भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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अंग्रेज अधिकारियों द्वारा उन विद्रोही सिपाहियों से इस युद्ध के विषय में किए गए प्रश्नों के उत्तर में उन्होंने कहा, “फिरंगियों को मारना ही धर्माज्ञा है! और इसका अंत? सारे फिरंगियों का नाश और सारे सिपाहियों का नाश! आगे जो प्रभु की इच्छा।”¹³⁹ दिल्ली हार जाने के विद्रोहियों की स्वतंत्रता की चेतना घटने की जगह अधिकारियों सुलगती गई और दिल्ली का प्रतिशोध लेने वे लखनऊ और बरेली–इन शहरों की ओर लड़ते निकले। क्योंकि दोआब जीतने के बाद रूहेलखंड और अवध, ये दो प्रदेश अभी भी विद्रोहियों के कब्जे में थे और वहां उनके राजसिंहासन क्रियाशील थे। इसलिए अंग्रेजी सेना का मुख्य प्रश्न इन दोनों प्रदेशों को जीतने का था। इस प्रश्न का उत्तर सर कोलिन ने यह दिया कि पहले रूहेलखंड जीता जाए और फिर लखनऊ का समाचार लिया जाए। लॉर्ड केनिंग का आग्रह यह था कि पहले लखनऊ का बड़ा केंद्र ध्वस्त किया जाए। जिससे विद्रोहियों के दूसरे छोटे-छोटे शहर अपने आप शरण में आ जाएंगे। लॉर्ड केनिंग के आदेशों के अनुसार चलना बाध्य होने के कारण कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन ने पहले लखनऊ पतन करने का निश्चय पक्का किया। फतेहगढ़ में सीटन एवं वालपोल और कोलिन की पिछली योजनानुसार इकट्ठी हुई सेना की संख्या कुल दस-ग्यारह हजार तक थी। दोआब में मुख्य स्थानों पर संरक्षण के लिए थोड़ी-थोड़ी अंग्रेजी सेना रखकर और आगरा से आई नई कुमुक के साथ सर कोलिन कानपुर से आई हुई विशाल सेना लेकर लखनऊ की ओर चल पड़ा। इस समय की अंग्रेजी सेना का वर्णन अंग्रेजी ग्रंथकार इस तरह करते हैं-‘उन्नाव और बुन्नी की बीच विशाल रेतीले मैदान में उस समय जो अंग्रेजी सेना उतरी थी वैसी अंग्रेजी सेना हिंदुस्थान के मैदान में पहले कदाचित् ही जमा हुई होगी। इंजीनियर, तोपखाना, घोड़े, पैदल, रसद की गाड़ियां, सेवल लोग—यह अपूर्व अंग्रेजी सेना सर्वांग सज्जित थी। उसमें सत्रह बटालियन पैदल थीं, जिनमें पंद्रह गोरी थीं। अट्ठाईस स्क्वाड्रन घुड़सवारों की थी, जिनमें चार गोरी रेजिमेंट थीं। चौवन हलकी तोपें और अस्सी भरी तोपें थीं। उन्मत्त अवध को पदनत करने के लिए फरवरी की 23 तारीख को कानपुर छोड़कर अपनी इस सबल सेना के साथ सर कोलिन कैंपबेल फिर से एक बार गंगा के पार उतरने लगा। अवध को पदनत करने के लिए, हे गां! यह कितनी आंग्ल सेना तुम्हारे किनारे उतरी है? और हे मानिनी अवग्ध! अब इस सेना से डरकर तू पदनत होने वाली है या नहीं? सर कोलिन रास्ते के हिंदू मंदिरों को बारूद से उड़ाते हुए आगे आ रहा है, इसकी पूरी जानकारी अवध शहर को थी। परंतु अपने को पदनत करने के लिए अंग्रेजी सेना 1857 का स्वातंत्र्य समर – 320 ¹³⁹ चार्ल्स बाल कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 242 ।