१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण-7 लखनऊ का पतन तात्या टोपे ने कानपुर की ओर जो भयंकर गड़बड़ मचाई थी उसको इस तरह बांध`दने के बाद सर कोलिन ने विद्रोही प्रदेश को फिर से जीत लेने के लिए कमर कसी। दिल्ली जीत लेने के बाद साटन अलीगढ़ तक के निचले प्रदेश में शांति स्थापित करता आया था, इसलिए कानपुर से ऊपर अलीगढ़ तक प्रदेश में शांति स्थापित करने का वालपोल को कालपी के रास्ते भेजा गया। वालपोल कानपुर से ऊपर चढ़ते और सीटन अलीगढ़ से नीचे उतरते हुए मैनपुरी में मिले और ऐसा नक्शा अंग्रेजी सेना के लिए बना कि दोआब का यमुना तटवर्ती किनारा पूरी तरह पुनर्जित हो और यमुना तीर से इसके सेना जाते-आते दोआब के विद्रोही हटते-हटते फतेहगढ़ के पास इकट्ठा होने लगेंगे, यह स्पष्ट ही था और इस प्रकार अंत में वालपोल, सीटन और कोलिन अपने-अपने अभियान पूरे कर फतेहगढ़ में मिलेंगे, यह सहज ही होने वाला था। सन् 1857 के इस आगामी वर्ष में सामान्य रूप से यह कार्य पूरा करने की अंग्रेजी योजना थी। इस नक्शे के अनुसार वालपोल तोपखाने सहित सर्वांगपूर्ण गोरी सेना लेकर कानपुर से 18 दिसंबर को कालपी के रास्ते ऊपर चला। रास्ते में विद्रोहियों की बिखरी सेना से छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ते विद्रोहियों को आश्रह देनेवाले गांवों पर अंग्रेजी रीति से कहर बरपाते और उस प्रदेश को फिर से पूरी तरह ब्रिटिश सत्ता के अधीन लाते हुए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 316