१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 312, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह इटावा शहर तक चलता आया-यहां से भी वैसे आगे बढ़ गया होता; पर इटावा शहर के सारे विद्रोही वहां से चले जाने के बाद भी उसे वहीं पर सेना के साथ ठहरना पड़ा। क्या कारण था? अंग्रेजों कीये बलवान सेना एकदम ठहरकर रह जाए, ऐसा क्यों है? विद्रोहियों के हजारों पैदल तो चलकर नहीं आ गए? या पांडे की सेना के चपल घुड़सवारों की टोलियां अंग्रेजों पर कहीं हमला तो नहीं कर रहीं? या उनकी गड़गड़ाहट करती तोपें कहीं अंग्रेजों पर जलते अंगारों की वर्षा तो नहीं कर रहीं? इटावा के पास ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था। पैदल या हजारों घुड़सवारों की टोलियां या तोपखाने के अंगार-इनमें से कुछ भी इटावा के पास अंग्रेजों को रोके रखने के लिए नहीं था। केवल तीस-चालीस भारतीय दीवारों में गोलीबारी के लिए छेद हैं। इस छोटे से भवन में खड़े लोगों के हाथों में एक-एक मस्केट है और हृदय में एक-एक जलती ज्योति लिये इनतं ीस-चालीस लोगों ने ही इटावा के दरवाजे में इस अंग्रेजी चतुरंग सेना को रोका हुआ है। उन्होंने इस अंग्रेजी तोपखाने के साथ इटावा तक चली आई अंग्रेजी सेना से रणांगण में 'युद्धं देहि' की माँग प्रस्तुत की है। इटावा के दरवाजे में पैर रखनेवाले को 'युद्धं देहि'। अब इस बित्त भर भवन में दृढ़ता से खड़े रहकर अंग्रेजी घुड़सवार, पैदल, तोपखाना युद्ध भी क्या करे! और थोड़ी राह देखें जिससे पागलपन की यह मांग छोड़कर ये सिरफिरे होश में आएं और अभी भी पलायन की खुली राह पकड़ें। परंतु कितनी ही राह देखी, फिर भी उनका पागलपन सही नहीं हो रहा था। ठीक है-करो युद्ध। केवल उन्हें एक बार तोपखाना दिखाना ही काफी है। यही उनसे युद्ध करके उन्हें पराजित करना हो जाएगा। इसलिए अंग्रेजी सेना ने अपना जबड़ा दिखाकर उन सिरफिरों को डराना चाहा। डर, डर किसे? जिसने एक बार दिव्य स्वतंत्रता के लिए स्वतंत्रता-लक्ष्मी के चैतन्य से सम्मोहित होकर मृत्यु से ही प्रेम किया, मृत्यु का भय छोड़ा, मृत्यु के लिए जो उतावला हो गया-उसे इस विश्व में कौन डरा सकता है? जो जय के लिए लड़ता है उसे कौन डराएगा? शहीद को कौन रोक सकता है! जो जय के लिए लड़ता है वह डरता है, जो कीर्ति के लिए लड़ता है वह डरता है, पर जो मृत्यु के लिए ही लड़ता है उसे कौन डराएगा? शहीद को कौन रोक सकता है! पृथ्वी के सारे अंगारे और आकाश की सारी बिजलियां एक साथ आकर उसपर गिरें तो भी जो अपनी प्रिय वस्तु प्राप्त करने के लिए अति तीव्र गति से दौड़ रहा है उसका क्या बिगड़ेगा? जिसने केवल 'मृत्यु' की आशा पकड़ी उसे विश्व में निराशा कैसे शेष रहे? प्रिया की ओर प्रियतम जिस तरह दौड़ता जाता है वैसे ही वे मृत्यु के लिए दौड़े जाते हैं-ऐसे इन इटावा के देशवीरों को भय कैसा? और वह दिखाए कौन? और इसलिए उन्होंने पलायन के खुले मार्ग छोड़ दिए। उन्होंने विजय की कल्पना भी नहीं की। अंग्रेजों की चतुरंग सेना को धिक्कारते हुए ये मुट्ठी भर लोग उस भवन से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 317