१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
लिए उत्सुक लखनऊ शहर ने अंग्रेजी सत्ता को फिर एक बार कैद कर दिया। स्वतंत्रता संग्राम के पांडे लोगों के इस दृढ़ निश्चयी व्यवहार से केवल लखनऊ की अंग्रेज सेना ही कैंची में नहीं फंसी वरन् कलकत्ता से अलीगढ़ तक सारे प्रदेश में अंग्रेजी सेना पर जंगी दबाव पड़ने लगा। हैवलॉक के नेतृत्व में अंग्रेजों की सारी-की-सारी सेना लखनऊ पर आक्रमण के लिए भेज दी गई थी और जब उस सेना की सहायता से लखनऊ में बंद अंग्रेजी सेना मुक्त होने के बदले वहां अटककर रह गई तब नीचे के सारे प्रदेश में अंग्रेजी सत्ता लूली पड़ने लगी। इसी समय दिल्ली जीते जाने के कारण यद्यपि वहां की कुछ सेना खाली हो गई थी, परंतु वह दिल्ली जीते जाने के कारण यद्यपि वहां की कुछ सेना खाली हो गयी थी, परंतु वह दिल्ली के आसपास के प्रदेश में शांति स्थापित करने के काम में लगी हुई थी। ऐसी स्थिति में लखनऊ की रेसीडेंसी और आलमबाग में फिर से एक बार बंद कर दी गई अंग्रेजी सेना को उनके पक्के शत्रुओं से लड़कर उन्हें मुक्त करके अंग्रेजी सत्ता पर पड़ा दबाव कम करने का कार्य ही सबसे प्रमुख था। इस हेतु अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ क्या परिश्रम कर रहे हैं, यह पहले देखना चाहिए। 13 अगस्त को अंग्रेजों का नया कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन कैंपबेल कलकत्ता आ पहुंचा था। उस तारीख से 27 अक्तूबर तक वह आंग्ल सेनापति हिंदुस्थान देश को विद्रोहियों के हाथों से फिर जीत लेने को शीघ्र ही शुरू होनेवाली मुहिम की जंगी तैयारी कर रहा था। मद्रास, सीलोन और चीन जानेवाली अंग्रेजी सेना जैसे-जैसे कलकत्ता में उतरने लगी वैसे-वैसे उसका यथोचित विभाजन करने, कासिम बाजार की शस्त्राशाला में नई तोपें ढालने और शस्त्रास्त्र, रसद, रण वस्त्र, सैन्य वाहन आदि की सब ओर से यथासंभव उत्तम व्यवस्था में वह दो माह लगाकर अगली मुहिम की तैयारी में लगा ही था कि उसपर कोलिन को हैवलॉक और आउट्रम के अपने ही जाल में बंद हो जाने का समाचार मिला। तब उस- 'पतितं पतितं पुरुत्पतितम्', ऐसे लखनऊ शहर का झगड़ा मुझे ही निपटाना चाहिए, इस निश्चय से उसने 27 अक्टूबर को स्वयं कूच किया। इसी समय कर्नल पॉवेल और कैप्टन विलियम पील की अधीनता में नेवल ब्रिगेड नामक एक नौसेना तैयार कर उसने जलमार्ग से इलाहाबाद की ओर भेज दी थी। कलकत्ता से इलाहाबाद, कानपुर तक जो राजमार्ग फैले हुए थे उन रास्तों के आजू-बाजू विद्रोहियों की छोटी-छोटी टोलियां अंग्रेजी सेना का बहुत त्रास दे रही थी। वे टोलियां इकट्ठी ही जाती तो उनसे लड़ाई लड़ना अंग्रेजों को संभव था, पर कुंवर सिंह के प्रशिक्षण में तैयार पांडे लोगों की सेना अंग्रेजी सेना के चारों ओर मंडराते हुए लड़ाई के अवसर टालती हुई अपने अस्तित्व की सूचना अचानक आक्रमण के सिवाए अंग्रेजों को किसी भी अन्य प्रकार से न देते हुए उस पूरे प्रांत में छापामार पद्धति का हुड़दंग मचाए थी। उन लोगों से निपटना आसान नहीं था। ऐसी ही एक विद्रोही टुकड़ी को काजवा 1857 का स्वातंत्र्य समर – 300
नदी से भगा देने के प्रयास में उस नौसेना का नायक पॉवेल मारा गया। पॉवेल जैसे आंग्ल वीर का उष्ण रक्त जिस दिन पांडे लोगों की तलवार पी रही थी उसी दिन कमांडर-इन-चीफ कानपुर आ पहुंचा। विद्रोही टोलियों ने रास्ते कैसे रोक रखे थे, उसका भयंकर अनुभव कानपुर पहुंचने के पहले स्वयं कमांडर-इन-चीफ को हो गया था। कोलिन एक गाड़ी से इलाहाबाद से कानपुर जा रहा था। अंग्रेजों को वाहनों की यद्यपि बहुत कठिनाई हो रही थी और उनका कमांडर-इन-चीफ एक मामूली गाड़ी में बैठकर कानपुर की ओर जा रहा था कि उसी समय उस रास्ते से जानेवाली विद्रोहियों की एक टुकड़ी हाथी पर बैठ शान से जा रही थी। उनके पास पच्चीस घुड़सवार भी थे। सर कोलिन के साथ सेना आदि कुछ भी नहीं थी। उसका गाड़ीवान घाटी के पास आया तो बाजू के रास्ते से विद्रोहियों की टोली उसी छोर पर आकर उसे मिली। उस गाड़ी में क्या माल भरा है, यह पांडे लोगों को पता न लगने से यद्यपि उनका ध्यान उसपर नहीं गया, परंतु उस गाड़ी के 'माल' के प्राण सूख गए। हिंदुस्थान फिर से जीतने के लिए कानपुर की ओर जानेवाला कमांडर-इन-चीफ अपने सामने उन दैत्य विद्रोहियों को अचानक भैरव की तरह प्रकट होते देख आगे का रास्ता छोड़कर पीछे के रास्ते भाग खड़ा हुआ। एक क्षण की देरी होती तो शिकार हाथ लग जाता। या फिर वह गाड़ीवाला केवल उंगली का निर्देश उन विद्रोहियों को कर देता तो जो हजारों वीरों के रण-कौशल से भी बलि न चढ़ता वह अंग्रेजों का कमांडर-इन-चीफ तत्काल कैद कराने का सौभाग्य उस गाड़ीवान को मिलने वाला था! एक क्षण का अंतर था, नहीं तो सर कोलिन अंग्रेजों के कमांडर-इन-चीफ को विद्रोही कैद कर लेते और अपने स्वदेशी कमांडर नाना साहब या कुंवर सिंह के सामने या एकदम यम के सामने प्रस्तुत कर देते। इस अनिष्ट से छूटते ही सर कोलिन नवंबर की 3 तारीख को कानपुर आ पहुंचा। उसके पहले ही ब्रिगेडियर ग्रेट के अधीन सेना एकत्रित कर ली गई थी। दिल्ली के आसपास के प्रदेश के विद्रोहियों का सफाया करते-करते दिल्ली के घेरे से खाली हुई सेना के साथ ग्रेट हेड नीचे उतरकर वहीं आ गया था। दिल्ली गिर जाने के बाद उसके आसपास के प्रदेश में शांति स्थापित करते इस ग्रेट हेड ने इलाहाबाद के नील का गर्व परिहार करने में जो शूरता दिखाई थी वह अप्रतिम और अनुपमेय है। विद्रोह होने के बाद से नवंबर माह तक वह प्रदेश विद्रोहियों के ही कब्जे में था। पर इस प्रदेश के वासियों को उन्होंने इतना कम त्रास दिया था कि स्वयं अंग्रेज कमांडर-इन-चीफ अपनी पुस्तक में लिखता है-“लोग निश्चिंत और पूर्णतः निरापद रूप में अपना कृषि कार्य करते थे। क्रांतिकारियों ने कहीं भी जनता को आवश्यकता से अधिक कष्ट नहीं दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने संपूर्ण प्रांत में बलात् तो कहीं भी कुछ नहीं किया।”133 1857 का स्वातंत्र्य समर - 301 133 कोलिन कृत- 'नैरेटिव ऑफ दि इंडियन म्यूटिनी', पृष्ठ 159 ।
केवल अपनी सेना के लिए आवश्यक रसद प्राप्त करने से अधिक अत्याचार विद्रोहियों ने नहीं किया था। क्रांतियुद्ध के भयंकर प्रलय में भी हर वर्ष की तरह ही खेती विस्तार से की गई थी। जो स्वदेश के स्वयंसेवकों को शोभा दे, ऐसे ही व्यवहार से पांडे लोगों ने अपने प्रदेश की रक्षा की थी। पर गुलामी के संचालकों की तरह स्वतंत्रता के लिए प्रेरित उस देश को कुचलने को निकले अंग्रेजों ने उसे बेचिराग कर डाला! और वह सब शांति के लिए , गावं-के-गांव जलाते हुए, जो भी तगड़ा जवान मिला उसे फांसी पर चढ़ाते हुए, आकाशवासी पंछियों से भी अधिक बेरहमी से ग्रामवासियों को मारते हुए ग्रेट हेड की सेना दिल्ली से कानपुर आ पहुंची। तब उसे, नौसेना को और अन्य बड़ी सेना को इकट्ठा कर ब्रिगेडियर ग्रेट गंगा नदी उतरने लगा। हे गंगा माई! लखनऊ को मुक्त करने के लिए तेरे किनारे आई अंग्रेजी सेना की गिनती तूने की है? और हे मानिनी अवध! तू इस अंग्रेज सेना से डरकर अंधियारे कमरे में बंद अंग्रेज सत्ता को मुक्त कर रही है या नहीं? ब्रिगेडियर ग्रेट के अधीन पांच हजार गोरी सेना थी, उसके साथ ही सैकड़ों ऊंट और लखनऊ की सेना के लिए काफी रसद भी ली हुई थी। ग्रेट की इस सेना के आलमबाग तक मारधाड़ करते पहुंच जाने की बात समझते ही सर कोलिन ने कानपुर की ओर से गंगा नदी पार की। पीछे अपनी पीठ सुरक्षित रहे, इसलिए उसने चुनी हुई यूरोपीय और सिख सेना तोपों के साथ कानपुर में रखी थी और उसका अधिकारी यूरोप खंड के अनेक युद्धों के नामवर जनरल विंडहम को बनाया। गंगा पार करके 9 नवंबर को कोलिन आलमबाग पहुंचकर अपनी सेना से मिला। आलमबाग की सेना का बारीकी से निरीक्षण कर उसके अलग-अलग भागों को एक अभेद्य व्यूह-रचना में पिरोकर तारीख 14 को लखनऊ शहर पर अंग्रेजी सेना को भयानक हमला करने का आदेश दिया गया। लखनऊ की रेसीडेंसी में समाचार पहुंचाने और संग्राम की कूटनीति तय करने के लिए कन्हेनाव नामक एक साहसी अंग्रेज ने अपना मुंह काला कर, शरीर पर नेटिव कपड़े पहन, एक नेटिव को साथ लेकर विद्रोहियों के पहरे के बावजूद रात के समय जाकर कोलिन और आउट्रम के संदेश एक-दूसरे को पहले ही दे दिए थे। लखनऊ की रेसीडेंसी और आलमबाग की गोरी छावनी में हर किसी को 14 नवंबर कब उदय होता है, इसका इंतजार था। अपनी सेना के साथ हैवलॉक और आउट्रम शत्रु को बाहर की ओर दबाते रेसीडेंसी से निकलेंगे और बाहर की ओर से सर कोलिन रेसीडेंसी की ओर दबाते ले जाएंगे। इस समय अंग्रेजी में उनके अधिकतर नावर योद्धा और सेनापति जमा हो गए थे। हैवलॉक, आउट्रम, नौसेना का पील, ग्रेट हेड, दिल्ली का हडसन, बिग्रेडियर होप ग्रांट, आयर, स्वयं कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन कैंपबेल। ताजा दम यूरोपीय हायलैंडर्स, घेरे के कालमुख से भी बाहर कूदने में बहुत निडर, किसी भी साहस के गले मिलने के लिए आतुर आउट्रम के यूरोपियन, राजनिष्ठ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 302
पंजाबी जवान और उन पंजाबियों से अधिक राजनिष्ठ दिल्ली में मातृभूमि के रक्त से सनी तलवारें धारण करनेवाले सिख।
ऐसी यह अंग्रेजी सेना 14 नवंबर को लखनऊ शहर की ओर चली। वह सारा दिन विद्रोहियों और अंग्रेजी की छीना-झपटी में
गया और शाम के समय अंग्रेजी सेना दिलखुश बाग तक शहर जीतती चली गई। वहां रात गुजारने की इच्छा से सर कोलिन
ने डेरा डाला। उस रात भी विद्रोहियों के छुटपुट हमले बीच-बीच में चालू ही थे, तब भी अंग्रेजी सेना ने उसकी परवाह न
करते हुए वहीं रात गुजारी। दूसरे दिन कोलिन ने अपनी सेना को फिर एक बार व्यूहबद्ध किया और तारीख 16 तारीख को
लखनऊ जंगी हमला करने का आदेश दिया। आदेश पाते ही अंग्रेजीसेना उछलकर सिकंदर बाग पर टूट पड़ी। शहर के इस भाग तक अंग्रेजी सेना को विद्रोहियों ने कोई उल्लेखनीय बाधा खड़ी नहीं की। परंतु इस सिकंदर बाग पर कोई ऐसा वीर नियुक्त था जिसने उस बाग में युद्ध का भयंकर खेल रचा। ईवर्ट के अधीन हायलैंडर्स और पॉल के अधीन सिख एक कर्कश चीत्कार कर जब उस सिकंदर बाग पर टूटे तब अंग्रेजी सेना के आगे कोई टिक नहीं पाएगा, ऐसा लगा। सिखों का सरदार गोकुलसिंह अपनी तलवार ऊंची उठाएं कहीं हायलैंडर्स अपने सिख अनुयायियों से आगे न चले जाएं-इसलिए पूरा दम लगाए रहा। अभागा लखनऊ! उसके शरीर का रक्त कौन अधिक पीता है, इस निष्ठुर प्रतियोगिता से सिखों और हायलैंडरों की तलवारें सपासप वार कर रही थीं। परंतु सिकंदर बाग की पत्थर की मजबूत दीवारें किसी भी तरह हिल-डुल नहीं रही थी। परंतु सिकंदर बाग की पत्थर की मजबूत दीवारें किसी भी तरह हिल-डुल नहीं रही थी। और वे दीवारें हिलने लगीं तो भी उस बाग के वीरवर नहीं हिल रहे थे। क्योंकि तट की कुछ शिलाएं गिरते ही अंग्रेजीसेना तीर की तरह उस ओर चली-कौन
आगे बढ़ता है? हायलैंडर या सिख? दोनों ने ही जोरदार दौड़ लगाई है। पर अंत में उस स्थान से जो पहले अंदर घुसा वह
सिख ही था। उसके उस देशद्रोही साहस को पुरस्कृत करने के लिए उसके सीने में एक गोली घुसी! वह गिरा और तुरंत
यह कूपर उसमें घुस गया। उसके पीछे-पीछे ईवर्ट गया, कैप्टन जॉन गया, फिर और हायलैंडर सैनिक तेजी से अंदर घुसते
गए। अंदर के सिपाहियों को इस अंग्रेजी सेना को एकाएक अंदर देखकर आश्चर्य हुआ, परंतु उस दिन उस सिकंदर बाग के
पास लड़ने के लिए अड़ा योद्धा का कोई सामान्य मनुष्य नहीं होगा। वह तो स्थान छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।
विजय या मृत्यु! मृत्यु या जय! शाबाश वीर, शाबाश! स्वतंत्रता के लिए लड़ते वीर को यही गर्जना शोभा देती है। अंग्रेजी सेना
का कूपर इस बाग की दीवार से घुसा है, इसलिए उसका काम तमाम करने के लिए उस बहादुर सिपाही की खटपट चालू
है। लुधियाना से विद्रोह करके आए सिपाहियों के उस शूर नेटिवव अधिकारी के सिवाए यह काम किसी अन्य से नहीं हो
सकता। आया! कूपर को खोजते-खोजते वह कृतांत उसपद दौड़ पड़ा। खनखनाहट-सपासप-काट-छांट-
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कूपर को उसने और कूपर ने उसे एक ही समय काट डाला। दोनों ही खेत रहे। लैंफ्सडेन अपने हाथ की तलवार घुमाते चिल्लाने लगा, "देख क्या रहे हो! स्कॉटलैंड की परीक्षा की घड़ी है, आगे बढ़ो" कैसी उद्दाम भाषा। स्कॉटलैंड के सम्मान में! और हिंदुस्थान को कोई सम्मान ही नहीं है क्या स्कॉटलैंड के सम्मान के लिए कोई गोरा आने से पहले ही हिंदुस्थान के सम्मान में एक काला वीर गुस्से से भरा आया। लैंफ्सडेन के शव से रक्त बहने लगा। ऐसे स्थान-स्थान पर भयानक लड़ाई चल रही थी कि तभी दूसरी जगह से दरवाजा फोड़ वहां से भी अंग्रेजी सेना का सागर उस बाग में घुसने लगा। अब इस बाग को जीत की आशा नहीं रही। फिर ऐ सिकंदर बाग! चाहे विजय हाथ से निकल गई है, फिर भी तू लड़ता ही रहेगा क्या? लड़-लड़, वैसे ही लड़! विजय जाए, पर सम्मान न जाए, यश नहीं जाने देना। कर्तव्य मान रण-मैदान में कूद पड़! दरवाजे-दरवाजे, सीढ़ी-सीढ़ी पर खनखनाती तलवारें भिड़ी रहीं। रक्त की कीच चारों ओर मचाती रही। मैलसन कहता है- "भयानक रक्तपात और घमासान मार-धाड़ चली। निराशा के अतुल शौर्य से विद्रोही लड़ते रहे। अंग्रेजी सेना ने उस स्थान के अंदर का भाग भी कब्जा लिया। फिर भी लड़ाई का अंत न हो। हर कमरा, हर सीढ़ी, हर बुर्ज, हर कोना भारी जिद के साथ लड़ता रहा। 'शरण' शब्द का उच्चारण किसी ने नही किया, किसी ने सुना नहीं जब वह सारा स्थान अंग्रेजों ने जीत लिया तब ध्यान में आया कि उस बाग में दो हजार शव विद्रोहियों के पड़े हुए हैं। उस बाग में उनकी जो सेना थी उसमें से केवल चार ही जन शायद लड़ाई छोड़कर भागे होंगे। परंतु चार भी भागे या नहीं, यह संदेह ही है।"134 सिकंदर बाग में देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ते-लड़ते मरनेवाले शहीदों, दो हजार वीरों! तुम्हारी उस पवित्र स्मृति में यह इतिहास अर्पित है। दो हजार गाजियों का रक्त ! दो हजार देशवीरों का रक्त! उस रक्त पर या कृतज्ञ इतिहास अर्पित है। देश के लिए लड़ मरे-तुम कौन थे? तुम्हारे नाम क्या था? तुममे यह सिद्धांतनिष्ठा की ज्योति प्रकाशित थी तब उसे चैतन्य रखनेवाला कौन सा वीरवर नेता तुम्हें धारातीर्थ का संकल्प दे रहा था? यह कहन का महद्भाग्य, विश्व-कल्याण के लिए उपकारक कर्मों में देह घिसनेवाले तुम संत-विभूतियों का नाम उच्चारण करने या लिखने का महद्भाग्य यद्यपि हमारे भाग्य में नहीं, फिर भी तुम्हारी वीर्य स्मृति को यह कृतज्ञ इतिहास अर्पित हो। विजय गई, परंतु तुमने स्वकीय यश को भंग नहीं होने दिया। विजय गई, पर तुमने स्वयश को उष्ण रक्त के दो हजार फब्बारों के नीचे सुस्नान निर्मल रखा हुआ है! तुम्हारा रक्त-भूतकाल की तिलांजलि-आगामी वीरों की संजीवनी बने! तुम्हें सफलता नही मिली, पर स्वतंत्रता के गाजियों, यह सिकंदर बाग का आत्मयज्ञ यदि सही मुहूर्त पर आरंभ किया गया होता तो तुम्हें विजय भी मिलती। अब तुम्हारे शत्रु 1857 का स्वातंत्र्य समर - 304 134 मैलसन कृत-'म्युटिनी', खंड 4 पृष्ठ 132 ।
की शक्ति कितनी बढ़ी है। उनके हजारों नए योद्धा रण की ओर बढ़ रहे हैं। दिल्ली गिर जाने से तनाव कम हो गया है। विजय के कारण नैतिक बल बढ़ा हुआ है और पराजय से तुम्हारी मानसिक शक्तियां क्षीण उनके हजारों नए योद्धा रण की ओर बढ़ रहे हैं। दिल्ली गिर जाने से तनाव कम हो गया है। विजय के कारण नैतिक बल बढ़ा हुआ है और पराजय से तुम्हारी मानसिक शक्तियां क्षीण हुई हैं। ऐसी रूखी और निर्बीज भूमि में दो हजार का रक्त भी नमी नहीं ला सकता। परंतु दो माह पहले यदि ये दो हजार रक्त मेघ देशवीरत्व की तैयारी से इस भूमि की ओर मुड़े होते तो, यदि लखनऊ में पहली सलामी होते ही अंग्रेजी सत्ता की दुर्बल रेसीडेंसी पर ऐसे ही मारेंगे या मरेंगे, इस निश्चय से हमला करने हजारों लोग गए होते तो आधे घंटे के अंदर हिंदुस्थान के सिर पर तुम्हें जो चाहिए था। वह स्वराज्य का मुकुट चमकने लग गया होता। मर गए, पर मरने का मुहूर्त गलत था समय गया-घटी कभी की डूब गई-एक रक्त बिंदु से उस समय विजय मिली होती, अब रक्त के हौज से उड़ेले तो भी सुयश मिलेगा, पर विजय मिलनी कठिन है! राज्य क्रांति जैसी भयंकर वेग की आंधी में एक क्षण की ढील हुई और बात गई। एक पैर पीछे लिया तो वह टूटा ही, एक क्षण को जान प्यारी हुई और हमेशा के लिए मृत्यु आई। क्रांति के दरबार की प्रथम सावधानी-यह कि-'बूंद से गई, वह हौज से नहीं आती।' रक्त के हौज सिकंदर बाग में जैसे भरे वैसे ही अन्य रणक्षेत्रों में भी भरे। दिलखुशबाग, आलमबाग, शहानजीफ-सारे स्थान उस दिन और उस रात शत्रु के साथ जूझते रहे। भोर होते ही लखनऊ शहर के सारे घंटे घनघना उठे। नगाड़े बजे और फिर उस रक्त से नहाए शहर ने शत्रु से टक्कर लेनी शुरू की। कल का शहानजीफ का झगड़ा और आज का मोतीमहल का झगड़ा। जैसे को तैसा होने लगा। परंतु अंग्रेजी झंडा ही सबल साबित हुआ और अंग्रेजी सेना रेसीडेंसी में बंद अपने देशबंधुओं को मुक्त करने में सफल हुई। तारीख 17, 18, 19, से 23 नवंबर तक लखनऊ में लड़ाई-पर-लड़ाई लड़ते अंत में वह घिरी हुई और घेरा तोड़ने आई अंग्रेजी सेना एक-दूसरे को मिली। जिस रेसीडेंसी पर आज तक मृत्यु की छाया था उस रेसीडेंसी में अब विजय का हास्य खिल उठा। परंतु इस आंग्ल विजय को विद्रोही अभी भी महत्त्व नहीं रहे थे। ये दोनों अंग्रेजी सेना इकट्ठी हो गई और रक्त के प्रत्यक्ष समुद्र में वह शहर तैरने लगा, तब भी वहां के क्रांतिवीर समर्पण करने या भाग जाने को तैयार नहीं थे। उनकी इस दृढ़ता और धैर्य के कारण लड़ाई फिर से कब शुरू हो जाए, यह बिल्कुल अनिश्चित था। इसलिए पिछली रात की मारामारी में छिटकी अंग्रेजी सेना को फिर से एक बार व्यवस्थित करने का कार्य सर कोलिन ने प्रारंभ किया। उसने रेसीडेंसी छोड़कर दिलखुशबाग में सारी सेना इकट्ठी की। आगे की लड़ाई के लिए आवश्यक संगठन बनाया और कब्जाए आलमबाग में आउट्रम के अधीन उस विस्तीर्ण मार-काट में शेष रही लगभग चार हजार सेना और पच्चीस तोपें रख दीं और इस विजय के लिए उसने अपनी सेना की शूरता, अनुशासन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 305
और आदेश-पालन की यथार्थ स्तुति की। उस स्तुति शूरता में बड़ा हिस्सा जनरल हैवलॉक का था। परंतु जब तक अंग्रेजी सेना वह विजयानंद मनाए, तब तक उस विजयानंद का मुख्य हिस्सेदार हैवलॉक यकायक मर गया। लखनऊ के रण क्षेत्र में अति तनाव, चिंता और निराशा से पस्त हुआ ऐन विजय रंग में यह बहादुर हैवलॉक मर गया। तारीख 24 का अंग्रेजी विजय में इस मृत्यु ने यह विष घोल दिया। फिर भी, हैवलॉक के बाद उसके पुत्र और पत्नी को सरदारी का सम्मान देकर इंग्लैंड कृतज्ञ हुआ। परंतु वह समय मरे हुए के शोक में डूबने का नहीं, उसकी अधूरी आशापूरी करने का था। लखनऊ विजय के लिए हैवलॉक मरा, इसलिए उसकी मृत्यु के बाद उसकी वास्तविक सेना करना अर्थात् लखनऊ शहर जीतना था। परंतु लखनऊ जीतना निकलने से पहले इधर कानपुर में ये तोपों के आकस्मिक धमाके क्यों शुरू हो गए हैं? होंगे किसी के लिए। युरोप के युद्ध का प्रख्यात वीर विंडहम जब तक कानपुर में है तब तक वहां की तोपों के धमाकों से सर कोलिन के सीने की धड़कने बढ़ने का कोई कारण नहीं। परंतु सर कोलिन को जैसा विंडहम कानपुर में है वैसा ही तात्या टोपे भी वहां आया है, यह समाचार मिला है। तात्या टोपे कानपुर में ही है? सर कोलिन को तोपों के उन धमाकों का भयंकर अर्थ ध्यान में आया और वह लखनऊ आउट्रम के हवाले कर अति वेग से स्वयं यह जानने दौड़ा कि कानपुर में तात्या टोपे क्या गड़बड़ कर रहा है! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 306
प्रकरण-6 तात्या टोपे कानपुर में अपनी सेना की हार के बाद श्रीमंत नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे दोनों रात बारह बजे के आसपास ब्रह्मवर्त में आ गए। वहां रात गुजारकर दूसरे दिन सुबह उनके छोटे भाई बाला साहब, भतीजे राव साहब और तात्या टोपे आदि लोग राजवंश की महिलाओं के साथ नौकाओं में बैठकर गंगा पर उतर गए और लखनऊ प्रांत के फतेहपुर शहर में आ पहुंचे। वहां नाना का परम स्नेही चौधरी भोपाल सिंह था। उसने उन सब लोगों का सादर सत्कार किया और अपने यहां सबको राख लिया। कानपुर की लड़ाई में बीच में तितर-बितर हुई सेना की फिर से व्यवस्था करने में लगे थे। थोड़े ही दिनों में विद्रोह कर उठी 42वीं रेजिमेंट नाना के निशान के नीचे लड़ने का संकल्प कर शिवराजपुर तक आ गई और वहां से उसने सर्वसम्मति से श्रीमंत नाना साहब को उसे ले जाने को कोई अधिकारी आदमी भेजने का निवेदन किया। इस निवेदन के अनुसार श्रीमंत नाना ने तात्या टोपे को शिवराजपुर की ओर उस रेजिमेंट को लाने का अधिकार देकर भेजा और आदेश के अनुसार तात्या उस रेजिमेंट को नाना के निशान के नीचे ले आए। तात्या को शिवराजपुर की यह सेना मिलते ही उसने हैवलॉक की पीठ पर, पूर्व कथन के अनुसार, दांव-पेज प्रारंभ किए और उस आंग्ल वीर को अवध से खींचकर वापस कानपुर ले आया। हैवलॉक कानपुर में आकर देखता है तो यह विचित्र 1857 का स्वातंत्र्य समर - 307
मराठा ब्रह्मवर्त के बाड़े में राजा बना बैठा है। अतः आंग्ल सेना को फिर से ब्रह्मवर्त पर जोर का आक्रमण करना आवश्यक हो गया। इस लड़ाई में पराजय होते ही तात्या गंगा नदी उतरकर सेना के साथ फतेहपुर आकर नाना से मिल गया। थोड़े ही दिनों में ग्वालियर की सेना में विद्रोह कराने की योजना नाना के दरबार में बनने लगी। इस काम पर तात्या के सिवाए किसकी नियुक्ति इष्टतर थी? इस विलक्षण बुद्धि ने आज पूरी-की-पूरी रेजिमेंट चुपचाप पोली करके विद्रोह कराने जाए। तात्या टोपे तुरंत गुप्त रीति से ग्वालियर गए और वहां से अपने साथ ग्वालियर सेना की मुरार छावनी की पैदल, घुड़सवार एवं तोपखाना आदि लेकर तुरंत कालपी वापस लौटे। यह सुनते ही नाना ने कालपी की इस सारी सेना की व्यवस्था करने का अधिकार देकर बाला साहब को उधर भेज दिया। कालपी शहर विद्रोहियों के लिए लश्करी दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण था। कानपुर और कालपी के बीच यमुना का प्रवाह होने से अंग्रेजी सेना से रक्षा करनेवाली वह प्राकृतिक खंदक ही थी, इसलिए कालपी शहर में अपना डेरा बनाए रखकर वहां की सुरक्षा के लिए कुछ सेना छोड़ शेष सेना के साथ तात्या टोपे कानपुर की अंग्रेजी सेना को शह देने कर विचार करने लगे। सर कोलिन जब अंग्रेजी सेना के साथ लखनऊ को मुक्त कराने कानपुर से चला तब उसने कानपुर की सुरक्षा के लिए यूरोप की लड़ाइयों में ख्यातिप्राप्त जनरल विंडहम को सेना के साथ वहां रखा था। उस यूरोपियन सेना को नई कुमुक आने के पहले और लखनऊ की ओर जारी झगड़ा समाप्त होने के पूर्व कानपुर शहर पर संभव हुआ तो एक बार चढ़ाई कर देखें-यह नाना का विचार बना और उसक कार्य के लिए तात्या टोपे के साथ ग्वालियर से आई सेना भी भेजी गई। इस सेना का मुख्य सेनापति तात्या टोपे को ही बनाया गया। इस तरह कल तक नाना के दरबार का जो ब्राह्मण मुंशी था, वह तात्या टोपे आज एक सेना का मुख्य सेनापति हो गया। और यूरोप के रणांगण में सैनिक अनुभव लेते हुए जिसका जीवन गया उस जनरल विंडहम पर वह हमला करने का रहा है। और उसके आए हुए असंगठित लश्करी सिपाही संस्थापित विजयी आंग्ल सेना के सामने खड़े हैं। यह असमान लड़ाई कैसे होती है-स्वतंत्रता की चेतना, दूसरे सारे लाभ विपक्ष की ओर होते हुए भी कैसे लड़ती है! अर्थात् साधन आदि के अभाव में भी इतना लड़ती है तो जब उसके साथ अनुशासन, संगठन आदि के लाभ जुड़ जाएं तो कितना लड़ सकती है-यह इसकी जीवंत शिक्षा मिल जाने जैसा होगा। ग्वालियर की विद्रोही सेना के साथ तात्या टोपे 9 नवंबर को कालपी पहुंच गए। कानपुर से कालपी छियालीस मील दूर है। वहां से कानपुर की अंग्रेजी सेना की पूरी जानकारी लेकर तात्या ने कालपी छोड़ यमुना नदी उतरकर दोआब में प्रवेश किया। जालौन में सारा खजाना और काठ-कबाड़ रखकर उसकी सुरक्षा के लिए तीन हजार 1857 का स्वातंत्र्य समर - 308
सैनिक, बीस तोपें छोड़ यमुना उतरते ही वे तुरंत कानपुर पर हमला करने नहीं गए। लखनऊ में विद्रोहियों से सर कोलिन की लड़ाई शुरू होने और यह ज्ञात हो जाने कर कि सर कोलिन वहां पूरी तरह फंस गया है, तात्या कानपुर के आसपास मंडराते रहे। लखनऊ में सर कोलिन अब कुछ दिन विद्रोहियों से उलझा रहेगा, यह दिखते ही तात्या शिवराजपुर तक चढ़ आए। रास्ते में सैनिक महत्त्व के स्थानों पर उन्होंने सेना के थान बनाए। नवंबर की तारीख को इतनी व्यवस्था करके तात्या ने अंग्रेजी रसद का मुख्य रास्ता बंद कर दिया। तात्या के इन दांव-पेचों का अर्थ विंडहम की नजर में आए बिना न रहा। उसने कलकत्ता से आ रही गोरी सेना के प्रवाह को कानपुर में ही रोके रखा। कार्थ्यू के अधीन सेना देकर उसे कालपी के पास रखा और तात्या सर कोलिन की पीठ पर मार करने जाता है या कानपुर आता है, इसकी राह देखता रहा। परंतु विंडहम बैठकर राह देखनेवाला योद्धा नहीं था। उसका बहादुर स्वभाव उसे युद्ध हेतु निरंतर आगे ढकेल रहा था। अंग्रेजों की हिंदुस्थान ही नहीं, पूरे एशिया की सेना के विषय में जो एक सैनिक धारणा थी उसके मन पर उसकी छाप भी थी। यह धारण कि 'एशियाटिक लोगों को हराने की उत्तम युक्ति है उनपर सीधे हमला कर देना। कोई चाहे जितना सशक्त हो, परंतु किंचित भी पैर पीछे लिया या देर की तो एशियाटिक लोग गर्व से फूल जाते हैं। किंतु कितना भी अशक्त हो, पर पीछे न हटते हुए तेजी से उनपर टूट पड़े तो एशियाटिक लोगों की आंखें कितना चौंधिया जाती हैं औ वे घबराकर इधर-उधर भागने लगते हैं।' इस सैन्य धारणा का उपयोग आज तक अंग्रेजों ने कितनी ही बार किया और अधिकतर वे सफल रहे। और चूंकि एशियाटिक लोगों से लड़ते हुए वास्तविक बल से अधिक उसके दिखावे में सफलता की संभावना अधिक रहती है, इसलिए युद्ध में गोरी मुट्ठी भर सेना हो तो भी वह सीधे तीर की तरह एशियाटिक लोगों पर हमला करती रहे और उनका आक्रमण होने के पहले ही आप उनपर आक्रमण कर हमारी शक्ति अधिक है, ऐसे उनका डराते रहें। यह आंग्ल युद्ध शस्त्र का एक प्रयोगसिद्ध नियम ही बन गया था। जो भी अंग्रेजी सोल्जर यहां आता, वह यह नियम कंठस्थ करता और जो अंग्रेजी इतिहासकार ग्रंथ लिखता वह इस नियम का सिद्धांत बार-बार लिखता था। ऐसी शिक्षा पाया जनरल विंडहम तात्या टोपे की हलचलों को मन माफिक चलने देकर राह देखता बैठनेवाला नहीं था। उसने कानपुर शहर से निकल कालपी के बाजू की नहर के पुल तक हमला किया। अंग्रेजी सेना की गतिविधि देखकर विद्रोहियों की सेना ने भी हलचल प्रारंभ की। उनकी सेना अकबरपुर से सुखंडी आ गई और सुखंडी से 25 नवंबर को पांडु नदी तक आकर भिड़ गई। अपने इतने पास तक साहसी शत्रु के आ जाने की सूचना मिलने से विंडहम की सेना में लड़ाई की तैयारी शुरू हो गई और एशियाटिक लोगों को हराने की रामबाण युक्ति 26 नवंबर को अपनाने की योजना बनी। विद्रोहियों पर स्वयं होकर ही सीधे आक्रमण कर पहले उनका सामना पीटा जाए और फिर ऐसे अकेले-अकेले पकड़ अन्य हिस्सों को भी नष्ट कर दिया जाए, यह सकंल्प कर विंडहम तारीख 26 को 1857 का स्वातंत्र्य समर – 309
प्रातः ही शत्रु पर पिल पड़ा। विद्रोही एक घनी झाड़ी में खड़े थे। उन्होंने अंग्रेजी सेना पर तोपों की मार शुरू की। बहुत देर तक मारामारी चलने के बाद अंग्रेजों ने तीन तोपें जीत लीं। विंडहम कहने लगा, मेरे सीधे हमले से एशियाटिक लोग और एक बार पराजित हुए और गोरी सेना फिर एक बार विजयी होते हुए भी तू पीछे-पीछे क्यों हटती जा रही है? या फिर आज तक युद्ध में पीछे हटने को ही तू पीछे-पीछे क्यों हटती जा रही है? या फिर आज तक युद्ध में पीछे हटने को ही तू विजय कहती रही है? कैसी विजय और कैसा रण? विंडहम की गोरी सेना तात्या टोपे के घुड़सवारों के दबाव में कानपुर तक पीछे हट गई। उसकी पीठ पर चढ़े जा रहे घुड़सवारों के दबाव में कानपुर तक पीछे हट गई। उसकी पीठ पर चढ़े जा रहे घुड़सवार न लड़ाई कर रहे थे, न पीछा छोड़ रहे थे। मराठों की सेना की तरह ही वे शत्रु के चारों ओर मंडराते उन्हें पीछे धकेलते और आप आगे घुसते सीधे हमले से हमेशा की तरह न डरते ये एशियाटिक लोग उलटे उसे ही धमकाते आगे गए। मैलसन कहता है-‘'परंतु विद्रोहियों का नेता तात्या टोपे कोई पागल आदमी नहीं था। जनरल विंडहम ने जो आघात किया उससे डरने की बात तो दूर, उलटे अंग्रेज सेनानी का मर्म उस चतुर मराठे की नजर में आया। विंडहम की आंतरिक स्थिति किसी खुली पुस्तक की तरह तात्या टोपे ने पढ़ ली और असल सेनानी की मूल चतुराई से उस स्थिति का पूरा लाभ लेने का निश्चय किया।’'135
दिन भर की लड़ाई के बाद विंडहम को चौबीस घंटे की भी फुरसत न देकर अपनी सेना को तात्या ने उस रात दूसरे दिन प्रातः ही आक्रमण के लिए तैयार रहने का आदेश दिया। परंतु शिओली और शिवराजपुर की सेना आकर उसके अंग्रेजों के दांए बाजू पर तोपों से गोलीबारी करने के पूर्व आगे न बढ़ते हुए गोलीबारी होते ही अंग्रेजों पर तेजी से टूट पड़ना है, ऐसी उसकी योजना थी। इधर विंडहम ने भी अपनी सेना को प्रातः ही सशस्त्र खड़ा किया, पर प्रातः नौ बजे तक खड़े रहने के बाद भी विद्रोहियों के आने का समाचार या उनकी गतिविधि ज्ञात नहीं हुई, तब अंग्रेजी सेना कलेवा करने अपने-अपने तंबू में चली गई। कोई ग्यारह बजे अंग्रेजी सेना को फिर सशस्त्र होने का आदेश मिला। जनरल विंडहम को सेनापति तात्या टोपे के हेतु का पता नहीं चल पा रहा था। सारी अंग्रेजी सेना में अनिश्चितता का वातावरण था।
इसी समय निश्चितता का भयानक राज शुरू करने के लिए तात्या टोपे की सेना की ओर से अंग्रेजों के दाएं बाजू पर तोप का गोला आकर गिरा। वह गोला गिरने के साथ ही सामने से भी गोलीबारी चालू हो गई। तुरंत विंडहम ने छह तोपों के साथ कार्थ्यू को ब्रह्मवर्त के रास्ते शहर के उस भाग की सुरक्षा करने भेजा। विद्रोहियों की तोपों और अंग्रेजों के बीच के भाग की तोपों की भयंकर लड़ाई शुरू हुई। उसमें अंग्रेजी गोलंदाज जल्दी ही हारने लगे। तात्या ने अपनी सेना का अर्धवृत्त व्यूह बनाकर उसमें अंग्रेजी सेना को सामने और दोनों बाजू से घेरने की योजना बनाई थी। विंडहम ने
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135 मैलसन कृत-‘इंडियन म्यूटिनी', खंड 4, पृष्ठ 167 ।
तात्या के अधवृत्त को तोड़ने का बहुत प्रयास किया। पर तात्या की तोपों ने अंग्रेजों को आगे कदम रखना असंभव कर दिया। आगे कदम बढ़ाना तो दूर, अब मूल जगह पर भी अटल रहना असंभव देख अंग्रेज रण से पीछे हटने लगे। अंग्रेजों का बायां बाजू अपनी तोपें छोड़कर भी पीछे हटा। यह देखते ही उनके दाएं बाजू की सेना ने जोर लगाकर तोपों की रखा की। परंतु अब तो अंग्रेजी सेना के पैर रण से उखड़ गए। वे जैसे-जैसे पीछे हटते दिखे वैसे-वैसे विद्रोहियों का अर्धवृत्त उन्हें पीछे हटाता गया। शाम को छह बजे इस जंगी धकेला-धकेली में अंग्रेजी सेना पूरी तरह हार गई और उसका सेनापति जनरल विंडहम अपनी सेना के साथ अस्त-व्यस्त रीति से भागा। उसके हजारों तंबू, छोलदारियां, बैल, रसद और पोशाक विद्रोहियों के हाथ लगे। इस तरह उस जवां मई मराठे की तलवार को इस दूसरी विजय का मुकुट पहनाया गया। कल की लड़ाई में उसकी अप्रत्यक्ष जीत थी, पर आज तो उसकी प्रत्यक्ष परिपूर्ण विजय हुई। उसने अंग्रेजों के एक उत्तम सेनापति को दिन भर चले भयंकर रण में पराभूत ही नहीं किया, उसका पीछा भी किया। तंबुओं, छोलों के साथ उसकी छावनी गिराई और कानपुर शहर से उसे खदेड़कर उस शहर को जीता। यदि इस सेनापति जैसी ही उसकी सेना भी कर्तव्यनिष्ठ और संगठित होती तो अंग्रेजी इतिहासकार भी कहते हैं कि इस मराठे ने उस दिन जनरल विंडहम की सारी सेना काट डाली होती। इतना बढ़िया दांव तात्या टोपे ने जनरल विंडहम पर लगाया था। और तात्या के इस दांव की गूंज सर कोलिन को लखनऊ में सुनाई दी। जिस समय तात्या कानपुर आया, उसे यह आशा थी कि कोलिन को कम-से-कम एक माह लखनऊ उलझाए रहेगा और तब तक विंडहम के अकेलेपन का सहज ही लाभ लिया जा सकेगा। परंतु उसक यह दांव उसकी ओर से इतना विजयी हुआ, तभी उसको समाचार मिला कि लखनऊ का काम शीघ्र निपटाकर-वहाँ विद्रोहियों अधिक बाधा न होने से सर कोलिन भी कानपुर पर आक्रमण करता आ रहा है। अब गंगा के दोनों बाजुओं से अंग्रेजी सेना तात्या पर चढ़ आयी थी। लखनऊ में विद्रोहियों के ढीलेपन से अंग्रेजों के कमांडर-इन-चीफ से स्वयं कुश्ती लड़ने का बोझा क्रांतिवीरों के इस सेनानी पर आ पड़ा। फिर भी वह मराठा तारीख 27 को ब्रिदोहियों पर फिर से यथासंभव चढ़ाई करने या कम-से-कम उनकी चढ़ाई न होने देने का निश्चय कर प्रातः से ही लड़ाई चालू की। अंग्रेजों 1857 का स्वातंत्र्य समर – 311
के दांए और बाएं बाजू पर विद्रोहियों की तोपें और सेना मार करने लगी। कल की तरह आज भी अंग्रेजों को विद्रोहियों ने और विद्रोहियों को अंग्रेजों ने दोपहर बारह बजे तक जहां-का-तहां दबाकर रखा। परंतु कल अंग्रेज जैसे पीछे हटे थे वैसा आज न हटकर वे रण में आगे पैर बढ़ाकर शत्रु पर टूट पड़े। एशियाटिक लोगों पर सीधे हमला किया तो फिर विजय में शंका क्यों हो? विजय में कोई शंका नहीं, पर यह दाईं ओर हाहाकार कौन कर रहा है? ब्रिगेडियर विल्सन मरा। कैप्टन माक्री मरा। कैप्टन मार्फी, मेजर स्टर्लिंग, लेफ्टिनेंट केन, लेफ्टिनेंट रिबन को भी काट मारा। एशियाटिकों में भी तात्या टोपे होता ही है। उस तात्या ने और उसकी सेना ने शाम तक मारामारी कर आगे बढ़ आई अंग्रेजी सेना को उसके कमांडर के साथ पीछे भगाकर इस तीसरे दिन भी यह तीसरी विजय प्राप्त की। कल से अधिक आज अंग्रेजी सेना की हिम्मत पस्त हुई। उसके दोनों भागों को ही रणांगण से भगा दिया। कल आधा शहर लिया था तो आज तात्या ने सारा कानपुर कब्जा लिया और इस तरह इस जवां मर्द मराठे की तलवार पर यह तीसरी विजय का मुकुट दमकने लगा। 136 अंग्रेजी सेना पीछे भाग रही थी, तभी अंग्रेजों का कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन उसकी छावनी में उपस्थित हो गया। उसने अपनी आंखों से अंग्रेजी सेना की हुई गत देखी थी। उसने अपनी आंखों से विद्रोहियों की विजयी सेना कानपुर शहर में घुसते देखी, उसने अपने कान से विद्रोहियों के रणसिंघे व रणताशे और जयनाद कड़कड़ाते सुने। कानपुर की ओर तात्या टोपे क्या गड़बड़ कर रहा है, यह उसके ध्यान में अच्छी तरह आया। सर कोलिन के अंग्रेजों की छावनी में आ पहुंचने की बात जानते ही जिसका डर था वही हो गया, यह तात्या ने समझ लिया। लखनऊ का जोर ढाली पड़ने से सर कोलिन ससैन्य अवध की ओर से कानपुर दौड़ आया। यह अप्रिय सत्य सामने आते ही धीरज न खोकर तात्या ने अवध की ओर का पुल तोड़कर अंग्रेजी सेना को गंगा नदी उतरना असंभव बनाने को पुल पर तोपों की मार शुरू की। पर विद्रोहियों की इन तोपों का रूख समझकर सर कोलिन ने अंग्रेजी तोपों की उलटी मार चालू की और उसकी छाया में 30 नवंबर तक सारी अंग्रेजी सेना अवध से कानपुर शहर के पास आ बैठी। फिर भी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 312 136 इस पराजय का नितांत ही रोचक वर्णन एक अंग्रेज अधिकारी ने इन शब्दों में किया है-"आपको आज के संघर्ष का विवरण पढ़कर आश्चर्य होगा, क्योंकि आपको विदित होगा कि अपने सम्मान चिह्नों, महान् उपाधियों और नितांत प्रसिद्ध शौर्य से मंडित गोरे सैनिकों को पराजय मिली और घृणित एवं तुच्छ भारतीयों ने उनके तंबू और सामग्री ही नहीं, प्रतिष्ठा का भी अपहरण कर लिया था। अब हमारे शत्रुओं को हमें 'पराजित फिरंगी' कहने का अधिकार प्राप्त हो गया। हमारे सैनिक अपने उलट दिए गए तंबुओं, फटे और जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों तथा सामग्री और भागते हुए ऊंटों, हाथियों, अश्वों एवं नौकरों सहित भाग निकले। यह संपूर्ण घटना ही नितांत लज्जाजनक और विषादपूर्ण है।"
- चार्ल्स बाल कृत- 'इंडियन म्युटिनी', खंड 2, पृष्ठ 190 ।
क्रांतिकारी कानपुर छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने उस शहर के पास ही अंग्रेजों के कमांडर-इन-चीफ से दो-दो हाथ करने का मन बनाया। क्योंकि-“ They had, as their leadr, a man of very great national abilities."137 इस कर्मठ सेनानी ने अपना बायां बाजू कानपुर और गंगा के बीच-अड़चनवाली जगह में, अपना मध्य कानपुर शहर में और अपना दायां बाजू गंगा नहर पर फैला रखा था। उसकी सेना में लश्करी शिखण प्राप्त करीब दस हजार सिपाही थे। उसने दिसंबर की 1 तारीख को अंग्रेजी सेना के कमांडर-इन-चीफ को चैन से नहीं बैठने दिया। दूसरे दिन तो उसी के तंबू पर विद्रोहियों ने यकायक गोलीबारी शुरू कर दी। 4 तारीख को उन्होंने कुछ ज्वालाग्रही नौकाएं अवध के पुल को जलाने के लिए गंगा के प्रवाह में छोड़ दीं। तारीख 5 को उनके तोपखाने ने अंग्रेजों की सारी सेना पर ऐसी गोलीबारी की कि सर कोलिन को अपना डेरा छोड़कर सेना की हलचल और अपना तोपखाना बहुत देर तक बंद करना पड़ा। विद्रोहियों की इस ढीठता से दी गई रण चुनौतियों को आज तक चुप होकर सुनने की बारी जो सर कोलिन पर आई थी वह 4 तारीख के बाद आनी नहीं थी। क्योंकि अब उसने अपनी सेना की उत्तम एकबद्धता कर रास्ते की सारी बाधाएं दूर कर दी थी और इसीलिए प्रत्यक्ष अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ के तंबू पर रोज-रोज गोलीबारी की गेंद का खेल खेलनेवाले जिद्दी, ढीठ और उद्दाम विद्रोहियों के पास कोई नौ-दस हजार सैनिक शिक्षा प्राप्त सिपाही थे और उनके बाएं बाजू में स्वयं नाना साहब, दाईं ओर ग्वालियर की सेना और उन सब पर तात्या टोपे सेनापति थे। अंग्रेजों के पास काली, गोरी कुल पांच हजार पैदल, छह सौ घुड़सवार और पैंतीस तोपें-ऐसे सब मिलाकर छह हजार लोगों की सज्जित सेना थी। चार्ल्स बाल कहता है-‘‘संख्या पचहत्तर हजार थी और उन सब पर स्वयं कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन सेनापति था।‘‘ सर कोलिन ने विद्रोहियों के दाएं बाजू असुरक्षित जगह पडत्री हुई है, यह देखकर 6 दिसंबर को प्रातः नौ बजे लड़ाई शुरू की। दाईं ओर मुख्य हमला किया जाना है, यह बात छिपाने के लिए पहले बाएं बाजू पर अंग्रेजी तोपें गोला फेंकने लगीं। और इस कारण विद्रोहियो का ध्यान भी उधर ही गया। ग्रेट हेड ने विद्रोहियों के मध्य पर भी एक नकली हमला किया। इस तरह उधर गोलीबारी की भयानक उठा-पटक में वे धरती दहला रहे थे। तभी दाईं ओर छिपते-छिपाते अंग्रेजों ने विद्रोहियों पर बहुत जोर से वास्तविक हमला किया। जो सिख और गोरे लोग तीर की तरह चलते आ रहे थे उन पर ग्वालियर की सेना ने तोपों से भयानक गोलाबारी की। उसी तरह पांडे लोगों की सेना भी बंदूकों से आंग्ल सेना पर आग बरसाने लगी। सिख लोगों के डबल मार्च से दौड़ते ही विद्रोहियों से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 313 137 मैलसन, खंड 2, पृष्ठ 184 ।
उनकी आधे-एक घंटे तक विकट कुश्ती हुई। इतने में पील के लोग तोपें लेकर वहां आ गया तो विद्रोहियों का दायां बाजू हटने लगा। एक बार उसके हटना शुरू करते ही अंग्रेजी सेना को जो जोश आया-मत पूछो! उन्होंने जल्दी ही बाहर की सेना को तितर-बितर कर दिया। उनकी तोपें पकड़ लीं और उनकी सारी छावनी पर भी कब्जा कर लिया। विद्रोहियों के दाएं बाजू पर ऐसी परिपूर्ण विजय सर कोलिन को प्राप्त हुई। परंतु उसकी इच्छा इतने से शांत होनेवाली नहीं थी। उसके मन में दाएं बाजू की ओर कालपी का रास्ता रोककर तात्या को ससैन्य शरण लाने का विचार था, इसलिए उसने ब्रह्मवर्त के रास्ते पर मैंसफील्ड को तत्काल भेज दिया। इस दिन एशियाटिक लोगों के संबंध में पश्चिम का सैनिक सिद्धांत उसके विधि और निषेधात्मक दोनों ही स्वरूपों में वहां प्रकट हुआ। विद्रोहियों के मध्य पर ग्रेट हेड ने जो हल्ला किया था वह इतना कमजोर था कि यदि विद्रोहियों ने उसपर सचमुच जोर का आघात किया होता तो उसकी हवा निकल गई होती और वह दिन निकल गया होता। पर अंग्रेज सीधे हल्ला बोलते आए तो विद्रोही धौंस में आ गए। अघातक पद्धति से सर कोलिन की इच्छा अधूरी रही; क्योंकि तात्या के ससैन्य शरण आने की संभावना घट गई। वह मराठा सेनापति-तात्या टोपे-मैंसफील्ड को डांटते-डपटते अंग्रेजी जाल तोड़कर अपनी तोपों और सेना के साथ पार निकल गया। तात्या को पकड़ना चाहते थे। सर कोलिन, इस मराठी शेर को पकड़ने में तुझे अभी कई खूनी जाल बिछाने होंगे। यद्यपिइ स दिन तात्या टोपे तोपों सहित निकल गया था, फिर भी होप ग्रांट ने हमला किया। 9 दिसंबर को शिवराजपुर के पास तात्या की सेना से उसकी एक भागती भिड़ंत हुई। और उसमें से भी तात्या और सेना भाग गए, फिर भी विद्रोहियों की अधिकतर तोपें अंग्रेजों के हाथ लगीं। इस तरह सर कोलिन ने तारीख 6 से 9 तक इन चार दिनों में विंडहम की पराजय का प्रतिशोध लिया। विद्रोहियों की बत्तीस तोपें जब्त कीं और विद्रोहियों की सांकल तोड़कर कुछ को कालपी की ओर और कुछ को अवध की ओर भाग दिया। इस कठिन विजय के बाद कुछ सरल विजय भी वह क्यों न प्राप्त करे। इसलिए वह ब्रह्मवर्त दौड़ गया। वहां का राजमहल उसने खंडहर बना दिया। वहां की संपत्ति को लूटा और फिर उस विजय पर झंडा लगाने को ब्रह्मवर्त के विशाल मंदिर तोड़-फोड़कर ध्वस्त कर दिए। ब्रह्मवर्त के इसी महल में सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का गर्भ संभव हुआ था 1857 का स्वातंत्र्य समर – 314
और ब्रह्मावर्त के इन मंदिरों ने ही इस स्वतंत्रता गर्भ पर आशीर्वचन बरसाए थे। इसी ब्रह्मावर्त में भारतभूमि के देदीप्यमान वीर रत्न नाना, तात्या, बाला साहब, झांसी की 'छबीली' शिशु से युवा हुए थे। रामगढ़ से धकेला गया मराठों का राज जिस दिन यहां अंग्रेजों के रक्त की कीचड़ से पुनः प्रादुर्भूत हुआ, उस दिन इस महल ने और इन देवालयों ने दीपोत्सव किया था। परंतु आज इस दीपोत्सव की आग से ही वे भस्मीभूत हो गए हैं। लेकिन इतिहास, उनकी उस पवित्र भस्म पर एक अश्रु भी मत गिराना। स्वतंत्रता के तेजस्वी गर्भ को जन्म देते समय उस उदात्त प्रसव वेदना से जो राज मंदिर और देव मंदिर मरते हैं उनकी मृत्यु गुलामों के झुंड पैदा करनेवाले राज मंदिरों और देव मंदिरों के अस्तित्व से हजार गुना अधिक चैतन्यकारी है! चिता की अग्नि के उपयोग में आने की अपेक्षा यज्ञ की हवि के उपयोग में लिये जानेवाला कष्ट हजार गुना अधिक चैतन्यदायी होता है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 315
चतुर्थ भाग: भस्म व अमृत (कुँवर सिंह, अन्तिम युद्ध व संदेश)
प्रकरण-7 लखनऊ का पतन तात्या टोपे ने कानपुर की ओर जो भयंकर गड़बड़ मचाई थी उसको इस तरह बांध`दने के बाद सर कोलिन ने विद्रोही प्रदेश को फिर से जीत लेने के लिए कमर कसी। दिल्ली जीत लेने के बाद साटन अलीगढ़ तक के निचले प्रदेश में शांति स्थापित करता आया था, इसलिए कानपुर से ऊपर अलीगढ़ तक प्रदेश में शांति स्थापित करने का वालपोल को कालपी के रास्ते भेजा गया। वालपोल कानपुर से ऊपर चढ़ते और सीटन अलीगढ़ से नीचे उतरते हुए मैनपुरी में मिले और ऐसा नक्शा अंग्रेजी सेना के लिए बना कि दोआब का यमुना तटवर्ती किनारा पूरी तरह पुनर्जित हो और यमुना तीर से इसके सेना जाते-आते दोआब के विद्रोही हटते-हटते फतेहगढ़ के पास इकट्ठा होने लगेंगे, यह स्पष्ट ही था और इस प्रकार अंत में वालपोल, सीटन और कोलिन अपने-अपने अभियान पूरे कर फतेहगढ़ में मिलेंगे, यह सहज ही होने वाला था। सन् 1857 के इस आगामी वर्ष में सामान्य रूप से यह कार्य पूरा करने की अंग्रेजी योजना थी। इस नक्शे के अनुसार वालपोल तोपखाने सहित सर्वांगपूर्ण गोरी सेना लेकर कानपुर से 18 दिसंबर को कालपी के रास्ते ऊपर चला। रास्ते में विद्रोहियों की बिखरी सेना से छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ते विद्रोहियों को आश्रह देनेवाले गांवों पर अंग्रेजी रीति से कहर बरपाते और उस प्रदेश को फिर से पूरी तरह ब्रिटिश सत्ता के अधीन लाते हुए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 316
वह इटावा शहर तक चलता आया-यहां से भी वैसे आगे बढ़ गया होता; पर इटावा शहर के सारे विद्रोही वहां से चले जाने के बाद भी उसे वहीं पर सेना के साथ ठहरना पड़ा। क्या कारण था? अंग्रेजों कीये बलवान सेना एकदम ठहरकर रह जाए, ऐसा क्यों है? विद्रोहियों के हजारों पैदल तो चलकर नहीं आ गए? या पांडे की सेना के चपल घुड़सवारों की टोलियां अंग्रेजों पर कहीं हमला तो नहीं कर रहीं? या उनकी गड़गड़ाहट करती तोपें कहीं अंग्रेजों पर जलते अंगारों की वर्षा तो नहीं कर रहीं? इटावा के पास ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था। पैदल या हजारों घुड़सवारों की टोलियां या तोपखाने के अंगार-इनमें से कुछ भी इटावा के पास अंग्रेजों को रोके रखने के लिए नहीं था। केवल तीस-चालीस भारतीय दीवारों में गोलीबारी के लिए छेद हैं। इस छोटे से भवन में खड़े लोगों के हाथों में एक-एक मस्केट है और हृदय में एक-एक जलती ज्योति लिये इनतं ीस-चालीस लोगों ने ही इटावा के दरवाजे में इस अंग्रेजी चतुरंग सेना को रोका हुआ है। उन्होंने इस अंग्रेजी तोपखाने के साथ इटावा तक चली आई अंग्रेजी सेना से रणांगण में 'युद्धं देहि' की माँग प्रस्तुत की है। इटावा के दरवाजे में पैर रखनेवाले को 'युद्धं देहि'। अब इस बित्त भर भवन में दृढ़ता से खड़े रहकर अंग्रेजी घुड़सवार, पैदल, तोपखाना युद्ध भी क्या करे! और थोड़ी राह देखें जिससे पागलपन की यह मांग छोड़कर ये सिरफिरे होश में आएं और अभी भी पलायन की खुली राह पकड़ें। परंतु कितनी ही राह देखी, फिर भी उनका पागलपन सही नहीं हो रहा था। ठीक है-करो युद्ध। केवल उन्हें एक बार तोपखाना दिखाना ही काफी है। यही उनसे युद्ध करके उन्हें पराजित करना हो जाएगा। इसलिए अंग्रेजी सेना ने अपना जबड़ा दिखाकर उन सिरफिरों को डराना चाहा। डर, डर किसे? जिसने एक बार दिव्य स्वतंत्रता के लिए स्वतंत्रता-लक्ष्मी के चैतन्य से सम्मोहित होकर मृत्यु से ही प्रेम किया, मृत्यु का भय छोड़ा, मृत्यु के लिए जो उतावला हो गया-उसे इस विश्व में कौन डरा सकता है? जो जय के लिए लड़ता है उसे कौन डराएगा? शहीद को कौन रोक सकता है! जो जय के लिए लड़ता है वह डरता है, जो कीर्ति के लिए लड़ता है वह डरता है, पर जो मृत्यु के लिए ही लड़ता है उसे कौन डराएगा? शहीद को कौन रोक सकता है! पृथ्वी के सारे अंगारे और आकाश की सारी बिजलियां एक साथ आकर उसपर गिरें तो भी जो अपनी प्रिय वस्तु प्राप्त करने के लिए अति तीव्र गति से दौड़ रहा है उसका क्या बिगड़ेगा? जिसने केवल 'मृत्यु' की आशा पकड़ी उसे विश्व में निराशा कैसे शेष रहे? प्रिया की ओर प्रियतम जिस तरह दौड़ता जाता है वैसे ही वे मृत्यु के लिए दौड़े जाते हैं-ऐसे इन इटावा के देशवीरों को भय कैसा? और वह दिखाए कौन? और इसलिए उन्होंने पलायन के खुले मार्ग छोड़ दिए। उन्होंने विजय की कल्पना भी नहीं की। अंग्रेजों की चतुरंग सेना को धिक्कारते हुए ये मुट्ठी भर लोग उस भवन से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 317
‘युद्धं देहि’ की गर्जना करने लगे। दिल्ली से जो डरी नहीं, कानपुर के रण से डरकर जो रुकी नहीं-वह अंग्रेजी सेना इस बित्ता भर भवन के पास मानो ठोकर खाकर रुक गई। मैलसन लिखता है-"संख्या से मुट्ठी भर, केवल मस्कट ही पास में, परंतु निराशा के अवसान से अधिक युद्ध का उत्साह उनमें भरा हुआ था। अपने ध्येय के लिए आत्मार्पण करने को वे मृत्यु की लालसा कर रहे थे। वालपोल ने उस स्थान का निरीक्षण किया। कोई सेना वहां रुकी रहे ऐसा उसमें कुछ नहीं था। उसे हमला कर जीतना बहुत आसान था। परंतु उनपर हमला करने का अर्थ कितने ही मनुष्यों की बलि देनी पड़ेगी। इसलिए युक्तियां खोजी जा रही थी। उन सबमें विफलता दिखने पर चारा सुलगाकर उन्हें अंदर ही जला डालने की बात भी सोची गई। परंतु बेकार। उन दीवारों के छेदों में से उन पक्के योद्धाओं ने हमला करनेवालों पर ऐसी निरंतर अचूक मार की कि तीन घंटे देने का निर्णय किया गया। इंजीनियर लोगों ने सुरंग खोदी और उसे बत्ती दे दी। सुरंग से वह पूरा जीवन आकाश में उछला और फिर नीचे गिरा। उसके उछलने और गिरने में उन देशवीरों को वह शहादत का सम्मान मिल गया, जिसकी उन्हें अति उत्कट अभिलाषा थी। वे सारे उसी स्थान पर मर गए। उस दिन से कैसे मरा जाए? इस विषय पर इटावा की यह पवित्र समाधि दिन-रात भयंकर मूक व्याख्यान देती रहती है। इटावा! शूर इटावा!! थर्मापिल के पहाड़ में, इटली के ब्रेशा के किले में, नीदरलैंड के ही रूटर के शरीर में तुझसे अधिक तेजोमय क्या होगा? इटावा! शूर इटावा!! इटावा से वालपोल आ रहा है और सीटन भी अलीगढ़, कासगंज, मैनपुरी आदि स्थानों पर विद्रोहियों की फुटकर सेना को पीटते नीचे उतर रहा था। इन दोनों सेनाओं की भेंट 3 जनवरी, 1857 को मैनपुरी में हुई। पहले के कार्यक्रम के अनुसार दोआब का यमुना तटवर्ती किनारा अंग्रेजी सेना ने दिल्ली, मेरठ से लेकर इलाहाबाद तक वापस जीत लिया। इधर गंगा किनारे से चढ़ते हुए फतेहगढ़ के नवाब को दंडित कर और दोआब के विद्रोहियों का वह अंतिम आश्रय तोड़-फोड़कर दोआब का सारा प्रदेश शत्रु-विहीन करने कानपुर से सर कोलिन भी फतेहगढ़ की ओर बढ़ रहा था। ऐसे दोनों ओर से ऊपर बढ़ रही अंग्रेजी सेना ने अलीगढ़, इटावा, मैनपुरी आदि स्थानों से सारे-के-सारे विद्रोहियों को भगाकर फतेहगढ़ में बंद कर दिया। फतेहगढ़ में फर्रूखाबाद के नवाब ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था, यह पहले कहा ह गया है। उस नवाब की सेना से अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ की बहुत बार छीना-झपटी हुई। फतेहगढ़ में दिल्ली और कानपुर से पराजित सिपाहियों की संख्या ही अधिक होने से वे लड़ाई शुरू होते ही मृत्यु के डर से भाग जाते। परंतु वह मृत्यु क्या इस अपमान से टलनेवाली थी? सो भी नहीं। वे भागते और अंग्रेज उनका पीछा करते। कभी छह सौ, कभी सात सौ, कभी-कभी हजार तक लोगों को काट डालते। यह इन भगोड़ों का मराना और वह उस इटावा का मरना! जमीन-आसमान का अंतर! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 318
फतेहगढ़ में नाना का एक सच्चा मददगार नादिर खान था। उसे फांसी पर लटकाने के लिए सबके सामने से ले जाया गया। फांसी पर चढ़ते हुए उसने लोगों को अंतिम उपदेश में कहा, "तुम सभी देशवासियों! अपनी तलवारें म्यान से निकालकर अंग्रेजों की सत्ता को निर्मूल कर देने के लिए आगे बढ़ो।" इस पराभव का परिणाम फर्रूखाबाद के नवाब को जल्दी ही भुगतना पड़ा। उसकी राजधानी, किले, युद्ध सामग्री सब अंग्रेजों के हाथ लगी और बचे-खुचे विद्रोही उसके साथ रुहेलखंड में गंगा पार भगा दिए गए। 4 जनवरी को जब सर कोलिन फतेहगढ़ में विजयी होकर घुसा, उस समय सारा दोआब और बनारस से ऊपर मेरठ तक सारा भूप्रदेश पूरी तरह अंग्रेजी सेना के अधीन हो गया था। तब यह प्रश्न खड़ा हो गया कि दोआब की विजय के बाद अंग्रेजी सेना का कार्यक्रम क्या हो? दोआब के विद्रोह की ज्वालाएं ठंडी हो जाने से अन्य प्रदेशों के विद्रोह अपने आप ही शांत हो जाएंगे, यह अंग्रेज सरकार को कुछ समय पहले तक जो आशा थी वह अब पूर्ण रूप से विफल हो गई थी। दिल्ली गिरते ही आठ निद के अंदर ब्रिदोह राख हो जाएगा-ऐसी भविष्यवाणी बड़े-बड़े राजकरण कुशल लोगों ने की थी। परंतु वास्तव में दिल्ली पतन से विद्रोह राख तो नहीं हुआ, भविष्य कथन ही राख हो गया। क्योंकि दिल्ली में रुका पड़ा सेना समूह उस शहर के गिरते ही किसी उतमत्त मेघ जैसा गरजते हुए चारों ओर फैल गया-बख्तार खान के अधीन रोहिला सेना, वीरसिंह के नेतृत्व में नीमच की सेना और अपने-अपने सूबदारों के नेतृत्व में अन्य हारी हुई सेनाएं अंग्रेजों की शरण जाना छोड़ दिल्ली गिरते ही अपमान में क्रोध में आगबबूला होकर दिल्ली में चूका बदला कहीं दूसरी ओर लेने निकल पड़ीं। 138 विद्रोहियों को अब हारने की चिंता नहीं थी। विजय की आशा का पहला जोश ठंडा पड़ गया था। अब उनके सीने में निश्चय की परिपक्वता आ गई थी। चाहे कुछ भी हो, अंग्रेजों से लड़ते रहने के सिवाए कोई दूसरा विचार उन्होंने अपने पास नहीं आने दिया। या तो फिरंगी मरें या स्वयं मरें। इन दो में से जब तक एक पूरी तरह समाप्त नहीं होता तब तक शस्त्र नीचे नहीं रखने का उनका स्वाभिमानी निश्चय हो गया था । वे आपस में लड़ रहे थे। उनमें से कुछ लोभवश अनियंत्रित व्यवहार कर रहे थे। कोई-कोई मृत्यु के भय से कभी-कभी भाग रहे थे । पर अंग्रेजों से लड़ाई छोड़ने को उनमें से कोई भी तैयार नहीं था। और या तो फिरंगी या वे स्वयं-किसी एक का पूरा नाश होने तक तलवार नहीं रखने का संकल्प हर विद्रोही के भिंचे दांत और तनी हुई। भृकुटी पर लिखा हुआ यदि स्पष्टता से दिखाई देता था तो वह दोआब की पराजय के बाद। इस समय लड़ाई में पकड़कर फांसी चढ़ाते हुए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 319 138 एक बार दिल्ली में ऐसी अफवाह फैली कि श्रीमंत नाना साहब स्वयं दिल्ली पर हमला करके बादशाह को मुक्त कर ले जाने वाले हैं। यह समाचार सुनते ही दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों ने बादशाह की कैद के मुख्य अधिकारियों को कड़े आदेश दिए कि-'सचमुच नाना की ऐसी कोई गड़बड़ शुरू हो जाए तो वे बादशाह को गोली मार दें।"-चार्ल्स बाल, खंड 2, पृष्ठ 94