भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

नदी से भगा देने के प्रयास में उस नौसेना का नायक पॉवेल मारा गया। पॉवेल जैसे आंग्ल वीर का उष्ण रक्त जिस दिन पांडे लोगों की तलवार पी रही थी उसी दिन कमांडर-इन-चीफ कानपुर आ पहुंचा। विद्रोही टोलियों ने रास्ते कैसे रोक रखे थे, उसका भयंकर अनुभव कानपुर पहुंचने के पहले स्वयं कमांडर-इन-चीफ को हो गया था। कोलिन एक गाड़ी से इलाहाबाद से कानपुर जा रहा था। अंग्रेजों को वाहनों की यद्यपि बहुत कठिनाई हो रही थी और उनका कमांडर-इन-चीफ एक मामूली गाड़ी में बैठकर कानपुर की ओर जा रहा था कि उसी समय उस रास्ते से जानेवाली विद्रोहियों की एक टुकड़ी हाथी पर बैठ शान से जा रही थी। उनके पास पच्चीस घुड़सवार भी थे। सर कोलिन के साथ सेना आदि कुछ भी नहीं थी। उसका गाड़ीवान घाटी के पास आया तो बाजू के रास्ते से विद्रोहियों की टोली उसी छोर पर आकर उसे मिली। उस गाड़ी में क्या माल भरा है, यह पांडे लोगों को पता न लगने से यद्यपि उनका ध्यान उसपर नहीं गया, परंतु उस गाड़ी के 'माल' के प्राण सूख गए। हिंदुस्थान फिर से जीतने के लिए कानपुर की ओर जानेवाला कमांडर-इन-चीफ अपने सामने उन दैत्य विद्रोहियों को अचानक भैरव की तरह प्रकट होते देख आगे का रास्ता छोड़कर पीछे के रास्ते भाग खड़ा हुआ। एक क्षण की देरी होती तो शिकार हाथ लग जाता। या फिर वह गाड़ीवाला केवल उंगली का निर्देश उन विद्रोहियों को कर देता तो जो हजारों वीरों के रण-कौशल से भी बलि न चढ़ता वह अंग्रेजों का कमांडर-इन-चीफ तत्काल कैद कराने का सौभाग्य उस गाड़ीवान को मिलने वाला था! एक क्षण का अंतर था, नहीं तो सर कोलिन अंग्रेजों के कमांडर-इन-चीफ को विद्रोही कैद कर लेते और अपने स्वदेशी कमांडर नाना साहब या कुंवर सिंह के सामने या एकदम यम के सामने प्रस्तुत कर देते। इस अनिष्ट से छूटते ही सर कोलिन नवंबर की 3 तारीख को कानपुर आ पहुंचा। उसके पहले ही ब्रिगेडियर ग्रेट के अधीन सेना एकत्रित कर ली गई थी। दिल्ली के आसपास के प्रदेश के विद्रोहियों का सफाया करते-करते दिल्ली के घेरे से खाली हुई सेना के साथ ग्रेट हेड नीचे उतरकर वहीं आ गया था। दिल्ली गिर जाने के बाद उसके आसपास के प्रदेश में शांति स्थापित करते इस ग्रेट हेड ने इलाहाबाद के नील का गर्व परिहार करने में जो शूरता दिखाई थी वह अप्रतिम और अनुपमेय है। विद्रोह होने के बाद से नवंबर माह तक वह प्रदेश विद्रोहियों के ही कब्जे में था। पर इस प्रदेश के वासियों को उन्होंने इतना कम त्रास दिया था कि स्वयं अंग्रेज कमांडर-इन-चीफ अपनी पुस्तक में लिखता है-“लोग निश्चिंत और पूर्णतः निरापद रूप में अपना कृषि कार्य करते थे। क्रांतिकारियों ने कहीं भी जनता को आवश्यकता से अधिक कष्ट नहीं दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने संपूर्ण प्रांत में बलात् तो कहीं भी कुछ नहीं किया।”133 1857 का स्वातंत्र्य समर - 301 133 कोलिन कृत- 'नैरेटिव ऑफ दि इंडियन म्यूटिनी', पृष्ठ 159 ।