भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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पंजाबी जवान और उन पंजाबियों से अधिक राजनिष्ठ दिल्ली में मातृभूमि के रक्त से सनी तलवारें धारण करनेवाले सिख। ऐसी यह अंग्रेजी सेना 14 नवंबर को लखनऊ शहर की ओर चली। वह सारा दिन विद्रोहियों और अंग्रेजी की छीना-झपटी में गया और शाम के समय अंग्रेजी सेना दिलखुश बाग तक शहर जीतती चली गई। वहां रात गुजारने की इच्छा से सर कोलिन ने डेरा डाला। उस रात भी विद्रोहियों के छुटपुट हमले बीच-बीच में चालू ही थे, तब भी अंग्रेजी सेना ने उसकी परवाह न करते हुए वहीं रात गुजारी। दूसरे दिन कोलिन ने अपनी सेना को फिर एक बार व्यूहबद्ध किया और तारीख 16 तारीख को लखनऊ जंगी हमला करने का आदेश दिया। आदेश पाते ही अंग्रेजीसेना उछलकर सिकंदर बाग पर टूट पड़ी। शहर के इस भाग तक अंग्रेजी सेना को विद्रोहियों ने कोई उल्लेखनीय बाधा खड़ी नहीं की। परंतु इस सिकंदर बाग पर कोई ऐसा वीर नियुक्त था जिसने उस बाग में युद्ध का भयंकर खेल रचा। ईवर्ट के अधीन हायलैंडर्स और पॉल के अधीन सिख एक कर्कश चीत्कार कर जब उस सिकंदर बाग पर टूटे तब अंग्रेजी सेना के आगे कोई टिक नहीं पाएगा, ऐसा लगा। सिखों का सरदार गोकुलसिंह अपनी तलवार ऊंची उठाएं कहीं हायलैंडर्स अपने सिख अनुयायियों से आगे न चले जाएं-इसलिए पूरा दम लगाए रहा। अभागा लखनऊ! उसके शरीर का रक्त कौन अधिक पीता है, इस निष्ठुर प्रतियोगिता से सिखों और हायलैंडरों की तलवारें सपासप वार कर रही थीं। परंतु सिकंदर बाग की पत्थर की मजबूत दीवारें किसी भी तरह हिल-डुल नहीं रही थी। परंतु सिकंदर बाग की पत्थर की मजबूत दीवारें किसी भी तरह हिल-डुल नहीं रही थी। और वे दीवारें हिलने लगीं तो भी उस बाग के वीरवर नहीं हिल रहे थे। क्योंकि तट की कुछ शिलाएं गिरते ही अंग्रेजीसेना तीर की तरह उस ओर चली-कौन आगे बढ़ता है? हायलैंडर या सिख? दोनों ने ही जोरदार दौड़ लगाई है। पर अंत में उस स्थान से जो पहले अंदर घुसा वह सिख ही था। उसके उस देशद्रोही साहस को पुरस्कृत करने के लिए उसके सीने में एक गोली घुसी! वह गिरा और तुरंत यह कूपर उसमें घुस गया। उसके पीछे-पीछे ईवर्ट गया, कैप्टन जॉन गया, फिर और हायलैंडर सैनिक तेजी से अंदर घुसते गए। अंदर के सिपाहियों को इस अंग्रेजी सेना को एकाएक अंदर देखकर आश्चर्य हुआ, परंतु उस दिन उस सिकंदर बाग के पास लड़ने के लिए अड़ा योद्धा का कोई सामान्य मनुष्य नहीं होगा। वह तो स्थान छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। विजय या मृत्यु! मृत्यु या जय! शाबाश वीर, शाबाश! स्वतंत्रता के लिए लड़ते वीर को यही गर्जना शोभा देती है। अंग्रेजी सेना का कूपर इस बाग की दीवार से घुसा है, इसलिए उसका काम तमाम करने के लिए उस बहादुर सिपाही की खटपट चालू है। लुधियाना से विद्रोह करके आए सिपाहियों के उस शूर नेटिवव अधिकारी के सिवाए यह काम किसी अन्य से नहीं हो सकता। आया! कूपर को खोजते-खोजते वह कृतांत उसपद दौड़ पड़ा। खनखनाहट-सपासप-काट-छांट- 1857 का स्वातंत्र्य समर - 303