद 25 की रात ग्यारह बजे फिर लौट आया। उसके साथ हैवलॉक का पत्र था-"किसी भी कठिनाई से निपटने के लिए आवश्यक सबल सेना के साथ हैवलॉक आ रहा है, पांच-छह दिन में लखनऊ मुक्त हो जाएगा।" अपनी मुक्ति के लिए आनेवाले उस शूर हैवलॉक को लखनऊ की पूरी जानकारी मिले, इसलिए लश्करी नक्शे हाथ में देकर अंग्रेजों ने अंगद को कहा, "तू फिर से हैवलॉक के पास जा।" वह विलक्षण दूत फिर से हैवलॉक के पास गया और उसने सारे लश्करी नक्शे उसे दिए। अब हैवलॉक की विजयी सेना के ध्वज लखनऊ के श्मशान पर से आते ही होंगे। अंग्रेज उन्हें लगा, ये हैवलॉक की तोपें तो नहीं! इस आशा में तोपों की आवाजें जब अंग्रेज ध्यान देकर सुनने लगे तो उनके ध्यान में आया कि आज शत्रु दूसरा आक्रमण बढ़ाता चला आ रहा है। कानपुर बैटरी, जोहांस हाउस, बेराम कोठी आदि स्थानों पर विद्रोही मार करने लगे। उस दिन विद्रोहियों की बारूदी सुरंग ने बढ़िया धमाका किया। पूरी रेजिमेंट कवायद करती अंदर चली जाए इतना बड़ा रास्ता परकोटे में बन गया। परंतु यहां से अंदर जानेवाली रेजिमेंट कहां है? अंग्रेजों की सेना ने शत्रु की दीवार में ऐसा रास्ता बनाया होता तो उन्होंने आधे घंटे में उस रेसीडेंसी को खंडहर बना दिया होता। दोपहर दो बजे तक विद्रोहियों में ऐसी शूरता और देशभक्ति के पक्ष में भीरुता हो, यह कितना बड़ा दुर्भाग्य! दौड़ो, कोई तो आगे बढ़ो, इस दुर्भाग्य का कंठच्छेद करने दौड़ो दिन के पांच बजे हैं और आक्रमण लगभग विफल हो गया है। तथापि तत्कालीन विजय के लिए नही तो भी सर्वकालीन सफलता के लिए दौड़ो, कोई तो दौड़ो! कैप्टन सांडर्स-अब संभालो इस ध्येयनिष्ठों की दौड़ को। और यह क्रोधित यमों की टोली सीधे चली आ रही है। अंग्रेजों की गोलियों की परवाह न करते वह सीधी बढ़ रही है-वह उनकी दीवार से टकराकर उसे अपने सीने की टक्कर मार रही है-अंग्रेजों ने बंदूकें फेंककर इस आमने-सामने की लड़ाई में बैनेट ले ली-जय स्वतंत्रता! वाह रे वीर! उसने अपने हाथ से परकोटे के ऊपर से मार करनेवाली अंग्रेजी बैनेट को दबाकर छीन लिया। वाह रे वीर! उसने अपने हाथ से परकोटे के ऊपर से मार करनेवाली अंग्रेजी बैनेट को दबाकर छीन लिया। वाह रे वीर! अंत में शत्रु की गोली से गिर गया! स्वदेश की जितनी बच सके उतनी लाज बचाने को समरांगण में शत्रु पक्ष भी दांतों तले अंगुली दबाए, ऐसी शूरता दिखाकर शहादत के रक्त-तीर्थ में रक्त-समाधि ले गया। वह गिरा, दूसरा गिरा तीसरा भी गिरा, जोरदार लड़ाई हुई। बैनटों को अपने हाथों से झपटकर छीन लेनेवाले 1857 का स्वातंत्र्य समर - 290

और मृत्यु तक बेसुध लड़ते उन वीरों के रमणीय चित्र अंग्रेजी इतिहासकारों ने कौतुक से लिखे, ऐसी लड़ाई हुई। तारीख 18 को विद्रोहियों ने अंग्रेजों पर और एक आक्रमण किया। इस दिन भी पहले बारूदी सुरंग से रास्ता बनाया और बारूद की आवाज के साथ ही विद्रोही टूट पडत्रे। मैलसन लिखता है-"शत्रुओं ने यह रास्ता बनाते ही अत्यंत आवेश से उसका लाभ लेना प्रारंभ किया। उनमें के एक अति शूर अधिकारी ने उस भगदड़ के हिस्से में तुरंत छलांग लगा दी और अपनी तलवार घुमाते हुए अपने अनुयायियों को 'चलो-चलो कहकर आह्वान करने लगा। उसके आह्वान को कोई उत्तर दे उसके पूर्व ही एक गोली ने उसे नीचे गिरा दिया। परंतु उसी समय उसकी जगह दूसरा कूद पड़ा। उसे भी गोली ने नीचे गिराया। उस टुकड़ी का नेता भी गोली से गिरा। यह देखते ही बाकी के सिपाही दुबककर पीछे खिसके ।'' उपर्युक्त तीन वीरों का विदेशी व्यक्ति द्वारा वर्णित शौर्य दिल्ली में निकल्सन की ओर के साहस के मुकाबले का था। पर अनुयायियों के डरपोकपन से ऐसी शूरता विफल हो जाए और तीन सैनिक गिरने पर अधिक उन्माद से आगे घुसना छोड़कर हजारों लोग पीछे लौट पड़े-इस लज्जास्पद बात का गहरा तात्पर्य है। यद्यपि वे बार-बार लौटाए गए, तब भी बार-बार होनेवाले आक्रमण और हर दिन पड़नेवाली विद्रोहियों की तोपों और बंदूकों की अखंड मार के कारण अब अंग्रेजो को, अपने राजनिष्ठ नेटिवों की भारी सहायता होते हुए भी, टिके रहना असहनीय होता जा रहा था। इतने में अंगद फिर लखनऊ आ गया। पीछे दिए वचन के अनुसार हैवलॉक कितना पास आ गया है, यह अत्यंत उत्सुकता से अंग्रेज कमांडर जब उससे पूछने लगा तो अंगद ने हैवलॉक का पत्र दिया।128 “और लगभग पच्चीस दिन मैं लखनऊ की ओर नहीं आ सकता!'' आशा के बाद आई निराशा जैसा विष इस विश्व में कुद भी नहीं है। आज-कल में हैवलॉक आएगा, इस उत्सुकता का यह दुर्भागी उत्तर! मरते रोगी, अशक्त औरतें ही नहीं लड़ाके सोल्जर और अधिकार प्राप्त कमांडर-इन सबको भी बहुत खेद, उदासीनता और भय हुआ। घिरी हुई सारी आंग्ल सेना पर मृत्यु की छाया पड़ने लगी। अन्न महंगा हो गया और सबको आधे पेट रहने का आदेश हुआ। लखनऊ की मुक्ति के महान् कार्य में भी हैवलॉक जैसे योद्धा को यह विलंब क्यों करना पड़ रहा है। लखनऊ में बंद अपने देश बंधुओं को मुक्त करने में क्षण भर का भी विलंब न लगे, इसलिए 29 जुलाई को ही हैवलॉक कानपुर छोड़कर गंगा पार हो गया। उसके साथ डेढ़ हजार लोग और तेरह तोपें थी और इस सेना के साथ 'मैं पांच-छह दिन में तुम्हें मुक्त कर दूंगा, ऐसा उसने लखनऊ को आश्वास्ति भरा पत्र भी भेजा था।' परंतु गंगा नदी उतरकर अवध में पैर रखते ही हैवलॉक की यह काल्पनिक सुलभता ओस की तरह 1857 का स्वातंत्र्य समर – 291 128 चार्ल्स बाल, खंड 2 ।

पिघलने लगी। अवध के रास्ते का हर इंच विद्रोह कर उठा था। हर जमींदार पांच-छह सौ लोगों को इकट्ठा का स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने को तत्पर। हर गांव विद्रोहियों के झंडे की गढ़ी बना। ऐसी भयानक स्थिति देखकर हैवलॉक मन से उद्विग्न तो हो गया, पर वह निराश नहीं हुआ। उसने वैसे ही आगे कूच किया। उन्नाव के पास विद्रोहियों ने उसे पहली टक्कर दी। देकर वे आगे दौड़ गए। उन्नाव की लड़ाई लड़कर थके सैनिकों को हैवलॉक ने केवल भोजनाकाश दिया। भोजन निपटते ही फिर आगे कूच। फिर से आगे दौड़ जीती। परंतु यह जीत है क्या? इस एक दिन में उसकी मुट्ठी भर सेना का 6वां भाग समाप्त हुआ और विद्रोहियों का इस विजय से तिनका भी नहीं टूटा! अधिक क्या-परंतु लड़ाई शुरू होते ही मारधाड़ करके वे जो भाग जाते थे सचमुच अपनी पराजय के कारण या कम खर्च में अंग्रेजी सेना की नाक में दम करने की सुलभ युक्ति के कारण, यह भी शंका ही है। और उसी में दानापुर के सिपाहियों के विद्रोह का समाचार आ गया। यह भयानक परिस्थिति देखकर स्तंभित हैवलॉक तारीख 30 को आगे छोड़कर पीछे लौट गया। हैवलॉक की सेना ने कानपुर छोड़ दिया है, यह सुनते ही नाना साहब पेशवा ने फिर कानपुर में भीड़ जुटाई। हैवलॉक के कानपुर से गंगा उतरकर अवध में घुसते ही नाना अवध से गंगा उतर कानपुर में घुस रहे थे। कहीं नाना के इस लश्करी दांव में ने फंस जाएं, इस डर से हैवलॉक मंगलबड़ में 4 अगस्त तक बंधा पड़ा रहा। पांच-छह दिन में लखनऊ जाकर क्रांतिकारियों को गोमती का पानी पिलाने की जगह अब उसे नाना ही गंगा तीर पर पानी पिला रहा था। इतने में विद्रोही फिर से बशीरगंज दौड़ आए। तब उनके इस उद्दाम व्यवहार से चिढ़कर हैवलॉक जान की चिंता किए बिना और आई हुई नहीं कुमुक लेकर लखनऊ की ओर चला उसने बशीरगंज में विद्रोहियों से कुश्ती लड़ी, जहां से उसने उन्हें भगा दिया। फिर यह जय या पराजय? यह प्रश्न फिर सामने था। क्योंकि इस कुश्ती में हैवलॉक के तीन सौ लोग मारे गए। ऐसी हड्डी नरम हुई कि लखनऊ की ओर आगे न बढ़ते हुए अंग्रेजी सेना पीछे गंगा की ओर हटती गई। उस दिन शाम को उसके साथ निकले डेढ़ हज़ार में से केवल साढ़े आठ सौ लोग ही बाकी रहे। हैवलॉक 5 अगस्त को पीछे हटकर फिर से मंगलबड़ लौटा-यह सुनते ही विद्रोही फिर से बशीरगंज को कब्जे में लेकर बैठ गए। विद्रोहियों की इस सेना में अधिकतर सभ्य जमींदार लोग ही थे।129 “कल की लड़ाई में मरे अधिकतर जमींदार ही थे।“ अपनी स्वतंत्रता और अपने स्वराज्य के लिए मुलायम बिस्तर को छोड़कर इन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 292 129 के एवं मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 3, पृष्ठ 340 ।

जमींदारों ने कंटकाकीर्ण रणक्षेत्र का आश्रय लिया था। उनके इस साहस को देख अंग्रेजी इतिहासकार इन्नेस कहता है-‘कम-से-कम अवध के लोगों के प्रयासों को तो स्वातंत्र्य समर का ही स्वरूप प्राप्त हो गया था।’ हैवलॉक के चारों ओर विद्रोहियो की सेना के क्षितिज जैसे दांव-पेज चल रहे थे। ज्यों-ज्यों कोई आगे जाए, क्षितिज पीछे और पीछे हटता जाता है; पर वह पीछे हट गया, यह मानकर कोई अपनी जगह लौटे तो क्षितिज भी अपनी जगह लौटता दिखाई देता है। हैवलॉक के मंगलबड़ से पीछे हटते ही विद्रोही बशीरगंज में आ जाते। 11 अगस्त को तीसरी बार बशीरगंज पर हमला किया। तीसरी बार बशीरगंज जीता, तीसरी बार विद्रोही भाग गए, पर फिर हैवलॉक मन से पूछने लगा-‘यह जय है या पराजय?’ वह न केवल जय थी और न केवल पराजय ही थी-वह तो पराजय की विजय या विजय की पराजय थी। और इसलिए हैवलॉक आगे न जाकर फिर मंगलबड़ को लौट आया। इस बीच नाना का पेच पूरे रंग पर आता जा रहा था। सागर के विद्रोही, ग्वालियर के विद्रोही और अन्य स्वयंसेवक लोगों की टोलियां आदि सेना के साथ नाना बिठूर पर आक्रमण कर कानपुर में जमे जनरल नील में न होने से उसने यह आवश्यक बात हैवलॉक को सूचित की। अब लखनऊ की ओर जाने का नाम भी लेना असंभव था। इसलिए 12 अगस्त को हैवलॉक गंगा उतरकर कानपुर लौट आया। अंग्रेजी सेना के पीछे हट जाने के समाचार का बिगुल जब अवध ने सुना तो मानो इधर-उधर स्वदेश मुक्ति की जय-दुदुंभि गरज रही है-ऐसा हर्ष ध्वनि से जयनाद होने लगा। अवध के दरवाजे में घुसना चाहती परवशता को इस तरह गंगा पार भगाकर धारातीर्थ में रक्त समाधि लिये विश्वसनीय जमींदारो, तुमने स्वदेश की जमीन की अच्छी जमींदारी की। इन्नेस लिखता है-‘इस पीछे लौटने का निश्चित परिणाम दिखा। अवध से फिरंगी शासन समाप्त होने की यह अंग्रेजों की दी हुई स्वीकृति है-ऐसा कहते हुए वहां के तालुकेदारों ने लखनऊ दरबार की प्रस्थापित राज्यसत्ता का अधिकार मान्य किया। उनके आदेश वे मानने लगे। आज तक की निरंकुशता समाप्त होने लगी और लखनऊ की मांग के अनुसार भिन्न-भिन्न राजे अपनी सेनाएं उधर युद्धभूमि की ओर भेजने लगे।’130 पर विद्रोहियों को मिली यह विजय प्रत्यक्ष विजय नहीं, अप्रत्यक्ष विजय थी। हैवलॉक द्वारा लड़ी गई चार-पांच लड़ाइयों में वह प्रत्यक्ष पराजित होकर यदि कानपुर लौटा होता तो उसकी नाकेबंदी कर भगा देने से विद्रोहियों में जो उत्साह आया उससे अधिक दृढ़तर आत्मविश्वास उसकी सेना में और धैर्यच्युति का प्रभाव अंग्रेजी सेना में उत्पन्न हुआ होता। यद्यपि वह कानपुर में पीछे हटने को बाध्य हुआ, परंतु उस अपमान 1857 का स्वातंत्र्य समर - 293 130 इन्नेस कृत-‘सेपॉइज रिवॉल्ट’, पृष्ठ 174 ।

का कारण शौर्य का अभाव नहीं, सैन्याभाव है, यह समझ में आ जाने से अंग्रेजी सेना की आशा विफल हुई; लेकिन आत्मनिष्ठा, जोश और दृढ़ता उस अप्रत्यक्ष पराजय से कम नहीं हुए थे, इसलिए गोरी सेना की नई कुसुम आते ही-लखनऊ को मुक्त करने मैं जल्दी ही फिर निकलूंगा-इस हिम्मत से हैवलॉक कानपुर में जमा। इस समय नील और हैवलॉक में व्यक्तिगत मत्सर से कितना वैर हो गया था, हैवलॉक के नील को लिखे इस पत्र से स्पष्ट दिख जाता है-'इस तरह का व्यवहार आगे सहन नहीं किया जाएगा। आप मुझे निंदा, धौंस और उपदेश से भरे पत्र लिखते हैं; परंतु इनमें से एक भी बात कोई मेरे अधीनस्थ अधिकारी मुझे कहे, यह सहन करनेवाला आदमी मैं नहीं! आप यह समझकर रखें। यदि सार्वजनिक हित को कोई बाधा न पहुंचती तो मैं आपको कैद करने से नहीं चूकतां अभी आपको केवल आगाह कर रहा हूं, फिर से ऐसा बड़प्पन नहीं चलेगा।'' इस पत्र का एक वाक्य अंग्रेजों की रग-रग में समाए राष्ट्र-कर्तव्य का अत्युत्तम द्योतक हैं गुस्से से उबलते हुए भी हैवलॉक कहता है-'लोकहित में कोई बाधा न पहुंचती तो मैंने अपने अपमान का प्रतिशोध तत्काल लिया होता।' नील तथा हैवलॉक-दोनों रणपटु योद्धाओं ने ऐन संकट के समय उत्पन्न हुए आपसी झगड़े से शत्रु के ध्यान में आ जाए या उसे लाभ मिले, ऐसी एक भी घटिया कृति नहीं की। इतना ही नहीं अपितु लश्करी संबंधों के अनुसार पूरे अनुशासन में रहकर एक-दूसरे की सहायता भी की थी। हाथी समान व्यक्ति के मदमलिन मस्तक पर राष्ट्रीयता का यह तीक्ष्ण अंकुश जहां गड़ा रहता है उसी समाज में श्री, धी, धृति, कीर्ति, स्वतंत्रता वास करती है। कानपुर शहर में आते ही हैवलॉक को पहला समाचार यह ज्ञात हुआ कि नाना साहब की सेना ने ब्रह्मवर्त शहर पर फिर से कब्जा कर लिया है। कानपुर शहर की अंग्रेजी सेना के कंधे से कंधा भिड़ाकर विद्रोहियों द्वारा दी गई यह भयंकर शह देखते ही हैवलॉक सेना सहित उधर दौड़ पड़ा। उस दिन ब्रह्मवर्त में हुई लड़ाई में विद्रोहियों की 42वीं रेजिमेंट ने अंग्रेजी सेना के लड़ते-लड़ते बीस गज तक आते ही बैनेट लेकर लड़ना प्रारंभ किया। आज तक अंग्रेज लोग विद्रोहियों को डराने के लिए बैनेट को अंतिम साधन समझते थे। पर आज उन शूर स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वयं ही फिरंगियों पर बैनेट चलाकर घमासान मचा दिया। इसी समय विद्रोहियों के घुड़सवारों ने अंग्रेजों की पिछाड़ी पर टूटकर उनकी रसद मार दी। इस तरह पीछे और आगे से अंग्रेजी सेना को विद्रोहियों ने मारा। अंग्रेजी कमांडर की समझ में भी यह आया कि दिन-ब-दिन विद्रोहियों का समर साहस बढ़ता ही जा रहा है। ब्रह्मवर्त की लड़ाई में इस सारे पराक्रम के बाद भी पराजय लेकर पीछे हटना पड़ा। 17 अगस्त को विद्रोहियों को पराजित कर हैवलॉक पीछे कानपुर लौटा तो उसे यह ध्यान में आया कि नाना ने पूरी सेना ब्रह्मवर्त में नहीं रखी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 294

और उसकी सेना यमुना के तट पर कालपी में भी तैयार है। इस तरह कालपी में दबाव, ब्रह्मवर्त से दबाव, अवध से दबाव, गंगा के इस तीर पर दबाव, उस तीर पर दबाव, ऐसा चारों ओर से दबा हुआ वह ‘विजयी’ हैवलॉक कलकत्ता को लिखता है—“भयानक पेच पड़ा हुआ है। नई कुमुक नहीं आई तो कानपुर छोड़कर इलाहाबाद तक पीछे लौटने की बारी अंग्रेजी सेना को जल्द ही आए बिना नहीं रहेगी।” इस पत्र के उत्तर में नई कुमुक भेजी जाएगी और फिर आज तक सही हुई जय-पराजय की भरपाई लखनऊ का रक्त पीकर कर डालेंगे, ऐसी भावी आशा से हैवलॉक कलकत्ता के पत्र क प्रतीक्षा कर रहा था तो उसे आदेश आया कि-लखनऊ जानेवाली अंग्रेजी सेना का अधिकार तुमसे कठोर होता है! विजय हुई, परंतु कानपुर विजय में किंचित् देर हुई, इसलिए नील जैसे योद्धा को हटाकर हैवलॉक नियुक्त किया गया। विजय प्राप्त हो जाने पर भी लखनऊ की ओर जाने में उसे अनिवार्य देरी हुई, इसलिए हैवलॉक जैसे योद्धा को भी हटाकर सर जेम्स आउट्रम को सेनापति बनाया गया। यह समाचार आते ही इसलिए हैवलॉक को बहुत बुरा लगा। जिस वैभव के लिए उसने जी-जान से परिश्रम किया था उस लखनऊ मुक्ति का वैभव ऐन समय पर दूसरे के हाथ पड़ेगा, इस अपमान से उसे बहुत उदासी हुई। फिर भी मैलसन लिखता है—“मनोभंग से उपजे उद्वेग ने मन को कितना ही निराश किया, तो भी कर्तव्य-निर्वाह में अणु मात्र भी कसर न करने का गुण अंग्रेजी राष्ट्र का भूषण है। अंग्रेजी मन के सारे विकार कर्तव्य बुद्धि के अधीन होते हैं। अन्याय-उपेक्षा को भोगते हुए अंग्रेजी मन चाहे जितना व्याकुल होता हो, फिर भी उसका राष्ट्र उसकी शक्तियों को हमेशा नियंत्रित करता रहता है। अपने राष्ट्र की उत्तम सेवा किस तरह करें, इस संबंध में उसका व्यक्तिगत मत कुछ भी क्यों न हो, परंतु जब सरकार का यार उस राष्ट्र का मत उसके मत से भिन्न हो तो अपना निजी मत एक तरफ रख देशसत्ता के आदेश की जैसी भी विजय हो, उधर ही अंग्रेज दिन-रात लगा रहता है। नील ने ऐसा ही उदात्त व्यवहार किया और अब हैवलॉक ने भी ऐसा ही उदात्त वर्तन किया। उसके सिर से भावी विजय का मुकुट छीन लिया गया तब भी दूसरे को श्रेय देनेवाली विजय के लिए वह पहले जैसा ही दिन-रात परिश्रम करने में जुट गया।”¹³¹

जिस विजय का सेहरा दूसरे के सिर बंधना है उस विजय के लिए केवल राष्ट्रीय कर्तव्य जान दिन-रात प्रयास करने में हैवलॉक लगा था, तब ही दिनांक 15 सितंबर को सर जेम्स आउट्रम के हाथ नेतृत्व में आते ही उसने जो पहला आदेश जारी किया वह यह था—“जिस वीर पुरूष ने लखनऊ मुक्त करने के लिए आज तक अप्रतिम शौर्य प्रकट किया है उस पुरूष को ही उसे मुक्त करने का सौभाग्य मिलना न्याय है, इसलिए अपने

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¹³¹ मैलसन कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 346 ।

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रास्ते से हैवलॉक की सेना रेसीडेंसी की ओर निकली है, यह ज्ञात होते ही विद्रोहियों की ओर से तोपों की जबरदस्त मार चालू हो गई। आलमबाग से शत्रु की इस मार को सहन करते अंग्रेज बड़ी दृढ़ता से बढ़ते हुए चारबाग के पुल तक आकर भिड़ गए। इस पुल को पार करते ही लखनऊ में प्रवेश होने से उस महत्त्वपूर्ण नाके पर दोनों पक्षों में घमासान होने लगा। मॉड द्वारा पुल के विद्रोहियों पर तोप-गोलों की मार आधे घंटे से चालू रखने पर भीवह पुल न तो खाली हो रहा था और न उसपर की तोपें ही बंद हो रही थी। इतना ही नहीं, अंग्रेजों के इक्कीस जवान यलो हाएस पर और कितने ही इस पुल के सामने पहले ही ढेर हो गए थें सारी अंग्रेजी सेना इस एक पुल की धौंस में वहीं खड़ी रहे क्या? पास ही खड़े हैवलॉक के युवा पुत्र से मॉड ने कहा-"युवा वीर, इसका कोई तो तोड़ निकालो!" यह सुनते ही वह युवा हैवलॉक नील के पास आया और बोला-तोप की मार की विद्रोही परवाह नहीं कर रहे तो उस पुल पर हमला करने का आदेश दें। पर आउट्रम से पूछे बिना मैं ऐसा आदेश नहीं दे सकता, यह जनरल नील कहने लगा। ऐसे में क्या किया जाए? तरुण हैवलॉक को उस प्रश्न का उत्तर तत्काल मिल गया। उसने अपना घोड़ा बढ़ाया। जहां मुख्य कमांडर हैवलॉक खड़ा था, उस दिशा की ओर उसने घोड़ा दौड़ाया। जहां मुख्य कमांडर हैवलॉक खड़ा था, उस दिशा की ओर उसने घोड़ा बढ़ाया। जहां मुख्य कमांडर से मिला हो-ऐसा बहाना बना वह नील के पास वापस आया। नील को झुककर सलाम करते हुए उस युवा हैवलॉक ने कहा-"सर, पुल पर हमला करने का निश्चय हुआ है।" यह सुनते ही जनरल नील ने आक्रमण का आदेश दिया। पच्चीस अंग्रेजों की पहली टुकड़ी लेकर स्वयं तरुण हैवलॉक पुल की ओर उबल पड़ा। भयानक घमासान का समय! उन पच्चीस लोगों में से एक दो मिनटों में ही कौन जीवित बचा? और तू तरुण हैवलॉक, तू बच-बच! एक शूर निडर स्वातंत्र्य वीर उस पुल पर कूद रहा है और उसके हाथ की वह बंदूक सीधे तुझपर ही निशाना साध रही है। यह शूर सिपाही तरुण हैवलॉक से दस गज पर आकर खड़ा हो गया और अंग्रेजी योद्धाओं के सीने के सामने अटल खड़े रहकर उसने हैवलॉक पर गोली चलाई-आधे इंच का अंतर! हैवलॉक के सिर में घुसने की जगह वह उसकी टोपी में घुसकर रह गई। फिर भी साहसी सिपाही, अनेक आंग्ल बंदूकें उसपर तनी होते हुए भी पीछे हटना छोड़ वहीं अटल खड़ा होकर गोली भरने लगा। वाह रे बहादुर! अंत में स्वतंत्रता समर में हैवलॉक की गोली से वीरोचित मृत्यु मरा। पल-दो पल बाद ही अंग्रेजी सेना-सागर धड़धड़ाता उस पुल को ही कंपित कर गया। विद्रोही पीछे हटते और अंग्रेज आगे बढ़ते निकले। पुल हारा। लखनऊ का पहला रास्ता साफ हुआ। दूसरा हुआ, तीसरा हुआ, अंग्रेजी सेना चली आगे घुसते, दो-चार कदम चली कि फिर तलवार, बंदूकों-पर-बंदूकें छूटने लगीं। रक्त की तलैया भर जाती तो फिर वह जीवित लड़ाई आगे बढ़ती। संध्या हो गई तो उसकी भयंकर गति में असंख्य ठोकरें लगने लगीं-

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इसलिए आउद्रम कहता है-आज की रात यहीं बिताएं। पर नहीं, नहीं। रूकने का नाम भी निकालना उस शूर हैवलॉक को कैसे पसंद आएगा? उधर रेसीडेंसी में महीनों से मृत्यु की कराल दाढ़ में दबोचे पड़े उनके देश बंधुओं को और एक रात माने एक युग जैसी है। इसलिए हैवलॉक आगे बढ़ा। नील आगे बढ़ा। पूर्व का रास्ता भूलकर अंग्रेजी सेना विद्रोहियों की अधिकारिक मार में आती जा रही थी, फिर भी नील आगे चला। खास बाजार के जंगी फाटक में घुसते ही उसके ध्यान में आया कि अंग्रेजी तोपें थोड़ी पीछे रह गई हैं। अतः घोड़े को रोककर वह आंग्ल वीर गरदन घुमाकर पीछे देखने लगा। यही अवसर! यही अवसर! स्वदेश का बदला लेने का यही अवसर। फाटक पर चढ़े कृतांत, तेरे प्राण चले जाएं कोई बात नहीं, पर अवसर पकड़ना ही चाहिए। पल-विपल का अवकाश केवल और फाटक पर बैठे एक सिपाही ने अचूक निशाना साधा और उस जनरल नील की गरदन में उसकी गोली किसी गुस्सैल नागिन जैसे लहराती आ घुसी। गिर गया, अंगेजी सेना का कलेजा फटा ऐसा शूर, ऐसा धृति-संपन्न और ऐसा मर्द, ऐसी निडर छाती का और ऐसा जल्लाद मनुष्य जाति के दुर्भाग्य या सद्भाग्य से दूसरा पुरुष मिलना बहुत कठिन है। पर अंग्रेजी सेना एवं शौर्य की यही विशेषता है कि उनका सतत प्रयत्न किसी एक व्यक्ति पर, चाहे फिर वह व्यक्ति कोई अद्वितीय नील हो, उसपर अवलंबित नहीं रहता। नील गिरा तो भी तिनके भर भ्रमित न होकर अंग्रेजी सेना रेसीडेंसी की ओर दौड़ती चली। जिस खास बाजार के फाटक में नील की गरदन टूटकर गिरी उस खास बाजार में गोरे रक्त की ताल-तलैयां भर गईं, फिर भी अंग्रेजी सेना वैसे ही लड़ते चली। उस बाजार से रास्ता हो जाते ही उन्हें रेसीडेंसी से अति आनंद की जय गर्जना सुनाई देने लगी। उन्होंने भी जय गर्जना की। मृत्यु के जबड़े में हाथ डालकर हैवलॉक ने अपने स्वदेश बंधुओं को बाहर निकाला। उस अवसर का वर्णन वहां स्थित कैप्टन विल्सन की लेखनी ने किया है-‘'रास्ते में कदम-कदम पर उनके आदमी मरते हुए भी गोरी सेना शहर से अपनी ओर आती देखते ही रेसीडेंसी के लोगों का सारा भय, सारी आशंकाएं छिप गईं और उसकी जगह जय गर्जनाओं और आनंद की तालियों की सामने से आ रहे वीरों पर वर्षा होने लगी। अस्पताल से रोगी घिसटते बाहर आए और अपनी मुक्ति के लिए सामने से लड़ती आ रही अपनी शूर सेना को विजय स्वागत से बुलाने लगे। जल्दी ही हमारी सेना हमें आकर मिली। वह अवसर अवर्णनीय है। जिन्होंने अपने पति मर गए हैं, यह सुना था-वे विधवाएं आकस्मिक पति-लाभ से सधवा होने लगीं और जिन्होंने अपने प्रियजनों से मिलने को आज चार माह से प्राण धारण किए हुए थे, उन्हें पहली बार ज्ञात हुआ कि अब उनके प्रियजनों के फिर मिलने की आशा नहीं है।‘’ लखनऊ की रेसीडेंसी में आज तक सत्तासी दिन रात-दिन लड़ते इस अंग्रेजी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 298

सेना के 25 सितंबर तक लगभग सात सौ लोग मारे गए थे। घायल और स्वस्थ, ऐसे लगभग पांच सौ यूरोपियन और चार सौ नेटिव जीवति थे। इन लोगों की मुक्ति के लिए निकले हैवलॉक की सेना के रेसीडेंसी तक पहुंचते सात सौ बाईस आदमी खेत रहे। इतने शूर लोगों का रक्त दिया तब लखनऊ को जीता जा सका। परंतु दुष्ट निराशा, तू फिर भी अजित-की-अजित ही है। हैवलॉक ने शत्रु का कितना भी पीछा किया हो, पर तू उसका पीछा नहीं छोड़ रही। क्योंकि इतनी विजय, इतना रक्तपात, इतनी मारधाड़ कर लखनऊ की रेसीडेंसी में घुसते हुए उसे लगा कि आखिर मैंने विद्रोहियों के घेरे से आंग्ल सत्ता को मुक्त तो किया। परंतु अब उसका भ्रम टूट रहा है और गंगा किनारे जैसे उसने अपने आपसे पूछा था वैसे ही वह लखनऊ की रेसीडेंसी में जाने के बाद भी पूछ रहा है-'मैं जो रेसीडेंसी में लाया-वह सहायता थी या मुक्ति?'132 हैवलॉक के आने रेजिडेंसी का घेरा समाप्त होने के स्थान पर रेसीडेंसी के साथ हैवलॉक को भी विद्रोहियों ने घेर लिया। और इसीलिए हर कोई पूछने लगा-‘हैवलॉक जो लाया वह सहायता थी या मुक्ति? वास्तव में वह केवल सहायता थी। हैवलॉक और आउट्रम इन दो विख्यात आंग्ल योद्धाओं ने अनेक लड़ाइयां लड़ लखनऊ के अंग्रेज लोगों को पांडे लोगों की पकड़ से छुड़ाने के लिए जो सेना लाई थी वह उन्हें मुक्त नहीं करा सकी, उलटे उस सेना के साथ सेनापति भी घेरे में अटककर रह गए। हैवलॉक की अंग्रेजी सेना के रेसीडेंसी में घुसते ही पांडे की सेना लखनऊ छोड़कर चली जाएगी, ऐसी जो आशा अंग्रेजों को थी वह पूरी तरह निष्फल हो गई। यह कुछ देर बाद सारे हिंदुस्थान को ज्ञात हो गया। लखनऊ छोड़ देने या अंग्रेजों से समझौते की बातचीत करना छोड़ रणांगण में दृढ़ता से सुलगते क्रांतिवीरों ने हैवलॉक के रेसीडेंसी में घुसते ही फिर पहले जैसे रेसीडेंसी को घेर लिया। रेसीडेंसी में घुसते समय अंग्रेजी सेना का जो भाग आलमबाग में रखा गया था उसे अपनी सेना के मुख्य भाग से मिलने का अवसर भी न देते हुए, कल शाम हुए भयानक रक्तपाम से रास्ते में आई पहले प्रवाह की बाढ़ उतरी नहीं कि तभी स्वयं की पराजय और शत्रु को प्राप्त विजय से उत्पन्न उत्साहभंगता को निरामय स्थान पर फेंककर स्वतंत्रता के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 299 132 “इस अध्याय की समाप्ति से पहले घेरे के परिणामों का संक्षिप्त उल्लेख किया जाना सामान्यतः अपेक्षित है। सर्वप्रथम इस बात पर ध्यान दिया जाना अभीष्ट है कि हमारी कमजोर और अपूर्ण प्रतिरक्षा व्यवस्थाओं के कारण साहसी शत्रुओं द्वारा चारों ओर से घेर लिये जाने से हमारे लिए अपनी रक्षा कर पाना पूर्णतः असंभव था। जब उन्होंने आक्रमण किया तो उनमें उस साहस का अभाव था, जिसके बल पर कोई संकल्पबद्ध होकर खतरों का सामना करता है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि उनमें वीर और साहसी व्यक्ति भी थे, किंतु ऐसे वीर अधिक नहीं थे। अधिकांशतः 'कायर जन' ही उनमें वीर और साहसी व्यक्ति भी थे, किंतु ऐसे वीर अधिक नहीं थे, अधिकांशतः 'कायर जन ही थे।”

  • गब्बिन कृत-'म्युटिनियर्स इन अवध', पृष्ठ 348।

लिए उत्सुक लखनऊ शहर ने अंग्रेजी सत्ता को फिर एक बार कैद कर दिया। स्वतंत्रता संग्राम के पांडे लोगों के इस दृढ़ निश्चयी व्यवहार से केवल लखनऊ की अंग्रेज सेना ही कैंची में नहीं फंसी वरन् कलकत्ता से अलीगढ़ तक सारे प्रदेश में अंग्रेजी सेना पर जंगी दबाव पड़ने लगा। हैवलॉक के नेतृत्व में अंग्रेजों की सारी-की-सारी सेना लखनऊ पर आक्रमण के लिए भेज दी गई थी और जब उस सेना की सहायता से लखनऊ में बंद अंग्रेजी सेना मुक्त होने के बदले वहां अटककर रह गई तब नीचे के सारे प्रदेश में अंग्रेजी सत्ता लूली पड़ने लगी। इसी समय दिल्ली जीते जाने के कारण यद्यपि वहां की कुछ सेना खाली हो गई थी, परंतु वह दिल्ली जीते जाने के कारण यद्यपि वहां की कुछ सेना खाली हो गयी थी, परंतु वह दिल्ली के आसपास के प्रदेश में शांति स्थापित करने के काम में लगी हुई थी। ऐसी स्थिति में लखनऊ की रेसीडेंसी और आलमबाग में फिर से एक बार बंद कर दी गई अंग्रेजी सेना को उनके पक्के शत्रुओं से लड़कर उन्हें मुक्त करके अंग्रेजी सत्ता पर पड़ा दबाव कम करने का कार्य ही सबसे प्रमुख था। इस हेतु अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ क्या परिश्रम कर रहे हैं, यह पहले देखना चाहिए। 13 अगस्त को अंग्रेजों का नया कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन कैंपबेल कलकत्ता आ पहुंचा था। उस तारीख से 27 अक्तूबर तक वह आंग्ल सेनापति हिंदुस्थान देश को विद्रोहियों के हाथों से फिर जीत लेने को शीघ्र ही शुरू होनेवाली मुहिम की जंगी तैयारी कर रहा था। मद्रास, सीलोन और चीन जानेवाली अंग्रेजी सेना जैसे-जैसे कलकत्ता में उतरने लगी वैसे-वैसे उसका यथोचित विभाजन करने, कासिम बाजार की शस्त्राशाला में नई तोपें ढालने और शस्त्रास्त्र, रसद, रण वस्त्र, सैन्य वाहन आदि की सब ओर से यथासंभव उत्तम व्यवस्था में वह दो माह लगाकर अगली मुहिम की तैयारी में लगा ही था कि उसपर कोलिन को हैवलॉक और आउट्रम के अपने ही जाल में बंद हो जाने का समाचार मिला। तब उस- 'पतितं पतितं पुरुत्पतितम्', ऐसे लखनऊ शहर का झगड़ा मुझे ही निपटाना चाहिए, इस निश्चय से उसने 27 अक्टूबर को स्वयं कूच किया। इसी समय कर्नल पॉवेल और कैप्टन विलियम पील की अधीनता में नेवल ब्रिगेड नामक एक नौसेना तैयार कर उसने जलमार्ग से इलाहाबाद की ओर भेज दी थी। कलकत्ता से इलाहाबाद, कानपुर तक जो राजमार्ग फैले हुए थे उन रास्तों के आजू-बाजू विद्रोहियों की छोटी-छोटी टोलियां अंग्रेजी सेना का बहुत त्रास दे रही थी। वे टोलियां इकट्ठी ही जाती तो उनसे लड़ाई लड़ना अंग्रेजों को संभव था, पर कुंवर सिंह के प्रशिक्षण में तैयार पांडे लोगों की सेना अंग्रेजी सेना के चारों ओर मंडराते हुए लड़ाई के अवसर टालती हुई अपने अस्तित्व की सूचना अचानक आक्रमण के सिवाए अंग्रेजों को किसी भी अन्य प्रकार से न देते हुए उस पूरे प्रांत में छापामार पद्धति का हुड़दंग मचाए थी। उन लोगों से निपटना आसान नहीं था। ऐसी ही एक विद्रोही टुकड़ी को काजवा 1857 का स्वातंत्र्य समर – 300

नदी से भगा देने के प्रयास में उस नौसेना का नायक पॉवेल मारा गया। पॉवेल जैसे आंग्ल वीर का उष्ण रक्त जिस दिन पांडे लोगों की तलवार पी रही थी उसी दिन कमांडर-इन-चीफ कानपुर आ पहुंचा। विद्रोही टोलियों ने रास्ते कैसे रोक रखे थे, उसका भयंकर अनुभव कानपुर पहुंचने के पहले स्वयं कमांडर-इन-चीफ को हो गया था। कोलिन एक गाड़ी से इलाहाबाद से कानपुर जा रहा था। अंग्रेजों को वाहनों की यद्यपि बहुत कठिनाई हो रही थी और उनका कमांडर-इन-चीफ एक मामूली गाड़ी में बैठकर कानपुर की ओर जा रहा था कि उसी समय उस रास्ते से जानेवाली विद्रोहियों की एक टुकड़ी हाथी पर बैठ शान से जा रही थी। उनके पास पच्चीस घुड़सवार भी थे। सर कोलिन के साथ सेना आदि कुछ भी नहीं थी। उसका गाड़ीवान घाटी के पास आया तो बाजू के रास्ते से विद्रोहियों की टोली उसी छोर पर आकर उसे मिली। उस गाड़ी में क्या माल भरा है, यह पांडे लोगों को पता न लगने से यद्यपि उनका ध्यान उसपर नहीं गया, परंतु उस गाड़ी के 'माल' के प्राण सूख गए। हिंदुस्थान फिर से जीतने के लिए कानपुर की ओर जानेवाला कमांडर-इन-चीफ अपने सामने उन दैत्य विद्रोहियों को अचानक भैरव की तरह प्रकट होते देख आगे का रास्ता छोड़कर पीछे के रास्ते भाग खड़ा हुआ। एक क्षण की देरी होती तो शिकार हाथ लग जाता। या फिर वह गाड़ीवाला केवल उंगली का निर्देश उन विद्रोहियों को कर देता तो जो हजारों वीरों के रण-कौशल से भी बलि न चढ़ता वह अंग्रेजों का कमांडर-इन-चीफ तत्काल कैद कराने का सौभाग्य उस गाड़ीवान को मिलने वाला था! एक क्षण का अंतर था, नहीं तो सर कोलिन अंग्रेजों के कमांडर-इन-चीफ को विद्रोही कैद कर लेते और अपने स्वदेशी कमांडर नाना साहब या कुंवर सिंह के सामने या एकदम यम के सामने प्रस्तुत कर देते। इस अनिष्ट से छूटते ही सर कोलिन नवंबर की 3 तारीख को कानपुर आ पहुंचा। उसके पहले ही ब्रिगेडियर ग्रेट के अधीन सेना एकत्रित कर ली गई थी। दिल्ली के आसपास के प्रदेश के विद्रोहियों का सफाया करते-करते दिल्ली के घेरे से खाली हुई सेना के साथ ग्रेट हेड नीचे उतरकर वहीं आ गया था। दिल्ली गिर जाने के बाद उसके आसपास के प्रदेश में शांति स्थापित करते इस ग्रेट हेड ने इलाहाबाद के नील का गर्व परिहार करने में जो शूरता दिखाई थी वह अप्रतिम और अनुपमेय है। विद्रोह होने के बाद से नवंबर माह तक वह प्रदेश विद्रोहियों के ही कब्जे में था। पर इस प्रदेश के वासियों को उन्होंने इतना कम त्रास दिया था कि स्वयं अंग्रेज कमांडर-इन-चीफ अपनी पुस्तक में लिखता है-“लोग निश्चिंत और पूर्णतः निरापद रूप में अपना कृषि कार्य करते थे। क्रांतिकारियों ने कहीं भी जनता को आवश्यकता से अधिक कष्ट नहीं दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने संपूर्ण प्रांत में बलात् तो कहीं भी कुछ नहीं किया।”133 1857 का स्वातंत्र्य समर - 301 133 कोलिन कृत- 'नैरेटिव ऑफ दि इंडियन म्यूटिनी', पृष्ठ 159 ।

केवल अपनी सेना के लिए आवश्यक रसद प्राप्त करने से अधिक अत्याचार विद्रोहियों ने नहीं किया था। क्रांतियुद्ध के भयंकर प्रलय में भी हर वर्ष की तरह ही खेती विस्तार से की गई थी। जो स्वदेश के स्वयंसेवकों को शोभा दे, ऐसे ही व्यवहार से पांडे लोगों ने अपने प्रदेश की रक्षा की थी। पर गुलामी के संचालकों की तरह स्वतंत्रता के लिए प्रेरित उस देश को कुचलने को निकले अंग्रेजों ने उसे बेचिराग कर डाला! और वह सब शांति के लिए , गावं-के-गांव जलाते हुए, जो भी तगड़ा जवान मिला उसे फांसी पर चढ़ाते हुए, आकाशवासी पंछियों से भी अधिक बेरहमी से ग्रामवासियों को मारते हुए ग्रेट हेड की सेना दिल्ली से कानपुर आ पहुंची। तब उसे, नौसेना को और अन्य बड़ी सेना को इकट्ठा कर ब्रिगेडियर ग्रेट गंगा नदी उतरने लगा। हे गंगा माई! लखनऊ को मुक्त करने के लिए तेरे किनारे आई अंग्रेजी सेना की गिनती तूने की है? और हे मानिनी अवध! तू इस अंग्रेज सेना से डरकर अंधियारे कमरे में बंद अंग्रेज सत्ता को मुक्त कर रही है या नहीं? ब्रिगेडियर ग्रेट के अधीन पांच हजार गोरी सेना थी, उसके साथ ही सैकड़ों ऊंट और लखनऊ की सेना के लिए काफी रसद भी ली हुई थी। ग्रेट की इस सेना के आलमबाग तक मारधाड़ करते पहुंच जाने की बात समझते ही सर कोलिन ने कानपुर की ओर से गंगा नदी पार की। पीछे अपनी पीठ सुरक्षित रहे, इसलिए उसने चुनी हुई यूरोपीय और सिख सेना तोपों के साथ कानपुर में रखी थी और उसका अधिकारी यूरोप खंड के अनेक युद्धों के नामवर जनरल विंडहम को बनाया। गंगा पार करके 9 नवंबर को कोलिन आलमबाग पहुंचकर अपनी सेना से मिला। आलमबाग की सेना का बारीकी से निरीक्षण कर उसके अलग-अलग भागों को एक अभेद्य व्यूह-रचना में पिरोकर तारीख 14 को लखनऊ शहर पर अंग्रेजी सेना को भयानक हमला करने का आदेश दिया गया। लखनऊ की रेसीडेंसी में समाचार पहुंचाने और संग्राम की कूटनीति तय करने के लिए कन्हेनाव नामक एक साहसी अंग्रेज ने अपना मुंह काला कर, शरीर पर नेटिव कपड़े पहन, एक नेटिव को साथ लेकर विद्रोहियों के पहरे के बावजूद रात के समय जाकर कोलिन और आउट्रम के संदेश एक-दूसरे को पहले ही दे दिए थे। लखनऊ की रेसीडेंसी और आलमबाग की गोरी छावनी में हर किसी को 14 नवंबर कब उदय होता है, इसका इंतजार था। अपनी सेना के साथ हैवलॉक और आउट्रम शत्रु को बाहर की ओर दबाते रेसीडेंसी से निकलेंगे और बाहर की ओर से सर कोलिन रेसीडेंसी की ओर दबाते ले जाएंगे। इस समय अंग्रेजी में उनके अधिकतर नावर योद्धा और सेनापति जमा हो गए थे। हैवलॉक, आउट्रम, नौसेना का पील, ग्रेट हेड, दिल्ली का हडसन, बिग्रेडियर होप ग्रांट, आयर, स्वयं कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन कैंपबेल। ताजा दम यूरोपीय हायलैंडर्स, घेरे के कालमुख से भी बाहर कूदने में बहुत निडर, किसी भी साहस के गले मिलने के लिए आतुर आउट्रम के यूरोपियन, राजनिष्ठ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 302

पंजाबी जवान और उन पंजाबियों से अधिक राजनिष्ठ दिल्ली में मातृभूमि के रक्त से सनी तलवारें धारण करनेवाले सिख। ऐसी यह अंग्रेजी सेना 14 नवंबर को लखनऊ शहर की ओर चली। वह सारा दिन विद्रोहियों और अंग्रेजी की छीना-झपटी में गया और शाम के समय अंग्रेजी सेना दिलखुश बाग तक शहर जीतती चली गई। वहां रात गुजारने की इच्छा से सर कोलिन ने डेरा डाला। उस रात भी विद्रोहियों के छुटपुट हमले बीच-बीच में चालू ही थे, तब भी अंग्रेजी सेना ने उसकी परवाह न करते हुए वहीं रात गुजारी। दूसरे दिन कोलिन ने अपनी सेना को फिर एक बार व्यूहबद्ध किया और तारीख 16 तारीख को लखनऊ जंगी हमला करने का आदेश दिया। आदेश पाते ही अंग्रेजीसेना उछलकर सिकंदर बाग पर टूट पड़ी। शहर के इस भाग तक अंग्रेजी सेना को विद्रोहियों ने कोई उल्लेखनीय बाधा खड़ी नहीं की। परंतु इस सिकंदर बाग पर कोई ऐसा वीर नियुक्त था जिसने उस बाग में युद्ध का भयंकर खेल रचा। ईवर्ट के अधीन हायलैंडर्स और पॉल के अधीन सिख एक कर्कश चीत्कार कर जब उस सिकंदर बाग पर टूटे तब अंग्रेजी सेना के आगे कोई टिक नहीं पाएगा, ऐसा लगा। सिखों का सरदार गोकुलसिंह अपनी तलवार ऊंची उठाएं कहीं हायलैंडर्स अपने सिख अनुयायियों से आगे न चले जाएं-इसलिए पूरा दम लगाए रहा। अभागा लखनऊ! उसके शरीर का रक्त कौन अधिक पीता है, इस निष्ठुर प्रतियोगिता से सिखों और हायलैंडरों की तलवारें सपासप वार कर रही थीं। परंतु सिकंदर बाग की पत्थर की मजबूत दीवारें किसी भी तरह हिल-डुल नहीं रही थी। परंतु सिकंदर बाग की पत्थर की मजबूत दीवारें किसी भी तरह हिल-डुल नहीं रही थी। और वे दीवारें हिलने लगीं तो भी उस बाग के वीरवर नहीं हिल रहे थे। क्योंकि तट की कुछ शिलाएं गिरते ही अंग्रेजीसेना तीर की तरह उस ओर चली-कौन आगे बढ़ता है? हायलैंडर या सिख? दोनों ने ही जोरदार दौड़ लगाई है। पर अंत में उस स्थान से जो पहले अंदर घुसा वह सिख ही था। उसके उस देशद्रोही साहस को पुरस्कृत करने के लिए उसके सीने में एक गोली घुसी! वह गिरा और तुरंत यह कूपर उसमें घुस गया। उसके पीछे-पीछे ईवर्ट गया, कैप्टन जॉन गया, फिर और हायलैंडर सैनिक तेजी से अंदर घुसते गए। अंदर के सिपाहियों को इस अंग्रेजी सेना को एकाएक अंदर देखकर आश्चर्य हुआ, परंतु उस दिन उस सिकंदर बाग के पास लड़ने के लिए अड़ा योद्धा का कोई सामान्य मनुष्य नहीं होगा। वह तो स्थान छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। विजय या मृत्यु! मृत्यु या जय! शाबाश वीर, शाबाश! स्वतंत्रता के लिए लड़ते वीर को यही गर्जना शोभा देती है। अंग्रेजी सेना का कूपर इस बाग की दीवार से घुसा है, इसलिए उसका काम तमाम करने के लिए उस बहादुर सिपाही की खटपट चालू है। लुधियाना से विद्रोह करके आए सिपाहियों के उस शूर नेटिवव अधिकारी के सिवाए यह काम किसी अन्य से नहीं हो सकता। आया! कूपर को खोजते-खोजते वह कृतांत उसपद दौड़ पड़ा। खनखनाहट-सपासप-काट-छांट- 1857 का स्वातंत्र्य समर - 303

कूपर को उसने और कूपर ने उसे एक ही समय काट डाला। दोनों ही खेत रहे। लैंफ्सडेन अपने हाथ की तलवार घुमाते चिल्लाने लगा, "देख क्या रहे हो! स्कॉटलैंड की परीक्षा की घड़ी है, आगे बढ़ो" कैसी उद्दाम भाषा। स्कॉटलैंड के सम्मान में! और हिंदुस्थान को कोई सम्मान ही नहीं है क्या स्कॉटलैंड के सम्मान के लिए कोई गोरा आने से पहले ही हिंदुस्थान के सम्मान में एक काला वीर गुस्से से भरा आया। लैंफ्सडेन के शव से रक्त बहने लगा। ऐसे स्थान-स्थान पर भयानक लड़ाई चल रही थी कि तभी दूसरी जगह से दरवाजा फोड़ वहां से भी अंग्रेजी सेना का सागर उस बाग में घुसने लगा। अब इस बाग को जीत की आशा नहीं रही। फिर ऐ सिकंदर बाग! चाहे विजय हाथ से निकल गई है, फिर भी तू लड़ता ही रहेगा क्या? लड़-लड़, वैसे ही लड़! विजय जाए, पर सम्मान न जाए, यश नहीं जाने देना। कर्तव्य मान रण-मैदान में कूद पड़! दरवाजे-दरवाजे, सीढ़ी-सीढ़ी पर खनखनाती तलवारें भिड़ी रहीं। रक्त की कीच चारों ओर मचाती रही। मैलसन कहता है- "भयानक रक्तपात और घमासान मार-धाड़ चली। निराशा के अतुल शौर्य से विद्रोही लड़ते रहे। अंग्रेजी सेना ने उस स्थान के अंदर का भाग भी कब्जा लिया। फिर भी लड़ाई का अंत न हो। हर कमरा, हर सीढ़ी, हर बुर्ज, हर कोना भारी जिद के साथ लड़ता रहा। 'शरण' शब्द का उच्चारण किसी ने नही किया, किसी ने सुना नहीं जब वह सारा स्थान अंग्रेजों ने जीत लिया तब ध्यान में आया कि उस बाग में दो हजार शव विद्रोहियों के पड़े हुए हैं। उस बाग में उनकी जो सेना थी उसमें से केवल चार ही जन शायद लड़ाई छोड़कर भागे होंगे। परंतु चार भी भागे या नहीं, यह संदेह ही है।"134 सिकंदर बाग में देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ते-लड़ते मरनेवाले शहीदों, दो हजार वीरों! तुम्हारी उस पवित्र स्मृति में यह इतिहास अर्पित है। दो हजार गाजियों का रक्त ! दो हजार देशवीरों का रक्त! उस रक्त पर या कृतज्ञ इतिहास अर्पित है। देश के लिए लड़ मरे-तुम कौन थे? तुम्हारे नाम क्या था? तुममे यह सिद्धांतनिष्ठा की ज्योति प्रकाशित थी तब उसे चैतन्य रखनेवाला कौन सा वीरवर नेता तुम्हें धारातीर्थ का संकल्प दे रहा था? यह कहन का महद्भाग्य, विश्व-कल्याण के लिए उपकारक कर्मों में देह घिसनेवाले तुम संत-विभूतियों का नाम उच्चारण करने या लिखने का महद्भाग्य यद्यपि हमारे भाग्य में नहीं, फिर भी तुम्हारी वीर्य स्मृति को यह कृतज्ञ इतिहास अर्पित हो। विजय गई, परंतु तुमने स्वकीय यश को भंग नहीं होने दिया। विजय गई, पर तुमने स्वयश को उष्ण रक्त के दो हजार फब्बारों के नीचे सुस्नान निर्मल रखा हुआ है! तुम्हारा रक्त-भूतकाल की तिलांजलि-आगामी वीरों की संजीवनी बने! तुम्हें सफलता नही मिली, पर स्वतंत्रता के गाजियों, यह सिकंदर बाग का आत्मयज्ञ यदि सही मुहूर्त पर आरंभ किया गया होता तो तुम्हें विजय भी मिलती। अब तुम्हारे शत्रु 1857 का स्वातंत्र्य समर - 304 134 मैलसन कृत-'म्युटिनी', खंड 4 पृष्ठ 132 ।

की शक्ति कितनी बढ़ी है। उनके हजारों नए योद्धा रण की ओर बढ़ रहे हैं। दिल्ली गिर जाने से तनाव कम हो गया है। विजय के कारण नैतिक बल बढ़ा हुआ है और पराजय से तुम्हारी मानसिक शक्तियां क्षीण उनके हजारों नए योद्धा रण की ओर बढ़ रहे हैं। दिल्ली गिर जाने से तनाव कम हो गया है। विजय के कारण नैतिक बल बढ़ा हुआ है और पराजय से तुम्हारी मानसिक शक्तियां क्षीण हुई हैं। ऐसी रूखी और निर्बीज भूमि में दो हजार का रक्त भी नमी नहीं ला सकता। परंतु दो माह पहले यदि ये दो हजार रक्त मेघ देशवीरत्व की तैयारी से इस भूमि की ओर मुड़े होते तो, यदि लखनऊ में पहली सलामी होते ही अंग्रेजी सत्ता की दुर्बल रेसीडेंसी पर ऐसे ही मारेंगे या मरेंगे, इस निश्चय से हमला करने हजारों लोग गए होते तो आधे घंटे के अंदर हिंदुस्थान के सिर पर तुम्हें जो चाहिए था। वह स्वराज्य का मुकुट चमकने लग गया होता। मर गए, पर मरने का मुहूर्त गलत था समय गया-घटी कभी की डूब गई-एक रक्त बिंदु से उस समय विजय मिली होती, अब रक्त के हौज से उड़ेले तो भी सुयश मिलेगा, पर विजय मिलनी कठिन है! राज्य क्रांति जैसी भयंकर वेग की आंधी में एक क्षण की ढील हुई और बात गई। एक पैर पीछे लिया तो वह टूटा ही, एक क्षण को जान प्यारी हुई और हमेशा के लिए मृत्यु आई। क्रांति के दरबार की प्रथम सावधानी-यह कि-'बूंद से गई, वह हौज से नहीं आती।' रक्त के हौज सिकंदर बाग में जैसे भरे वैसे ही अन्य रणक्षेत्रों में भी भरे। दिलखुशबाग, आलमबाग, शहानजीफ-सारे स्थान उस दिन और उस रात शत्रु के साथ जूझते रहे। भोर होते ही लखनऊ शहर के सारे घंटे घनघना उठे। नगाड़े बजे और फिर उस रक्त से नहाए शहर ने शत्रु से टक्कर लेनी शुरू की। कल का शहानजीफ का झगड़ा और आज का मोतीमहल का झगड़ा। जैसे को तैसा होने लगा। परंतु अंग्रेजी झंडा ही सबल साबित हुआ और अंग्रेजी सेना रेसीडेंसी में बंद अपने देशबंधुओं को मुक्त करने में सफल हुई। तारीख 17, 18, 19, से 23 नवंबर तक लखनऊ में लड़ाई-पर-लड़ाई लड़ते अंत में वह घिरी हुई और घेरा तोड़ने आई अंग्रेजी सेना एक-दूसरे को मिली। जिस रेसीडेंसी पर आज तक मृत्यु की छाया था उस रेसीडेंसी में अब विजय का हास्य खिल उठा। परंतु इस आंग्ल विजय को विद्रोही अभी भी महत्त्व नहीं रहे थे। ये दोनों अंग्रेजी सेना इकट्ठी हो गई और रक्त के प्रत्यक्ष समुद्र में वह शहर तैरने लगा, तब भी वहां के क्रांतिवीर समर्पण करने या भाग जाने को तैयार नहीं थे। उनकी इस दृढ़ता और धैर्य के कारण लड़ाई फिर से कब शुरू हो जाए, यह बिल्कुल अनिश्चित था। इसलिए पिछली रात की मारामारी में छिटकी अंग्रेजी सेना को फिर से एक बार व्यवस्थित करने का कार्य सर कोलिन ने प्रारंभ किया। उसने रेसीडेंसी छोड़कर दिलखुशबाग में सारी सेना इकट्ठी की। आगे की लड़ाई के लिए आवश्यक संगठन बनाया और कब्जाए आलमबाग में आउट्रम के अधीन उस विस्तीर्ण मार-काट में शेष रही लगभग चार हजार सेना और पच्चीस तोपें रख दीं और इस विजय के लिए उसने अपनी सेना की शूरता, अनुशासन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 305

और आदेश-पालन की यथार्थ स्तुति की। उस स्तुति शूरता में बड़ा हिस्सा जनरल हैवलॉक का था। परंतु जब तक अंग्रेजी सेना वह विजयानंद मनाए, तब तक उस विजयानंद का मुख्य हिस्सेदार हैवलॉक यकायक मर गया। लखनऊ के रण क्षेत्र में अति तनाव, चिंता और निराशा से पस्त हुआ ऐन विजय रंग में यह बहादुर हैवलॉक मर गया। तारीख 24 का अंग्रेजी विजय में इस मृत्यु ने यह विष घोल दिया। फिर भी, हैवलॉक के बाद उसके पुत्र और पत्नी को सरदारी का सम्मान देकर इंग्लैंड कृतज्ञ हुआ। परंतु वह समय मरे हुए के शोक में डूबने का नहीं, उसकी अधूरी आशापूरी करने का था। लखनऊ विजय के लिए हैवलॉक मरा, इसलिए उसकी मृत्यु के बाद उसकी वास्तविक सेना करना अर्थात् लखनऊ शहर जीतना था। परंतु लखनऊ जीतना निकलने से पहले इधर कानपुर में ये तोपों के आकस्मिक धमाके क्यों शुरू हो गए हैं? होंगे किसी के लिए। युरोप के युद्ध का प्रख्यात वीर विंडहम जब तक कानपुर में है तब तक वहां की तोपों के धमाकों से सर कोलिन के सीने की धड़कने बढ़ने का कोई कारण नहीं। परंतु सर कोलिन को जैसा विंडहम कानपुर में है वैसा ही तात्या टोपे भी वहां आया है, यह समाचार मिला है। तात्या टोपे कानपुर में ही है? सर कोलिन को तोपों के उन धमाकों का भयंकर अर्थ ध्यान में आया और वह लखनऊ आउट्रम के हवाले कर अति वेग से स्वयं यह जानने दौड़ा कि कानपुर में तात्या टोपे क्या गड़बड़ कर रहा है! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 306