१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलिए उत्सुक लखनऊ शहर ने अंग्रेजी सत्ता को फिर एक बार कैद कर दिया। स्वतंत्रता संग्राम के पांडे लोगों के इस दृढ़ निश्चयी व्यवहार से केवल लखनऊ की अंग्रेज सेना ही कैंची में नहीं फंसी वरन् कलकत्ता से अलीगढ़ तक सारे प्रदेश में अंग्रेजी सेना पर जंगी दबाव पड़ने लगा। हैवलॉक के नेतृत्व में अंग्रेजों की सारी-की-सारी सेना लखनऊ पर आक्रमण के लिए भेज दी गई थी और जब उस सेना की सहायता से लखनऊ में बंद अंग्रेजी सेना मुक्त होने के बदले वहां अटककर रह गई तब नीचे के सारे प्रदेश में अंग्रेजी सत्ता लूली पड़ने लगी। इसी समय दिल्ली जीते जाने के कारण यद्यपि वहां की कुछ सेना खाली हो गई थी, परंतु वह दिल्ली जीते जाने के कारण यद्यपि वहां की कुछ सेना खाली हो गयी थी, परंतु वह दिल्ली के आसपास के प्रदेश में शांति स्थापित करने के काम में लगी हुई थी। ऐसी स्थिति में लखनऊ की रेसीडेंसी और आलमबाग में फिर से एक बार बंद कर दी गई अंग्रेजी सेना को उनके पक्के शत्रुओं से लड़कर उन्हें मुक्त करके अंग्रेजी सत्ता पर पड़ा दबाव कम करने का कार्य ही सबसे प्रमुख था। इस हेतु अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ क्या परिश्रम कर रहे हैं, यह पहले देखना चाहिए। 13 अगस्त को अंग्रेजों का नया कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन कैंपबेल कलकत्ता आ पहुंचा था। उस तारीख से 27 अक्तूबर तक वह आंग्ल सेनापति हिंदुस्थान देश को विद्रोहियों के हाथों से फिर जीत लेने को शीघ्र ही शुरू होनेवाली मुहिम की जंगी तैयारी कर रहा था। मद्रास, सीलोन और चीन जानेवाली अंग्रेजी सेना जैसे-जैसे कलकत्ता में उतरने लगी वैसे-वैसे उसका यथोचित विभाजन करने, कासिम बाजार की शस्त्राशाला में नई तोपें ढालने और शस्त्रास्त्र, रसद, रण वस्त्र, सैन्य वाहन आदि की सब ओर से यथासंभव उत्तम व्यवस्था में वह दो माह लगाकर अगली मुहिम की तैयारी में लगा ही था कि उसपर कोलिन को हैवलॉक और आउट्रम के अपने ही जाल में बंद हो जाने का समाचार मिला। तब उस- 'पतितं पतितं पुरुत्पतितम्', ऐसे लखनऊ शहर का झगड़ा मुझे ही निपटाना चाहिए, इस निश्चय से उसने 27 अक्टूबर को स्वयं कूच किया। इसी समय कर्नल पॉवेल और कैप्टन विलियम पील की अधीनता में नेवल ब्रिगेड नामक एक नौसेना तैयार कर उसने जलमार्ग से इलाहाबाद की ओर भेज दी थी। कलकत्ता से इलाहाबाद, कानपुर तक जो राजमार्ग फैले हुए थे उन रास्तों के आजू-बाजू विद्रोहियों की छोटी-छोटी टोलियां अंग्रेजी सेना का बहुत त्रास दे रही थी। वे टोलियां इकट्ठी ही जाती तो उनसे लड़ाई लड़ना अंग्रेजों को संभव था, पर कुंवर सिंह के प्रशिक्षण में तैयार पांडे लोगों की सेना अंग्रेजी सेना के चारों ओर मंडराते हुए लड़ाई के अवसर टालती हुई अपने अस्तित्व की सूचना अचानक आक्रमण के सिवाए अंग्रेजों को किसी भी अन्य प्रकार से न देते हुए उस पूरे प्रांत में छापामार पद्धति का हुड़दंग मचाए थी। उन लोगों से निपटना आसान नहीं था। ऐसी ही एक विद्रोही टुकड़ी को काजवा 1857 का स्वातंत्र्य समर – 300