१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगंगा पार हो रही है, यह उस मानिनी अवध को विशेष बुरा नहीं लग रहा था। उसे जो दुःख था, जिस दिशा की ओर देखकर वह जार-जार आंसू बहाने लगी थी और पराजय की मृत्यु की छाया उसके अभिमानी चेहरे पर जिधर से पड़ रही थी, वहां से कोई अंग्रेजी सेना नहीं चली आ रही थी। वहां से तो जंगबहादुर की नेपाली सेना आक्रमण करती आ रही थी। अंग्रेजी सेना को अपने पर आक्रमण के लिए आते देख दुःखी हो-अवध ऐसी कायर होती तो उसने रणक्षेत्र में यह भैरव रूप धारण ही न किया होता। अंग्रेजी सत्ता को केश पकड़कर पीटते हुए जिस दिन अवध ने अपने घर से भगाया उसी दिन उसे साफ मालूम था कि उस अंग्रेजी सत्ता के समर्थन में कोई और अंग्रेजी सेना उसपर आक्रमण करेगी। और उस आगामी रण के लिए वह अपनी हजार भुजाओं से सशस्त्र होकर रण में उतरी थी। परंतु अवध को जो अब तक ज्ञात नहीं था कि मेरे शत्रु अंग्रेज मुझपर तलवार चलाएंगे, परंतु उसे यह ज्ञात नहीं था कि उसके मित्र, उसके सहोदर भी उसपद कुल्हाड़ी से वार करेंगे। वह अंग्रेजों से कुश्ती लड़ने को तो तैयार थी, परंतु हिंदुस्थान के एक स्वकीय से भी हिंदुस्थान की स्वतंत्रता के लिए जूझना पड़ेगा, यह उसे ज्ञात नहीं था। इस उदाहरण का आविष्कार करने के लिए जब जंगबहादुर अपनी नेपाली सेना सहित उसपर आ क्रमण करने आया तब ऐन समय पर विश्वास के कारण स्वजन परित्यक्त अवध जंगबहादुर की ओर देख-देखकर जार-जार आसूं बहाने लगी। क्योंकि दोआब की विशाल अंग्रेजी सेना इकट्ठी कर उसके साथ जब सर कोलिन गंगा पार करके लखनऊ की ओर चलने लगा, उसी समय पूर्व दिशा से अपनी नेपाली सेना सहित जंगबहादुर भी अंग्रेजी सेना की सहायता के लिए उधर आ रहा था। अंग्रेज, उसके मित्र और हिंदुस्थानी शत्रु! कारतूसों को गाय की चरबी लगानेवाले उसके मित्र और उस चरबी को मुंह लगाने से मना करनेवाले हिंदुस्थानी उसके शत्रु! ऐसा यह अद्वितीय कुलकलंकी जंगबहादुर हिंदुस्थान में युद्ध प्रारंभ हो गया है, यह सुनते ही अंग्रेजों से मिल गया था। सन् 1857 के थोड़े ही पहले वह विलायत गया था और अंग्रेजी ग्रंथकार कहते हैं कि 'उसने इंग्लैंड का वैभव देखा, इसलिए वह विद्रोह में सम्मिलित होने से डरा।' इंग्लैंड का वैभव क्या वास्तव में इतना भारी था? इंग्लैंड का वैभव जैसे जंगबहादुर ने प्रत्यक्ष देखा था वैसे ही नाना के अजीमुल्ला खान और सतारा के रंगो बापूजी ने भी देखा था। परंतु उस वैभव का उनपर क्या परिणाम हुआ और कैसे वे उस वैभव के हर चिह्न के पीछे क्रांतियुद्ध के लिए नई शपथ लेते गए, यह इतिहास कह ही रहा है। अतः इंग्लैंड के वैभव में कुछ नया कुछ नहीं था। जो विशेष था वह देखनेवाले के दृष्टिकोण में था। वह आंग्ल वैभव देखकर उनका देशभिमान चेत गया और उन्होंने सोचा कि मेरी मातृभूमि भी स्वतंत्रता के तिलक से मंडित हो जाए तो क्या बहार होगी। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 321