भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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और आदेश-पालन की यथार्थ स्तुति की। उस स्तुति शूरता में बड़ा हिस्सा जनरल हैवलॉक का था। परंतु जब तक अंग्रेजी सेना वह विजयानंद मनाए, तब तक उस विजयानंद का मुख्य हिस्सेदार हैवलॉक यकायक मर गया। लखनऊ के रण क्षेत्र में अति तनाव, चिंता और निराशा से पस्त हुआ ऐन विजय रंग में यह बहादुर हैवलॉक मर गया। तारीख 24 का अंग्रेजी विजय में इस मृत्यु ने यह विष घोल दिया। फिर भी, हैवलॉक के बाद उसके पुत्र और पत्नी को सरदारी का सम्मान देकर इंग्लैंड कृतज्ञ हुआ। परंतु वह समय मरे हुए के शोक में डूबने का नहीं, उसकी अधूरी आशापूरी करने का था। लखनऊ विजय के लिए हैवलॉक मरा, इसलिए उसकी मृत्यु के बाद उसकी वास्तविक सेना करना अर्थात् लखनऊ शहर जीतना था। परंतु लखनऊ जीतना निकलने से पहले इधर कानपुर में ये तोपों के आकस्मिक धमाके क्यों शुरू हो गए हैं? होंगे किसी के लिए। युरोप के युद्ध का प्रख्यात वीर विंडहम जब तक कानपुर में है तब तक वहां की तोपों के धमाकों से सर कोलिन के सीने की धड़कने बढ़ने का कोई कारण नहीं। परंतु सर कोलिन को जैसा विंडहम कानपुर में है वैसा ही तात्या टोपे भी वहां आया है, यह समाचार मिला है। तात्या टोपे कानपुर में ही है? सर कोलिन को तोपों के उन धमाकों का भयंकर अर्थ ध्यान में आया और वह लखनऊ आउट्रम के हवाले कर अति वेग से स्वयं यह जानने दौड़ा कि कानपुर में तात्या टोपे क्या गड़बड़ कर रहा है! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 306