भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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की शक्ति कितनी बढ़ी है। उनके हजारों नए योद्धा रण की ओर बढ़ रहे हैं। दिल्ली गिर जाने से तनाव कम हो गया है। विजय के कारण नैतिक बल बढ़ा हुआ है और पराजय से तुम्हारी मानसिक शक्तियां क्षीण उनके हजारों नए योद्धा रण की ओर बढ़ रहे हैं। दिल्ली गिर जाने से तनाव कम हो गया है। विजय के कारण नैतिक बल बढ़ा हुआ है और पराजय से तुम्हारी मानसिक शक्तियां क्षीण हुई हैं। ऐसी रूखी और निर्बीज भूमि में दो हजार का रक्त भी नमी नहीं ला सकता। परंतु दो माह पहले यदि ये दो हजार रक्त मेघ देशवीरत्व की तैयारी से इस भूमि की ओर मुड़े होते तो, यदि लखनऊ में पहली सलामी होते ही अंग्रेजी सत्ता की दुर्बल रेसीडेंसी पर ऐसे ही मारेंगे या मरेंगे, इस निश्चय से हमला करने हजारों लोग गए होते तो आधे घंटे के अंदर हिंदुस्थान के सिर पर तुम्हें जो चाहिए था। वह स्वराज्य का मुकुट चमकने लग गया होता। मर गए, पर मरने का मुहूर्त गलत था समय गया-घटी कभी की डूब गई-एक रक्त बिंदु से उस समय विजय मिली होती, अब रक्त के हौज से उड़ेले तो भी सुयश मिलेगा, पर विजय मिलनी कठिन है! राज्य क्रांति जैसी भयंकर वेग की आंधी में एक क्षण की ढील हुई और बात गई। एक पैर पीछे लिया तो वह टूटा ही, एक क्षण को जान प्यारी हुई और हमेशा के लिए मृत्यु आई। क्रांति के दरबार की प्रथम सावधानी-यह कि-'बूंद से गई, वह हौज से नहीं आती।' रक्त के हौज सिकंदर बाग में जैसे भरे वैसे ही अन्य रणक्षेत्रों में भी भरे। दिलखुशबाग, आलमबाग, शहानजीफ-सारे स्थान उस दिन और उस रात शत्रु के साथ जूझते रहे। भोर होते ही लखनऊ शहर के सारे घंटे घनघना उठे। नगाड़े बजे और फिर उस रक्त से नहाए शहर ने शत्रु से टक्कर लेनी शुरू की। कल का शहानजीफ का झगड़ा और आज का मोतीमहल का झगड़ा। जैसे को तैसा होने लगा। परंतु अंग्रेजी झंडा ही सबल साबित हुआ और अंग्रेजी सेना रेसीडेंसी में बंद अपने देशबंधुओं को मुक्त करने में सफल हुई। तारीख 17, 18, 19, से 23 नवंबर तक लखनऊ में लड़ाई-पर-लड़ाई लड़ते अंत में वह घिरी हुई और घेरा तोड़ने आई अंग्रेजी सेना एक-दूसरे को मिली। जिस रेसीडेंसी पर आज तक मृत्यु की छाया था उस रेसीडेंसी में अब विजय का हास्य खिल उठा। परंतु इस आंग्ल विजय को विद्रोही अभी भी महत्त्व नहीं रहे थे। ये दोनों अंग्रेजी सेना इकट्ठी हो गई और रक्त के प्रत्यक्ष समुद्र में वह शहर तैरने लगा, तब भी वहां के क्रांतिवीर समर्पण करने या भाग जाने को तैयार नहीं थे। उनकी इस दृढ़ता और धैर्य के कारण लड़ाई फिर से कब शुरू हो जाए, यह बिल्कुल अनिश्चित था। इसलिए पिछली रात की मारामारी में छिटकी अंग्रेजी सेना को फिर से एक बार व्यवस्थित करने का कार्य सर कोलिन ने प्रारंभ किया। उसने रेसीडेंसी छोड़कर दिलखुशबाग में सारी सेना इकट्ठी की। आगे की लड़ाई के लिए आवश्यक संगठन बनाया और कब्जाए आलमबाग में आउट्रम के अधीन उस विस्तीर्ण मार-काट में शेष रही लगभग चार हजार सेना और पच्चीस तोपें रख दीं और इस विजय के लिए उसने अपनी सेना की शूरता, अनुशासन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 305