१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘युद्धं देहि’ की गर्जना करने लगे। दिल्ली से जो डरी नहीं, कानपुर के रण से डरकर जो रुकी नहीं-वह अंग्रेजी सेना इस बित्ता भर भवन के पास मानो ठोकर खाकर रुक गई। मैलसन लिखता है-"संख्या से मुट्ठी भर, केवल मस्कट ही पास में, परंतु निराशा के अवसान से अधिक युद्ध का उत्साह उनमें भरा हुआ था। अपने ध्येय के लिए आत्मार्पण करने को वे मृत्यु की लालसा कर रहे थे। वालपोल ने उस स्थान का निरीक्षण किया। कोई सेना वहां रुकी रहे ऐसा उसमें कुछ नहीं था। उसे हमला कर जीतना बहुत आसान था। परंतु उनपर हमला करने का अर्थ कितने ही मनुष्यों की बलि देनी पड़ेगी। इसलिए युक्तियां खोजी जा रही थी। उन सबमें विफलता दिखने पर चारा सुलगाकर उन्हें अंदर ही जला डालने की बात भी सोची गई। परंतु बेकार। उन दीवारों के छेदों में से उन पक्के योद्धाओं ने हमला करनेवालों पर ऐसी निरंतर अचूक मार की कि तीन घंटे देने का निर्णय किया गया। इंजीनियर लोगों ने सुरंग खोदी और उसे बत्ती दे दी। सुरंग से वह पूरा जीवन आकाश में उछला और फिर नीचे गिरा। उसके उछलने और गिरने में उन देशवीरों को वह शहादत का सम्मान मिल गया, जिसकी उन्हें अति उत्कट अभिलाषा थी। वे सारे उसी स्थान पर मर गए। उस दिन से कैसे मरा जाए? इस विषय पर इटावा की यह पवित्र समाधि दिन-रात भयंकर मूक व्याख्यान देती रहती है। इटावा! शूर इटावा!! थर्मापिल के पहाड़ में, इटली के ब्रेशा के किले में, नीदरलैंड के ही रूटर के शरीर में तुझसे अधिक तेजोमय क्या होगा? इटावा! शूर इटावा!! इटावा से वालपोल आ रहा है और सीटन भी अलीगढ़, कासगंज, मैनपुरी आदि स्थानों पर विद्रोहियों की फुटकर सेना को पीटते नीचे उतर रहा था। इन दोनों सेनाओं की भेंट 3 जनवरी, 1857 को मैनपुरी में हुई। पहले के कार्यक्रम के अनुसार दोआब का यमुना तटवर्ती किनारा अंग्रेजी सेना ने दिल्ली, मेरठ से लेकर इलाहाबाद तक वापस जीत लिया। इधर गंगा किनारे से चढ़ते हुए फतेहगढ़ के नवाब को दंडित कर और दोआब के विद्रोहियों का वह अंतिम आश्रय तोड़-फोड़कर दोआब का सारा प्रदेश शत्रु-विहीन करने कानपुर से सर कोलिन भी फतेहगढ़ की ओर बढ़ रहा था। ऐसे दोनों ओर से ऊपर बढ़ रही अंग्रेजी सेना ने अलीगढ़, इटावा, मैनपुरी आदि स्थानों से सारे-के-सारे विद्रोहियों को भगाकर फतेहगढ़ में बंद कर दिया। फतेहगढ़ में फर्रूखाबाद के नवाब ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था, यह पहले कहा ह गया है। उस नवाब की सेना से अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ की बहुत बार छीना-झपटी हुई। फतेहगढ़ में दिल्ली और कानपुर से पराजित सिपाहियों की संख्या ही अधिक होने से वे लड़ाई शुरू होते ही मृत्यु के डर से भाग जाते। परंतु वह मृत्यु क्या इस अपमान से टलनेवाली थी? सो भी नहीं। वे भागते और अंग्रेज उनका पीछा करते। कभी छह सौ, कभी सात सौ, कभी-कभी हजार तक लोगों को काट डालते। यह इन भगोड़ों का मराना और वह उस इटावा का मरना! जमीन-आसमान का अंतर! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 318