१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसेना के 25 सितंबर तक लगभग सात सौ लोग मारे गए थे। घायल और स्वस्थ, ऐसे लगभग पांच सौ यूरोपियन और चार सौ नेटिव जीवति थे। इन लोगों की मुक्ति के लिए निकले हैवलॉक की सेना के रेसीडेंसी तक पहुंचते सात सौ बाईस आदमी खेत रहे। इतने शूर लोगों का रक्त दिया तब लखनऊ को जीता जा सका। परंतु दुष्ट निराशा, तू फिर भी अजित-की-अजित ही है। हैवलॉक ने शत्रु का कितना भी पीछा किया हो, पर तू उसका पीछा नहीं छोड़ रही। क्योंकि इतनी विजय, इतना रक्तपात, इतनी मारधाड़ कर लखनऊ की रेसीडेंसी में घुसते हुए उसे लगा कि आखिर मैंने विद्रोहियों के घेरे से आंग्ल सत्ता को मुक्त तो किया। परंतु अब उसका भ्रम टूट रहा है और गंगा किनारे जैसे उसने अपने आपसे पूछा था वैसे ही वह लखनऊ की रेसीडेंसी में जाने के बाद भी पूछ रहा है-'मैं जो रेसीडेंसी में लाया-वह सहायता थी या मुक्ति?'132 हैवलॉक के आने रेजिडेंसी का घेरा समाप्त होने के स्थान पर रेसीडेंसी के साथ हैवलॉक को भी विद्रोहियों ने घेर लिया। और इसीलिए हर कोई पूछने लगा-‘हैवलॉक जो लाया वह सहायता थी या मुक्ति? वास्तव में वह केवल सहायता थी। हैवलॉक और आउट्रम इन दो विख्यात आंग्ल योद्धाओं ने अनेक लड़ाइयां लड़ लखनऊ के अंग्रेज लोगों को पांडे लोगों की पकड़ से छुड़ाने के लिए जो सेना लाई थी वह उन्हें मुक्त नहीं करा सकी, उलटे उस सेना के साथ सेनापति भी घेरे में अटककर रह गए। हैवलॉक की अंग्रेजी सेना के रेसीडेंसी में घुसते ही पांडे की सेना लखनऊ छोड़कर चली जाएगी, ऐसी जो आशा अंग्रेजों को थी वह पूरी तरह निष्फल हो गई। यह कुछ देर बाद सारे हिंदुस्थान को ज्ञात हो गया। लखनऊ छोड़ देने या अंग्रेजों से समझौते की बातचीत करना छोड़ रणांगण में दृढ़ता से सुलगते क्रांतिवीरों ने हैवलॉक के रेसीडेंसी में घुसते ही फिर पहले जैसे रेसीडेंसी को घेर लिया। रेसीडेंसी में घुसते समय अंग्रेजी सेना का जो भाग आलमबाग में रखा गया था उसे अपनी सेना के मुख्य भाग से मिलने का अवसर भी न देते हुए, कल शाम हुए भयानक रक्तपाम से रास्ते में आई पहले प्रवाह की बाढ़ उतरी नहीं कि तभी स्वयं की पराजय और शत्रु को प्राप्त विजय से उत्पन्न उत्साहभंगता को निरामय स्थान पर फेंककर स्वतंत्रता के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 299 132 “इस अध्याय की समाप्ति से पहले घेरे के परिणामों का संक्षिप्त उल्लेख किया जाना सामान्यतः अपेक्षित है। सर्वप्रथम इस बात पर ध्यान दिया जाना अभीष्ट है कि हमारी कमजोर और अपूर्ण प्रतिरक्षा व्यवस्थाओं के कारण साहसी शत्रुओं द्वारा चारों ओर से घेर लिये जाने से हमारे लिए अपनी रक्षा कर पाना पूर्णतः असंभव था। जब उन्होंने आक्रमण किया तो उनमें उस साहस का अभाव था, जिसके बल पर कोई संकल्पबद्ध होकर खतरों का सामना करता है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि उनमें वीर और साहसी व्यक्ति भी थे, किंतु ऐसे वीर अधिक नहीं थे। अधिकांशतः 'कायर जन' ही उनमें वीर और साहसी व्यक्ति भी थे, किंतु ऐसे वीर अधिक नहीं थे, अधिकांशतः 'कायर जन ही थे।”
- गब्बिन कृत-'म्युटिनियर्स इन अवध', पृष्ठ 348।