भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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कूपर को उसने और कूपर ने उसे एक ही समय काट डाला। दोनों ही खेत रहे। लैंफ्सडेन अपने हाथ की तलवार घुमाते चिल्लाने लगा, "देख क्या रहे हो! स्कॉटलैंड की परीक्षा की घड़ी है, आगे बढ़ो" कैसी उद्दाम भाषा। स्कॉटलैंड के सम्मान में! और हिंदुस्थान को कोई सम्मान ही नहीं है क्या स्कॉटलैंड के सम्मान के लिए कोई गोरा आने से पहले ही हिंदुस्थान के सम्मान में एक काला वीर गुस्से से भरा आया। लैंफ्सडेन के शव से रक्त बहने लगा। ऐसे स्थान-स्थान पर भयानक लड़ाई चल रही थी कि तभी दूसरी जगह से दरवाजा फोड़ वहां से भी अंग्रेजी सेना का सागर उस बाग में घुसने लगा। अब इस बाग को जीत की आशा नहीं रही। फिर ऐ सिकंदर बाग! चाहे विजय हाथ से निकल गई है, फिर भी तू लड़ता ही रहेगा क्या? लड़-लड़, वैसे ही लड़! विजय जाए, पर सम्मान न जाए, यश नहीं जाने देना। कर्तव्य मान रण-मैदान में कूद पड़! दरवाजे-दरवाजे, सीढ़ी-सीढ़ी पर खनखनाती तलवारें भिड़ी रहीं। रक्त की कीच चारों ओर मचाती रही। मैलसन कहता है- "भयानक रक्तपात और घमासान मार-धाड़ चली। निराशा के अतुल शौर्य से विद्रोही लड़ते रहे। अंग्रेजी सेना ने उस स्थान के अंदर का भाग भी कब्जा लिया। फिर भी लड़ाई का अंत न हो। हर कमरा, हर सीढ़ी, हर बुर्ज, हर कोना भारी जिद के साथ लड़ता रहा। 'शरण' शब्द का उच्चारण किसी ने नही किया, किसी ने सुना नहीं जब वह सारा स्थान अंग्रेजों ने जीत लिया तब ध्यान में आया कि उस बाग में दो हजार शव विद्रोहियों के पड़े हुए हैं। उस बाग में उनकी जो सेना थी उसमें से केवल चार ही जन शायद लड़ाई छोड़कर भागे होंगे। परंतु चार भी भागे या नहीं, यह संदेह ही है।"134 सिकंदर बाग में देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ते-लड़ते मरनेवाले शहीदों, दो हजार वीरों! तुम्हारी उस पवित्र स्मृति में यह इतिहास अर्पित है। दो हजार गाजियों का रक्त ! दो हजार देशवीरों का रक्त! उस रक्त पर या कृतज्ञ इतिहास अर्पित है। देश के लिए लड़ मरे-तुम कौन थे? तुम्हारे नाम क्या था? तुममे यह सिद्धांतनिष्ठा की ज्योति प्रकाशित थी तब उसे चैतन्य रखनेवाला कौन सा वीरवर नेता तुम्हें धारातीर्थ का संकल्प दे रहा था? यह कहन का महद्भाग्य, विश्व-कल्याण के लिए उपकारक कर्मों में देह घिसनेवाले तुम संत-विभूतियों का नाम उच्चारण करने या लिखने का महद्भाग्य यद्यपि हमारे भाग्य में नहीं, फिर भी तुम्हारी वीर्य स्मृति को यह कृतज्ञ इतिहास अर्पित हो। विजय गई, परंतु तुमने स्वकीय यश को भंग नहीं होने दिया। विजय गई, पर तुमने स्वयश को उष्ण रक्त के दो हजार फब्बारों के नीचे सुस्नान निर्मल रखा हुआ है! तुम्हारा रक्त-भूतकाल की तिलांजलि-आगामी वीरों की संजीवनी बने! तुम्हें सफलता नही मिली, पर स्वतंत्रता के गाजियों, यह सिकंदर बाग का आत्मयज्ञ यदि सही मुहूर्त पर आरंभ किया गया होता तो तुम्हें विजय भी मिलती। अब तुम्हारे शत्रु 1857 का स्वातंत्र्य समर - 304 134 मैलसन कृत-'म्युटिनी', खंड 4 पृष्ठ 132 ।