भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 418 में से

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पृष्ठ 297

केवल अपनी सेना के लिए आवश्यक रसद प्राप्त करने से अधिक अत्याचार विद्रोहियों ने नहीं किया था। क्रांतियुद्ध के भयंकर प्रलय में भी हर वर्ष की तरह ही खेती विस्तार से की गई थी। जो स्वदेश के स्वयंसेवकों को शोभा दे, ऐसे ही व्यवहार से पांडे लोगों ने अपने प्रदेश की रक्षा की थी। पर गुलामी के संचालकों की तरह स्वतंत्रता के लिए प्रेरित उस देश को कुचलने को निकले अंग्रेजों ने उसे बेचिराग कर डाला! और वह सब शांति के लिए , गावं-के-गांव जलाते हुए, जो भी तगड़ा जवान मिला उसे फांसी पर चढ़ाते हुए, आकाशवासी पंछियों से भी अधिक बेरहमी से ग्रामवासियों को मारते हुए ग्रेट हेड की सेना दिल्ली से कानपुर आ पहुंची। तब उसे, नौसेना को और अन्य बड़ी सेना को इकट्ठा कर ब्रिगेडियर ग्रेट गंगा नदी उतरने लगा। हे गंगा माई! लखनऊ को मुक्त करने के लिए तेरे किनारे आई अंग्रेजी सेना की गिनती तूने की है? और हे मानिनी अवध! तू इस अंग्रेज सेना से डरकर अंधियारे कमरे में बंद अंग्रेज सत्ता को मुक्त कर रही है या नहीं? ब्रिगेडियर ग्रेट के अधीन पांच हजार गोरी सेना थी, उसके साथ ही सैकड़ों ऊंट और लखनऊ की सेना के लिए काफी रसद भी ली हुई थी। ग्रेट की इस सेना के आलमबाग तक मारधाड़ करते पहुंच जाने की बात समझते ही सर कोलिन ने कानपुर की ओर से गंगा नदी पार की। पीछे अपनी पीठ सुरक्षित रहे, इसलिए उसने चुनी हुई यूरोपीय और सिख सेना तोपों के साथ कानपुर में रखी थी और उसका अधिकारी यूरोप खंड के अनेक युद्धों के नामवर जनरल विंडहम को बनाया। गंगा पार करके 9 नवंबर को कोलिन आलमबाग पहुंचकर अपनी सेना से मिला। आलमबाग की सेना का बारीकी से निरीक्षण कर उसके अलग-अलग भागों को एक अभेद्य व्यूह-रचना में पिरोकर तारीख 14 को लखनऊ शहर पर अंग्रेजी सेना को भयानक हमला करने का आदेश दिया गया। लखनऊ की रेसीडेंसी में समाचार पहुंचाने और संग्राम की कूटनीति तय करने के लिए कन्हेनाव नामक एक साहसी अंग्रेज ने अपना मुंह काला कर, शरीर पर नेटिव कपड़े पहन, एक नेटिव को साथ लेकर विद्रोहियों के पहरे के बावजूद रात के समय जाकर कोलिन और आउट्रम के संदेश एक-दूसरे को पहले ही दे दिए थे। लखनऊ की रेसीडेंसी और आलमबाग की गोरी छावनी में हर किसी को 14 नवंबर कब उदय होता है, इसका इंतजार था। अपनी सेना के साथ हैवलॉक और आउट्रम शत्रु को बाहर की ओर दबाते रेसीडेंसी से निकलेंगे और बाहर की ओर से सर कोलिन रेसीडेंसी की ओर दबाते ले जाएंगे। इस समय अंग्रेजी में उनके अधिकतर नावर योद्धा और सेनापति जमा हो गए थे। हैवलॉक, आउट्रम, नौसेना का पील, ग्रेट हेड, दिल्ली का हडसन, बिग्रेडियर होप ग्रांट, आयर, स्वयं कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन कैंपबेल। ताजा दम यूरोपीय हायलैंडर्स, घेरे के कालमुख से भी बाहर कूदने में बहुत निडर, किसी भी साहस के गले मिलने के लिए आतुर आउट्रम के यूरोपियन, राजनिष्ठ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 302

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