१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण-6 तात्या टोपे कानपुर में अपनी सेना की हार के बाद श्रीमंत नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे दोनों रात बारह बजे के आसपास ब्रह्मवर्त में आ गए। वहां रात गुजारकर दूसरे दिन सुबह उनके छोटे भाई बाला साहब, भतीजे राव साहब और तात्या टोपे आदि लोग राजवंश की महिलाओं के साथ नौकाओं में बैठकर गंगा पर उतर गए और लखनऊ प्रांत के फतेहपुर शहर में आ पहुंचे। वहां नाना का परम स्नेही चौधरी भोपाल सिंह था। उसने उन सब लोगों का सादर सत्कार किया और अपने यहां सबको राख लिया। कानपुर की लड़ाई में बीच में तितर-बितर हुई सेना की फिर से व्यवस्था करने में लगे थे। थोड़े ही दिनों में विद्रोह कर उठी 42वीं रेजिमेंट नाना के निशान के नीचे लड़ने का संकल्प कर शिवराजपुर तक आ गई और वहां से उसने सर्वसम्मति से श्रीमंत नाना साहब को उसे ले जाने को कोई अधिकारी आदमी भेजने का निवेदन किया। इस निवेदन के अनुसार श्रीमंत नाना ने तात्या टोपे को शिवराजपुर की ओर उस रेजिमेंट को लाने का अधिकार देकर भेजा और आदेश के अनुसार तात्या उस रेजिमेंट को नाना के निशान के नीचे ले आए। तात्या को शिवराजपुर की यह सेना मिलते ही उसने हैवलॉक की पीठ पर, पूर्व कथन के अनुसार, दांव-पेज प्रारंभ किए और उस आंग्ल वीर को अवध से खींचकर वापस कानपुर ले आया। हैवलॉक कानपुर में आकर देखता है तो यह विचित्र 1857 का स्वातंत्र्य समर - 307