१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफतेहगढ़ में नाना का एक सच्चा मददगार नादिर खान था। उसे फांसी पर लटकाने के लिए सबके सामने से ले जाया गया। फांसी पर चढ़ते हुए उसने लोगों को अंतिम उपदेश में कहा, "तुम सभी देशवासियों! अपनी तलवारें म्यान से निकालकर अंग्रेजों की सत्ता को निर्मूल कर देने के लिए आगे बढ़ो।" इस पराभव का परिणाम फर्रूखाबाद के नवाब को जल्दी ही भुगतना पड़ा। उसकी राजधानी, किले, युद्ध सामग्री सब अंग्रेजों के हाथ लगी और बचे-खुचे विद्रोही उसके साथ रुहेलखंड में गंगा पार भगा दिए गए। 4 जनवरी को जब सर कोलिन फतेहगढ़ में विजयी होकर घुसा, उस समय सारा दोआब और बनारस से ऊपर मेरठ तक सारा भूप्रदेश पूरी तरह अंग्रेजी सेना के अधीन हो गया था। तब यह प्रश्न खड़ा हो गया कि दोआब की विजय के बाद अंग्रेजी सेना का कार्यक्रम क्या हो? दोआब के विद्रोह की ज्वालाएं ठंडी हो जाने से अन्य प्रदेशों के विद्रोह अपने आप ही शांत हो जाएंगे, यह अंग्रेज सरकार को कुछ समय पहले तक जो आशा थी वह अब पूर्ण रूप से विफल हो गई थी। दिल्ली गिरते ही आठ निद के अंदर ब्रिदोह राख हो जाएगा-ऐसी भविष्यवाणी बड़े-बड़े राजकरण कुशल लोगों ने की थी। परंतु वास्तव में दिल्ली पतन से विद्रोह राख तो नहीं हुआ, भविष्य कथन ही राख हो गया। क्योंकि दिल्ली में रुका पड़ा सेना समूह उस शहर के गिरते ही किसी उतमत्त मेघ जैसा गरजते हुए चारों ओर फैल गया-बख्तार खान के अधीन रोहिला सेना, वीरसिंह के नेतृत्व में नीमच की सेना और अपने-अपने सूबदारों के नेतृत्व में अन्य हारी हुई सेनाएं अंग्रेजों की शरण जाना छोड़ दिल्ली गिरते ही अपमान में क्रोध में आगबबूला होकर दिल्ली में चूका बदला कहीं दूसरी ओर लेने निकल पड़ीं। 138 विद्रोहियों को अब हारने की चिंता नहीं थी। विजय की आशा का पहला जोश ठंडा पड़ गया था। अब उनके सीने में निश्चय की परिपक्वता आ गई थी। चाहे कुछ भी हो, अंग्रेजों से लड़ते रहने के सिवाए कोई दूसरा विचार उन्होंने अपने पास नहीं आने दिया। या तो फिरंगी मरें या स्वयं मरें। इन दो में से जब तक एक पूरी तरह समाप्त नहीं होता तब तक शस्त्र नीचे नहीं रखने का उनका स्वाभिमानी निश्चय हो गया था । वे आपस में लड़ रहे थे। उनमें से कुछ लोभवश अनियंत्रित व्यवहार कर रहे थे। कोई-कोई मृत्यु के भय से कभी-कभी भाग रहे थे । पर अंग्रेजों से लड़ाई छोड़ने को उनमें से कोई भी तैयार नहीं था। और या तो फिरंगी या वे स्वयं-किसी एक का पूरा नाश होने तक तलवार नहीं रखने का संकल्प हर विद्रोही के भिंचे दांत और तनी हुई। भृकुटी पर लिखा हुआ यदि स्पष्टता से दिखाई देता था तो वह दोआब की पराजय के बाद। इस समय लड़ाई में पकड़कर फांसी चढ़ाते हुए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 319 138 एक बार दिल्ली में ऐसी अफवाह फैली कि श्रीमंत नाना साहब स्वयं दिल्ली पर हमला करके बादशाह को मुक्त कर ले जाने वाले हैं। यह समाचार सुनते ही दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों ने बादशाह की कैद के मुख्य अधिकारियों को कड़े आदेश दिए कि-'सचमुच नाना की ऐसी कोई गड़बड़ शुरू हो जाए तो वे बादशाह को गोली मार दें।"-चार्ल्स बाल, खंड 2, पृष्ठ 94